04 जुलाई, 2009

25. वाग्भटाचार्य -2

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

एक दिन रात को गुरु ने अपने शिष्य से कहा, “मेरे पैरों में पीड़ा है। तुम पलंग पर बैठ जाओ और मेरे पैरों को जरा दबाकर दे दो।“ वाग्भटाचार्य ने बिना संकोच ऐसा ही किया। रात बहुत बीत जाने के कारण कुछ ही देर में वैद्य को नींद आ गई। तब वाग्भटाचार्य के मन में विचार उठा, “अहो दुर्भाग्य! मेरी कैसी गत हो गई है! मैंने एक उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म लिया है। वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास सब भली प्रकार पढ़ा है। इतना सब होने के बाद भी मुझे इस नीच का पांव दबाना पड़ रहा है।” यह सोचने पर उनका मन दुख और संताप से इतना व्याकुल हो उठा कि उनकी आंखों से आंसुओं की बूंदें टपकने लगीं। इनमें से तीन-चार बूंदें वैद्य के पैरों पर भी गिरीं। इससे उसने तुरंत आंखें खोलकर देखा। शिष्य का चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ देखकर वैद्य को सब बातें समझ में आ गईं। “इसने धोखा दे दिया। यह हमारी जाति का नहीं है। इसे छोड़ना नहीं चाहिए। इसका काम यहीं तमाम कर देना होगा,” यों सोचकर वह वैद्य पलंग से कूद पड़ा और पास ही रखी तलवार हाथ में उठा ली। यह देखकर वाग्यभटाचार्य मन ही मन बोले – “काम बिगड़ गया। यह अभी मुझे मार देगा। इस नीच के हाथों मरना नहीं है। चार वेद, छह शास्त्र और ईश्वर नाम का व्यक्ति अगर है, तो मेरा बाल भी बांका नहीं होना चाहिए,” और उन्होंने उस सात मंजिले इमारत के एक झरोखे से छलांग लगा दी। नीचे पहुंचने पर उन्होंने देखा कि उनके पैरों में जरा सी मोच आई है बस, अनयस्था उन्हें कुछ नहीं हुआ है। वे वहां से उठकर चल पड़े और नदी के उस पार ब्राह्मणों की पाठशाला में आ पहुंचे। वाग्भटार्च को थोड़ा सा लंगड़ाते हुए देखकर वहां मौजूद ब्राह्मणों ने इसका कारण पूछा। तब वाग्भटाचार्य ने अपने साथ जो कुछ भी घटा था, वह सब विस्तार से कह दिया। यह सुनते ही ब्राह्मणों ने पूछा, ”क्या संकल्प करके आपने महल से नीच कूदा था?” इसके उत्तर में वाग्भटाचार्य ने कहा, “ ‘चार वेद, छह शास्त्र और ईश्वर नाम का व्यक्ति अगर है, तो मेरा बाल भी बांका नहीं होना चाहिए’, इस संकल्प के साथ ही मैं नीचे कूदा था।“ यह सुनकर ब्राहणों ने कहा, “तब इसमें आश्चर्य नहीं कि आपको चोट लगी। ’अगर’ शब्द किस लिए? यही न कि इनमें आपको उतना विश्वास नहीं है? ‘चार वेद, छह शास्त्र और ईश्वर नाम का व्यक्ति होने के कारण...’, यों होना चाहिए था, तब आपको जरा भी चोट नहीं लगी होती। आपको यह नहीं सूझा, इसलिए आप भ्रष्ट हो चुके हैं। हमारी संगत में बैठने योग्य आप नहीं रह गए हैं। कृपा करके बाहर निकल जाएं।” यह सुनकर वाग्भटाचार्य ने कहा, “आप ठीक ही कह रहे हैं, अब मैं आपकी संगत में नहीं बैठूंगा।” और तुरंत ही वहां से चले गए। इसके बाद वे सोचने लगे, "अब क्या किया जाए। वैसे भी इस प्रदेश में रहना अब सुखकर नहीं रह गया है। पर यदि इसी समय कहीं और चला जाऊं तो इतने दिनों की मेरी मेहनत बेकार हो जाएगी। अब कोई दूसरा व्यक्ति संकल्प करे तो भी इस मुसलमान वैद्य से वैद्यशास्त्र की जानकारी चोरी से सीख नहीं सकेगा। इसलिए मैंने अपने प्रयत्न से जो सीखा है उसे ऐसे रूप में लाना होगा जिसका ये लोग आसानी से उपयोग कर सकें, उसके बाद ही मुझे यहां से जाना चाहिए।“ इस निश्चय पर पहुंचकर वे कुछ समय और वहीं रहे। अन्य ब्राह्मणों से उन्होंने किसी भी प्रकार का संपर्क नहीं रखा। वे एक अलग स्थान पर रहने लगे और स्वयं ही खाना पकाकर खाने लगे।

इस तरह रहते हुए वाग्भटाचार्य ने पहले ‘अष्टांगसंग्रह’ नाम की वैद्यशास्त्र के एक ग्रंथ की रचना की। उसमें उन्होंने बड़े ही संक्षेप में बाकी सब वैद्यशास्त्रीय ग्रंथों की सामग्री दे दी। फिर भी उन्हें उसे लेकर संतोष नहीं हुआ। यद्यपि वह अन्य सभी वैद्यशास्त्रीय ग्रंथों से संक्षिप्त था, उन्हें लगा कि इतना संक्षिप्तीकरण पर्याप्त नहीं है। इतना ही नहीं, उसमें गद्य और पद्य दोनों थे, इसलिए उसके अध्येताओं को उसे कंठस्थ करने में कठिनाई होगी। अतः उन्होंने निश्चय किया कि अब ऐसा ग्रंथ रचना चाहिए जिसमें अष्टांगसंग्रह की सब बातें हों, सब कुछ पद्य में हो, और अष्टांगसंग्रह से वह छोटा भी हो। इस निश्चय का परिणाम था ‘अष्टांगहृयम’ नाम का वैद्यशास्त्रीय ग्रंथ। उसकी रचनापूर्ण होने के बाद उन्होंने जन हितार्थ ‘अमरकोष’ नामक अभिधा-ग्रंथ की भी रचना की। उसमें भी अन्य अभिणआ-ग्रंथों का सारांश दिया गया है। इस तरह तीन ग्रंथ रचकर और उन्हें ब्राह्मण सभा को अर्पित करके वाग्भटाचार्य वहां से चले गए। उसके बाद उन ब्राह्मणों में से किसी ने भी उन्हें नहीं देखा। इसलिए यह बताना संभव नहीं है कि वाग्भटाचार्य कहां गए, कैसे रहे, और उनका देहांत कैसे हुआ।

वाग्भटाचार्य के चले जाने के बाद ब्राह्मणों के सामने एक विकट दुविधा की स्थिति पैदा हो गई, जो यह थी, "क्या एक भ्रष्ट व्यक्ति द्वारा रचे गए ग्रंथों को स्वीकार करना ठीक होगा? यदि न स्वीकारें, तो इस तरह के अन्य श्रेष्ठ ग्रंथ तैयार करवाना असंभव ही नहीं होगा, तब फिर क्या करना उचित होगा?” इस विषय के निराकरण के लिए सभी गण्यमान्य ब्राह्मणों ने सभा बुलाई और खूब विचारने के बाद यही मंतव्य दिया, “इन ग्रंथों को स्वीकार किया जाए, लेकिन यह याद रखने के लिए कि इनके रचयिता एक भ्रष्ट ब्राह्मण थे, इन ग्रंथों का पठन-पाठन एकादशी के दिन न किया जाए।“ इसलिए आज भी एकादशी के दिन अष्टांगसंग्रह, अष्टांगहृदय और अमरकोष, इन तीन ग्रंथों के पठन-पाठन की परिपाटी नहीं है।

(समाप्त। अब नई कहानी।)

25. वाग्भटाचार्य - 1

4 Comments:

गिरिजेश राव said...

अजीब थी यह छुआ छूतमय दुनिया। इसने इस देश का बहुत अहित किया।

चलिए silverline यह रही कि तीनों ग्रंथ स्वीकार कर लिए गए।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत अजीब दुनिया थी। हमारे यहाँ तो गुरु को हर हाल में पूज्य माना गया है फिर वह कोई क्यों न हो। कथा सुन कर दुःख पहुँचा। हो सकता है कथा में गढ़े गए अंश भी हों। क्यों कि जो व्यक्ति ज्ञान की इच्छा में विधर्मी से शिक्षा ले सकता है उसे ऐसी ग्लानि नहीं हो सकती। लगता है यह सात मंजिल से कूदने की बात ही गल्प हो। अष्टांगहृदय बहुत पहले कोई 35 वर्ष पहले आयुर्वेद अध्ययन के समय पढ़ा था।

राज भाटिय़ा said...

अन्त मै कहानी यह मोड लेगी, समझ मै नही आया, गुरु केसा भी हो, किसी भी जात का, लेकिन वो गुरु है, फ़िर ग्याण को हम कही से भी किसी से भी ले सकते है मुझे लगता है यह कथा कही न कही किन्ही गलत लोगो ने लिख दी है, असल बात कुछ ओर ही है, अगर एक मुसलमान गुरु इतना महान था, तो उस के बाद मुसलमानो मे उस शिक्षा को आगे क्यो नही अपनाया??
कही कुछ गलत है, धन्यवाद

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अग्रजों ने सब कुछ कह दिया है. कथा रोचक रही.

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