01 जून, 2009

16. कालड़ी के भट्टतिरी - 2


(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

16. कालडी के भट्टतिरी - 1

तब अपने पिता की अकाल मृत्यु का वृत्तांत अपनी मां से समझकर उसने प्रण किया कि उस यक्षी का काम जल्द से जल्द तमाम करूंगा। इसमें सफलता के लिए वह सूर्य देवता की उपासना करने लगा। अति कठिन तपस्या से उसने सूर्य को प्रत्यक्ष करा लिया। सूर्य देवता ब्राह्मण के वेष में प्रकट हुए और भट्टतिरी को कुछ दिव्य मंत्र सिखाकर बोले, "बाकी सब इसमें है। पढ़कर समझ लेना" और भट्टतिरी के हाथ में एक ग्रंथ देकर अंतर्धान हो गए। उस दिन से उस भट्टतिरी को "सूर्यभट्टतिरी" यह उपनाम प्राप्त हुआ और वह इसी नाम से अधिक प्रसिद्ध हुआ। यही "सूर्यकालड़ी" के नाम से विश्वविश्रुत भट्टतिरी था। उस दिन से ही इस घराने की सभी संततियों को "सूर्य" यह एक अतिरिक्त नाम भी दिया जाने लगा। आज भी इस परंपरा का पालन होता है।

सूर्य भगवान से उपदेश व ग्रंथ प्राप्त करके उस भट्टतिरी ने विवाह किया और गृहस्थ जीवन बिताने लगा। उन्हीं दिनों उसने सूर्य भगवान से प्राप्त उस ग्रंथ का सर्वांगीण अध्ययन भी किया और उसकी सभी बातों को हृदयंगम कर लिया। यह ग्रंथ तंत्रविद्या से संबंध रखता था। इसलिए भट्टतिरी प्रसिद्ध तांत्रिक बन गया। वह अपने पुत्रों को भी सूर्य भगवान से उसे प्राप्त हुई विद्या का उपदेश देने लगा। इस प्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी वह विद्या उस घराने में आज तक जीवित चली आ रही है। कालड़ी के भट्टतिरियों को जादू-टोने में जो असाधारण सिद्धियां प्राप्त थीं, उसका मूल रहस्य यही है।

इसके बाद सूर्य भट्टतिरी को दूर-दूर के लोग आकर अपने यहां ले जाने लगे और भट्टतिरी ने अनेक प्रकार की बाधाओं को दूर किया। ऐसी कोई बाधा नहीं थी जो उसके प्रयासों से दूर नहीं होती थी। यह सब देखकर भट्टतिरी को सूर्य भगवान से प्राप्त विद्या के पूर्ण विश्वसनीयता पर भरोसा हो गया। जब उसने देखा कि सूर्य भगवान के उपदेशों के अनुसार करने पर सभी बातें सही निकलती हैं, तब उसने निश्चय किया कि अपने पिता को खानेवाली यक्षी को दंड देने का समय आ गया है। उसने इसके लिए आवश्यक सभी उपकरण इकट्ठे करना शुरू कर दिया और तत्पश्चात एक कष्टसाध्य यज्ञ आरंभ किया। दंडनीय यक्षी कौन है यह ठीक-ठीक पता न होने से उसने इस संसार की सभी यक्षियों का एक साथ आह्वान किया। उसके मंत्रबल से वशीभूत होकर वे सबकी सब उसके पास आ गईं। तब भट्टतिरी ने कहा, "मेरे पिता को खानेवाली आपमें से कौन है?" चूंकि किसी ने भी आगे बढ़कर जवाब नहीं दिया, इसलिए उसने एक-एक को बुलाकर उसके हाथ में दीपक थमाकर सत्य कहलवाया। इस प्रकार से अपराधी यक्षी को छोड़कर बाकी सब निर्दोष साबित हुईं और वहां से चली गईं। तब भट्टदिरी ने अपने पीछे भयाकुल होकर दुबक रही उस यक्षी से दीपक हाथ में लेने को कहा। और कोई उपाय न होने से उसे अपना अपराध स्वीकार करना पड़ा। तब भट्टतिरी ने कहा, "मैं तुम्हें इसी अग्नि में होम कर दूंगा।" यक्षी ने कहा, "मुझे होम करेंगे तो आज से इकतालीसवें दिन आपकी मृत्यु हो जाएगी।" भट्टतिरी ने कहा, "इससे बचने का कोई उपाय तो होगा ही?" यक्षी ने कहा, "इकतालीसवें दिन तिरुवालूर जाकर देवदर्शन करेंगे तो बच जाएंगे। अन्यथा मेरे शाप से मुक्ति पाने का और कोई मार्ग नहीं है।" यह सुनकर भट्टतिरी ने कहा, "वह सब तब देखा जाएगा। इस समय मैं तुझे नहीं छोड़ूंगा" और उसने उस यक्षी को पकड़कर होम कर दिया।

इसके कुछ समय बाद केरल की एक रियासत के तत्कालीन अधिपति पल्लिबाणप्पेरुमाल ने भट्टतिरी को लिवाने एक आदमी भेजा। भट्टतिरी तुरंत उस व्यक्ति के साथ पेरुमाल के पास पहुंच गया। तब पेरुमाल ने भट्टतिरी को बताया कि उसकी पत्नी पर बहुत दिनों से एक गंधर्व हावी है और उस गंधर्व के उपद्रव के कारण उसकी पत्नी का गर्भ टिक नहीं पाता है। बहुत-से तांत्रिकों के प्रयत्नों के बाद भी उस गंधर्व को अपनी प्रिय पत्नी पर से हटाया नहीं जा सका है। पेरुमाल ने भट्टतिरी से आग्रह किया कि वह किसी प्रकार उस गंधर्व के उपद्रव को मिटाए। भट्टतिरी राजी हो गया और उसने इसके लिए आवश्यक उपकरणों की एक सूची बनाकर पेरुमाल को दे दी। वे सब चीजें पेरुमाल ने उसी दिन तैयार करवा दीं और भट्टतिरी ने एक तांत्रिक अनुष्ठान आरंभ कर दिया। चक्र बनाकर उस पर उसने एक पुतले को बिठाया और मंत्र जपकर उस पर भस्म बरसाने लगा और नाना प्रकार के होम-यज्ञ करने लगा। लेकिन वह पुतले में गंधर्व को प्रवेश नहीं करा सका। जब भट्टतिरी ने देखा कि इन प्रयत्नों के बाद भी गंधर्व उसकी पकड़ में नहीं आ रहा, तो उसकी जिद एकदम बढ़ गई और वह ब्राह्मणों के लिए वर्जित अति-कठिन कर्मानुष्ठान भी आजमाने लगा। तरह-तरह के जीव-जंतुओं को काट-काटकर उन्हें होमाग्नि में डालने लगा। एक पत्थर को घी में डुबोकर उसने उसे जमीन पर रखा और उस पर जब बहुत सारी चींटियां एकत्र हो गईं तो पत्थर को चींटियों सहित उठाकर आग में झोंक दिया। इस प्रकार की अनेक अति भयंकर क्रियाएं करने पर गंधर्व के लिए पुतले में प्रविष्ट होना अनिवार्य हो गया और वह भट्टतिरी के सामने प्रत्यक्ष हो गया। फिर दोनों में बहुत देर तक तंत्रविद्या को लेकर अति गंभीर बहस छिड़ चली। इसमें भी भट्टतिरी ही विजयी हुआ। जब गंधर्व को स्पष्ट हो गया कि किसी प्रकार से भी भट्टतिरी को जीतना संभव नहीं है, तब उसने अत्यंत दीन स्वर में कहा, "आप एक अत्यंत विशिष्ट महानुभाव हैं। आपको जीतना किसी के लिए भी संभव नहीं है। आपके पिता को खानेवाली वह यक्षी मेरी प्रेयसी थी। उसे आपने होम कर दिया। अब आप मुझे इस स्त्री पर से भी खदेड़ रहे हैं। यह बड़ा ही अनुचित है, क्योंकि मैं इस स्त्री के लावण्य पर पूरी तरह आसक्त हो गया हूं। इसीलिए मैं उस पर छा गया हूं। कृपा करके मुझे तंग न करें।" तब भट्टतिरी ने कहा, "राजा की पत्नी को तुम्हारे उपद्रव से छुड़ाने का वचन मैं दे चुका हूं। इसलिए तुम्हें छोड़ने पर मुझ पर वचनभंग का दोष लगेगा और मेरी बड़ी बदनामी होगी। सो तुम तुरंत ही शपथ लो कि आगे इस स्त्री को तंग नहीं करोगे और यहां से चलते बनो, वही तुम्हारे लिए अच्छा होगा। वरना यक्षी की जो गत मैंने की थी, वही तुम्हारी भी करूंगा।" यह सुनकर गंधर्व को अत्यंत भय और दुख हुआ और उसने भट्टतिरी को शाप दिया, "आज से बारह दिन बाद पेशाब बंद हो जाने से आपकी मृत्यु होगी।" तब भट्टतिरी ने घबराकर उससे शापमुक्ति का उपाय पूछा। गंधर्व ने कहा कि यदि भट्टतिरी बारहवें दिन तिरुवालूर जाकर देवदर्शन करेंगे, तो बच जाएंगे। इसके बाद भट्टतिरी द्वारा बाध्य किए जाने पर गंधर्व शपथ लेकर उस जगह को छोड़कर चला गया। पल्लिबाणप्पेरुमाल ने भट्टतिरी को अनेक कीमती उपहारों से सम्मानित किया। बिना विलंब पेरुमाल की भार्या गर्भवती हुई और आगे चलकर उसके तीन-चार बच्चे हुए।

जिस दिन भट्टतिरी की मृत्यु होनेवाली थी, उसके पिछले दिन तिरुवालूर देवालय में एक अशरीरी वाणी सुनाई दी, "कल यहां एक अपमृत्यु होगी। इसलिए जब सूर्यास्त में साढ़े तीन घड़ी बाकी हो, तब रात की पूजा करके सब लोग यहां से चले जाएं।" अपनी मृत्यु के दिन सुबह ही भट्टतिरी तिरुवालूर पहुंच गया। उस समय तक उसे किसी प्रकार की असुविधा का अनुभव नहीं हुई। शुद्ध होने के लिए वह मंदिर के तालाब में गया और स्नानादि करके बाहर आया। तब उसे पेशाब करने की इच्छा हुई। तुरंत वह पास ही स्थित शौचालय में गया, तब उसे लगा कि अभी पेशाब नहीं करना है, और वह वहां से पेशाब किए बिना ही बाहर आ गया और तालाब में जाकर हाथ-मुंह धो आया। तालाब से निकलते ही उसे फिर जोरों का पेशाब लगा और वह पुनः शौचालय गया। तब उसे लगा कि पेशाब नहीं करना है। इसी प्रकार वह शाम तक तालब पर से आता-जाता रहा। शाम होते-होते वह बेहद कमजोर हो गया और तालाब की सीढ़ियों पर ही गिर गया और अंतिम सांसें लेने लगा। यद्यपि उस दिन कोई व्रत-पर्व था और वहां असंख्य लोग आए हुए थे, लेकिन अशरीरी वाणी के कारण वे सब सूर्यास्त से साढ़े तीन घड़ी पहले ही रात की पूजा करके वहां से चले गए थे। केवल भट्टतिरी वहां रह गया था। पेशाब बंद होने की पीड़ा से तड़पते हुए मरण वेदना में उसने कहा, "हे भगवान, मैंने तो ग्रंथ में बताए अनुसार ही किया था।" इसके जवाब में अशरीरी वाणी हुई, "क्या जीव-जंतुओं को काट-काटकर होम करने की बात भी ग्रंथ में लिखी थी?" यह वाक्य आज भी एक कहावत के रूप में खूब उपयोग में आता है। लेकिन उस निर्जन स्थल में सुनाई पड़ी उस अशरीरी वाणी को इतना प्रचार कैसे मिल पाया यह स्पष्ट नहीं है।

जो भी हो पेशाब बंद होने से और मरणवेदना से तड़प-तड़प कर भट्टतिरी ने आधी रात तक प्राण त्याग दिए। अंतिम सांसें गिनते-गिनते जमीन पर तड़पते समय उसने जमीन से उछलकर तालाब की सीढ़ियों के ऊपर बनी छत की शहतीरों को अपने दांतों से चबा डाला था। इसके निशान आज भी देखे जा सकते हैं। तिरुवालूर का यह मंदिर आलंगाट्टु तालुके में स्थित है।

चूंकि सूर्यभट्टतिरी पल्लिबाणप्पेरुमाल के समय विद्यमान था, इसलिए उसका समय कलि वर्ष ३४०० के आस-पास होना चाहिए। सूर्यभट्टतिरी के बाद भी इस घराने में पैदा हुए भट्टतिरी लोग अत्यधित तपोबल संपन्न, वेदज्ञ-शास्त्रज्ञ और अच्छे तांत्रिक थे।

(... जारी)

0 Comments:

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट