29 जून, 2009

24. भवभूति

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

उत्तररामचरित, मालतीमाधव आदि नाटक और अन्य कई साहित्यिक ग्रंथों के रचयिता महाकवि भवभूति के बारे में संस्कृत से थोड़ा भी परिचय रखनेवाले सभी लोगों ने सुना होगा। उनका असली नाम 'श्रीकंठन‘ था। उन्होंने एक बार

तपस्वी काम गतोवस्थामिति स्मेराननाविव ।
गिरिजाया स्तनौ वंदे भवभूतिसिताननौ ।।

इस तरह का एक श्लोक रचकर सहृदय समाज के सामने पेश किया था। इस श्लोक में जो ‘भवभूति’ शब्द आया है उसके शब्द-चमत्कार से प्रसन्न होकर सहृदयों ने उन्हें भवभूति नाम से विभूषित कर दिया और इसी नाम से उनकी भावी प्रसिद्धि हुई।

एक बार पार्वती देवी ने शिव भगवान से कहा, “कवित्व कला में कालिदास अधिक योग्य हैं या भवभूति?” इसका उत्तर शिव भगवान ने यों दिया, “दोनों में इस मामले में कोई खास अंतर नहीं है। कविता के पद ठीक किस तरह होने चाहिए, इस संबंध में कालिदास को पूर्ण निश्चय रहता है, लेकिन भवभूति इस संबंध में उतने पक्के नहीं हैं, यही फर्क है दोनों में।” इतना ही नहीं, शिव भगवान ने पार्वती को एक तरकीब भी बता दिया, जिससे इसका परीक्षण किया जा सकता था।

भगवान के उपदेशानुसार पार्वती ने एक बूढ़ी ब्राह्मण स्त्री का रूप धारण कर लिया और उनका बेटा सुब्रमण्य एक मृत बालक में बदल गया। पार्वती बालक के शव को गोदी में लेकर भोज राजा के प्रासाद के द्वार पर पहुंच गई और शव को वहीं लिटाकर स्वयं उसके पास खड़ी हो गई। जब राजा की सभा विसर्जित हुई कविगण एक-एक करके द्वार से निकलने लगे। उनमें से प्रत्येक से पार्वती इस प्रकार कहती, "अरे इस ओर जरा धयान दीजिए। मेरा बेटा एक शाप के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गया है। यदि कोई ‘पुरोनिस्सरणे रण:’ इस पद की ठीक प्रकार से समस्या पूर्ति कर दे, तो यह बच्चा जीवित हो सकता है। आप जरा मेरी मदद कर दीजिए।" यह सुनकर सभी कवियों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार समस्या-पूर्ति कर दी। तब पार्वती ने कहा, “लेकिन मेरा बेटा तो जीवित नहीं हुआ।” उन सबने यही जवाब दिया, “वह सब हम नहीं जानते” और चले गए। तब भवभूति द्वार से बाहर निकले। उनसे भी पार्वती ने वैसे ही कहा। भवभूति ने उस काव्य समस्या की पूर्ति इस तरह की –

यामीति प्रियपृष्ठायाः प्रियायाः कंठसक्तयोः ।
अश्रुजीवितयोरासील पुरोनिस्सरणे रण: ।।

तब पार्वती ने कहा, “मेरा बेटा तो जीवित नहीं हुआ।”

“इसका कारण मैं नहीं जानता। मैं जितनी अच्छी तरह से इस समस्या को पूरा कर सकता था, पूरा कर दिया। इससे बेहतर श्लोक रचना मेरे लिए संभव नहीं है। मेरे बाद एक और श्रेष्ठ कवि आएंगे, उनसे यदि आप अनुरोध करें, तो वे इसे और भी अच्छी तरह से पूरा करके देंगे,” यह कहकर भवभूति भी वहां से चले गए।

अंत में कालिदास द्वार से बाहर आए। उनसे भी पार्वती देवी ने उसी प्रकार कहा और कालिदास ने तुंरत ही उस समस्या को पूरा करके दे दिया। कालिदास ने समस्या को जिस तरह पूरा किया और भवभूति ने जिस तरह पूरा किया, उन दोनों में एक अक्षर का भी अंतर नहीं था। कालदिस से भी पार्वती ने कहा, "लेकिन मेरा बेटा तो जीवित नहीं हुआ।" यह सुनकर कालिदास बोले, “तब आपका बेटा जिंदा हो ही नहीं सकता, अथवा वह मरा ही नहीं है। इससे अधिक सुंदर रीति से इस समस्या की पूर्ति कोई भी नहीं कर सकता।” यों कहकर वे भी चले गए।

भवभूति और कालिदास द्वारा रचा गया श्लोक हूबहू एक जैसा था। कालिदास को पूरा भरोसा था कि उनकी समस्या-पूर्ति श्रेष्ठतम है, भवभूति को उतना भरोसा नहीं था। इस तरह पार्वती को बोध हो गया है कि शिव भगवान ने इन दोनों के संबंध में जो कहा था, वह सही है, और वे सुब्रमण्य को लेकर कैलास लौट आई और शिव को जो कुछ भी घटा था, कह सुनाया।

(समाप्त। अब नई कहानी।)

28 जून, 2009

23. तिरुनक्करा देव और उनका सांड़ - 3

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

तिरुनक्करा देव का चैतन्य और ख्याति आशातीत रूप से बढ़ जाने से वहां अनेक रीती से पूजा-अर्चना होने लगी। हर रोज पांच-छह चतुर्श्शतम और आठ-दस पंदिरुनाष़ी पूजा होने लगीं। इसलिए पुजारी के लिए इन सबको अकेले संभालना असंभव हो गया। तब पारेप्परंबू नंबूरी ने तिरुनक्करा से तीन कोस दूर पूर्व में स्थित ‘माङानम’ नाम के देश से ‘मडिप्पल्ली’ नामक घराने के एक नंबूतिरी को भी अधीनस्थ पुजारी के रूप में रख लिया। इस तरह वे दोनों मिलकर कुछ वर्षों तक मंदिर में पुरोहिताई करते रहे। इन दो व्यक्तियों में आमदनी के बंट जाने के बावजूद पारेप्परंबु नंबूतिरी के हिस्से में इतना सारा धन आ गया कि उसकी सारी गरीबी दूर हो गई। इतना ही नहीं, वे अच्छे खासे संपन्न व्यक्ति बन गए। इसलिए मंदिर में पुरोहिताई का काम मडिप्पल्ली नंबूतिरी के हाथों में पूर्णतः सौंपकर वे अपने देश वैक्कम लौट गए और वहीं स्थायी रूप से रहने लगे। लेकिन महीने में एक दिन वे तिरुनक्करा मंदिर आकर वहां की पूजा का नेतृत्व करते रहे। उनके गुजर जाने के बाद उनके घराने का सबसे वरिष्ठ सदस्य यह दायित्व पूरा करने लगा। आज भी ऐसा ही हो रहा है।

जब मडिप्पल्ली नंबूतिरी तिरुनक्करा मंदिर की पुरोहिताई संभाले हुए थे, तब भी मासिक उत्सव की घोषयात्रा का संचालन पूर्व-निश्चित परिपाटी के अनुसार पारेप्परंबू घराने का वरिष्ठ व्यक्ति ही करता था। एक बार इस वरिष्ठ व्यक्ति और तेक्कुमकूर राजवंश के बीच किसी कारण को लेकर वैर ठन गया और राजा ने उसे गोली मार देने का आदेश जारी कर दिया। पर जिसे यह आदेश मिला था, उस भृत्य ने मडिप्पल्ली नंबूतिरी को ही पारेप्परंबु का वरिष्ठ सदस्य समझकर उसे गोली से उड़ा दिया। इससे संत्रस्त होकर मडिप्पल्ली नंबूतिरी की पत्नी ने तिरुनक्करा देव के सामने ही आत्म हत्या कर ली। उसके इस तरह प्राण त्याग देने के साथ ही उस नंबूतिरी का खानदान भी निश्शेष हो गया। इस दुखद घटना के बाद से इस मंदिर में ऐसा नियम बना दिया गया कि उसकी दीवारों के भीतर स्त्रियों को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। एक अन्य नियम भी बना दिया गया कि मंदिर के उत्सव की घोषयात्रा का संचालन पुजारी के परिवार का ज्येष्ठ सदस्य नहीं करेगा, बल्कि कोई कनिष्ठ सदस्य ही करेगा। इन दोनों नियमों का पालन आज भी इस मंदिर में होता है।

ऐसा कहा जाता है कि तिरुनक्करा देव के सांड़ के शरीर पर कुछ वर्षों में फोड़े फूट निकलते थे, और इन वर्षों में तेक्कुमकूर देश में कोई न कोई बड़ी विपत्ति आ जाती थी। सुना है कि जिन वर्षों में तेक्कुमकूर के राजाओं का स्वर्गवास हुआ था, यथा 933, 973, 986, 990, 1004,1022, 1036, और 1055 के वर्ष, उन सब वर्षों में सांड़ के शरीर पर फोड़े निकले थे। जिन वर्षों में सांड़ के फोड़े निकल आते थे, उन वर्षों में कुछ निराकरणात्मक पूजाएं मंदिर में कराई जाती थीं, और लोगों का मानना था कि इससे विपत्ति टल जाती थी। इन पूजाओं के लिए तेक्कुमकूर की सरकार की ओर से हजारों रुपए खर्च किए जाते थे। शायद आजकल लोगों में पहले जैसी परिष्कृतता न होने से और उनमें इस तरह की बातों में आस्था कम हो जाने से अथवा अन्य कारणों से अभी हाल के वर्षों में सांड़ के फोड़े निकलने की घटनाएं देखने में नहीं आ रही हैं और ऐसा ही लगता है कि अब आनेवाले वर्षों में भी इसकी कोई संभावना नहीं है।

(समाप्त। अब नई कहानी।)

23. तिरुनक्करा देव और उनका सांड़ - 1
23. तिरुनक्करा देव और उनका सांड़ - 2

27 जून, 2009

23. तिरुनक्करा देव और उनका सांड़ - 2

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

जब ये नंबूरी तलियल में रह रहे थे, एक दिन वे राजा को सूचित करके तिरुनक्करा स्वामियार के मठ को चल पड़े। उन्होंने ऐसा यही सोचकर किया कि यदि स्वामियार से मिलकर उनसे अपनी स्थिति के बारे में बताऊं तो वे शायद मेरी कुछ मदद कर सकेंगे। मठ में पहुंचकर पेरप्परंबु नंबूरी ने स्वामियार से अपने कष्टों की कथा सुनाई। चूंकि चौमासा शुरू हो चुका था, स्वामियार ने उनसे अनुरोध किया कि बारिश का मौसम समाप्त होने तक वे मठ में ही रुकें। उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि मैं आपकी कुछ मदद करूंगा। इसलिए पेरेप्परंबु नंबूरी वहीं रुक गए।

आज जिस प्रदेश में तिरुनक्करा का देवालय है वह उन दिनों घना जंगल था। उसे नक्कराक्कुन्नु (नक्करा की पहाड़ी) ही कहा जाता था। वहां देव सान्निध्य और देवालय के बन जाने के बाद ही नक्करा तिरुनक्करा बना (मलायालम में तिरु का मतलब श्री होता है)। स्वयं नक्करा भी मूल शब्द नलक्करा का संक्षिप्त रूप है। स्वामियार के नौकर उस पहाड़ी की जमीन पर सूरण, अरबी आदि कंद-मूलों की कृषि करते थे। चौमासे की समाप्ति पर मठ में एक भोज होता था, और चूंकि इस भोज का समय निकट आ रहा था, इसलिए दो नौकर हाथ में खुरपी लिए सूरण आदि खोदकर निकालने के लिए चल पड़े। जब उन्होंने खुरपी से जमीन पर आघात किया तो वे यह देखकर भयभीत और विस्मित हुए कि जमीन से खून की धारा बह निकली है। भागकर वे मठ में लौट आए और स्वामियार को सब बातें बता दीं। तब स्वामियार तुरंत उस जगह पर पहुंचे और उन्होंने सावधानीपूर्वक मिट्टी हटाकर देखा। तब उन्हें वहां एक शिवलिंग उगा हुआ मिला। चूंकि इस तरह स्वयंभू प्रकट हुए शिवलिंग को कोई देख लेने पर, तुंरत ही उसे नैवेद्य अर्पित न किया जाए तो वह अदृश्य हो जाता है, इसलिए स्वामियार ने मठ से पुष्प, चंदन आदि नैवेद्य की सारी सामग्री मंगवाई और पारेप्परंबु नंबूरी के हाथों से ही शिवलिंग को नैवेद्य दिलवाया और वहां एक पूजा भी करवाई। उसके बाद स्वामियार ने इस सबका विवरण पत्र में लिखकर उस पत्र को तेक्कुमकूर के राजा को भिजवा दिया।

पत्र मिलने पर राजा समझ गए कि उन्हें तृश्शिवपेरूर में जो स्वप्न हुआ था, वह घटित हो गया है, और वे अत्यंत प्रसन्न हुए और तुरंत ही नक्कराक्कुन्नु चल पड़े। वहां पहुंचकर राजा ने देखा कि शिवलिंग के आगे एक वृषभ है और उससे कुछ उत्तर दिशा में एक सफेद पुष्प वाली चेत्ती का पौधा भी उगा हुआ है। अब राजा को विश्वास हो गया कि स्वयं तृश्शिवपेरूर वडक्कुमनाथन ही यहां प्रकट हुए हैं।

उसके बाद तेक्कुमकूर राजा ने वहां चार गोपुरोंवाले, अनेक मंजिलों, नाट्यशाला, पाकशाला आदि से परिपूर्ण एक विशाल देवालय बनवा दिया तथा नित्य दान, हर महीने के लिए प्रमुख दिवस, घोषयात्रा का दिवस, उत्सव का दिवस आदि निश्चित कर दिए और इन सबके लिए आवश्यक धन-वस्तुओं, देवस्वम, आदि का भी इंतजाम कर दिया। तदनुसार मंदिर में नित्य पांच बार पूजा, तीन शिवेली, नवकम, पंचगव्यम आदि होने लगे, और हर साल, तुला, मीन, मिथुन, इन तीन महीनों में उत्सव भी आयोजित किया जाने लगा। एक महा देवालय में जो सब गतिविधियां होनी चाहिए, उन सबकी व्यवस्था उस राजा ने यहां भी कर दी। इस कारण से तिरुनक्करा का वह देवालय कुछ ही समय में अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हो गया। राजा ने उस देवालय के मुख्य पुजारी के रूप में पेरेप्परंबु के नंबूतिरी को ही नियुक्त भी कर दिया। चेंगष़श्शेरी और पुन्नश्शेरी इन दो घरानों के वरिष्ठ व्यक्ति को देव के परिचारक के रूप में उन्होंने नियुक्त कर दिया। स्वामियर मठ के जिन दो भृत्यों ने शिवलिंग की खोज की थी, उनके परिवार को राजा ने क्रमशः देवालय के दीपों की व्यवस्था करने और मंदिर की पाकशाला में चावल पहुंचाने का काम सौंप दिया।

यह सब हो जाने के कुछ ही समय बाद इस प्रदेश के लोग एक विकट उपद्रव का शिकार होने लगे। तिरुनक्करा में या उसके अड़ोस-पड़ोस में यदि कोई चावल या अन्य धान-तरकारी की खेती करे, तो रात के समय उन खेतों का बाड़ा तोड़कर एक सफेद सांड़ खेतों में घुस आ जाता था और सारी फसल चट कर जाता था। यह सांड़ किसका है, कहां से आता है, और रात बीतने के बाद कहां चला जाता है, यह सब किसी को भी ठीक-ठीक पता नहीं चल सका। न ही कोई उसे पकड़ने में ही सफल हो पाया। जब चांदनी खिली हो, तब दूर से देखने पर खेतों में वह सफेद सांड़ दिखाई दे जाता था, लेकिन जब कोई उसके निकट जाने की कोशिश करता, वह किसी तरह बचकर भाग निकल जाता था। उससे वहां की जनता खूब परेशान रहने लगी।

जब परिस्थितियां इस तरह की थीं, एक अच्छी चांदनी वाले दिन तिरुनक्करा से दो कोस पश्चिम में स्थित 'वेलूर' में एक परयन (एक निम्न जाति का व्यक्ति) ने उस सांड़ को खेतों में देखकर उस पर पत्थर फेंककर मारा। उसी रात राजा को एक सपना दिखा जिसमें एक सांड़ ने आकर उनसे इस प्रकार कहा, “आपने देव के लिए तो सब इंतजाम कर दिया, पर मेरे लिए कुछ भी नहीं किया। क्या मैं उनका वाहन नहीं हूं? मुझे दूसरों के खेतों से चुराकर अपना पेट भरना पड़ रहा है। इतना ही नहीं आज मैं एक परयन द्वारा फेंके गए पत्थर से घायल भी हो गया हूं। यह बहुत ही खेदजनक स्थिति है।” अगले दिन जब राजा ने इस स्वप्न के बारे में ज्योतिषियों को बुलाकर प्रश्न विचारकर देखा, तो पता चला कि यह सांड़ तिरुनक्करा देव का ही है और उसके लिए मंदिर में कोई व्यवस्था न किए जाने के कारण ही यह सब उपद्रव हो रहा है, तथा मंदिर के नैवेद्य में सांड़ के लिए भी एक अंश निर्धारित करना चाहिए। राजा ने ऐसा ही किया। वेलूर के जिस खेत में उस सांड़ को पत्थर फेंका गया था, उसे सांड़ के नाम करके देवस्वम को सौंप दिया ताकि उसकी उपज से सांड़ के नैवेद्य की सामग्री नियमित रूप से प्राप्त हो सके। आज भी उस खेत का नाम 'कालक्कंडम' (मलयालम में काला मने सांड़ और कंडम मने खेत होता है) चला आ रहा है।

इस प्रकार उस राजा ने तिरुनक्करा देव के मंदिर के लिए सब व्यवस्थाएं कर दीं और वहीं अपना तिंगल पूजा नियमित रूप करने लगे। इस तरह कई वर्ष बीत जाने पर तिंगल पूजा का अपना नियम बिना भंग किए ही वे एक दिन इस संसार से कूच कर गए।

(... जारी।)

23. तिरुनक्करा देव और उनका सांड़ - 1

26 जून, 2009

23. तिरुनक्करा देव और उनका सांड़ - 1

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

बहुत से लोगों ने तिरुवितांकूर के कोट्टयम नगर के मध्य स्थित तिरुनक्करा देवालय के बारे में सुना होगा। मुझे विश्वास है कि पाठकों को वहां के स्वयंभू शिव और सांड से संबंधिय ऐतीह्य सुनने में रुचि होगी।

पुराने समयों में एक तेक्कुमकूर राजा हुए जो नियमित रूप से तृश्शिवपेरूर वडक्कुमनाथन देवालय में तिंगल पूजा (हर महीने एक बार आकर देवालय में पूजा करना) करते थे। यदि एक महीने के अंतिम दिन देवालय पहुंचा जाए तो उस महीने की पूजा और अगले दिन अगले महीने की पूजा इस तरह दो महीने की पूजा एक साथ संपन्न की जा सकती है, और साल में केवल छह बार ही देवालय की यात्रा करना पर्याप्ता होता है। ये राजा भी यही करते थे। यों कई बरस बीत गए और एक बार भी बिना चूके ये देवालय में हर महीने तिंगल पूजा के लिए आते रहे। कुछ और वर्षों में राजा अत्यंत वृद्ध और रोग-ग्रस्त हो गए और शिव के इस अनन्य भक्त के लिए तृश्शिवपेरूर वडक्कुमनाथन के देवालय की यात्रा कर पाना अत्यंत कठिन हो गया। फिर भी तिंगल पूजा में व्यवधान न पड़े इसका उन्होंने यथासंभव प्रयास किया।

जब स्थिति इस तरह थी, एक बार महीने के अंतिम दिवस ये राजा नियमानुसार परिवार समेत तृश्शिवपेरूर आ पहुंचे। तब तक वे बहुत वृद्ध हो चुके थे और बड़ी मुश्किल से उन्होंने किसी तरह स्नानादि पूरा करके दूसरों की मदद से वडक्कुमनाथन के सामने पहुंचे और हाथ जोड़कर इस तरह प्रार्थना की, " हे भक्तवत्सल भगवान! मेरा यह नियम टूटने से पहले मुझे यहां से उठा ले और अपने पादारविंदों में स्थान दे दे! तिंगल पूजा न कर सकूं तो मैं जीवित भी नहीं रहना चाहता, और अब मैं इतना अशक्त हो गया हूं कि मेरे लिए यह यात्रा कर पाना संभव नहीं रह गया है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके मुझे अपने पास बुला ले।" उस दिन रात का भोजन समाप्त करके जब राजा सो रहे थे, तो उन्हें लगा कि कोई उनके निकट आकर इस तरह बोल रहा है, “अब मेरे दर्शन करने के लिए यहां आने का कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है। मैं ही 'नक्करा' की पहाड़ी पर आ जाऊंगा। मेरे आगे वृषभ होगा और पीछे सफेद चेत्ती का एक पौधा।“ तुरंत राजा ने आंखें खोलकर देखा, पर वहां कोई नहीं था। राजा ने मान लिया कि यह वडक्कुमनाथन ही थे जिन्होंने इस प्रकार कहा है, और वे फिर सो गए।

अगले दिन देव-दर्शन और भोजन करने के बाद राजा तृश्शिवपेरूर से चल पड़े।

यह सोचकर कि लौटते हुए वैक्कम के पेरुमतृक्कोविलप्पन के भी दर्शन करते जाना चाहिए, वे वहां की ओर मुड़े। जब वे देवालय में दाखिल हुए, उन्हें वहां एक ब्राह्मण दिखाई दिया जिसकी दाड़ी-मूछें और सिर के बाल खूब बढ़े हुए थे, शरीर पर भस्म लगा हुआ था, और गले में रुद्राक्ष की माला थी। राजा ने वहां मौजूद लोगों से पूछकर पता लगाया कि ये ब्राह्मण कौन हैं। तब उन्हें पता चला कि ये एक नंबूरी हैं जिनका घराना वैक्कम में ही है, और उसका नाम पेरेप्परंबु है। गरीबी अहस्य हो उठने से ये घर छोड़कर वैक्कम के देव की आराधना करने आए हैं और इन्होंने अभी दो-तीन दिन हुए संवत्सर-जप पूरा किया है। इन्हें कोई नित्यवृत्ति नहीं है और इनके घर में तीन चार बेटियां शादी के लिए तैयार हैं, पर इनके पास धन न होने से वे अभी अविवाहित हैं। तब राजा ने इन नंबूरी को अपने पास बुलवाया और उनसे यों कहा, “यदि आप मेरे साथ चलें, तो मैं आपकी एक-दो बेटियों के विवाह का बंदोबस्त करके दे सकता हूं।” यह सुनकर ये नंबूरी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “जैसी आपकी इच्छा” और जब राजा भगवद-दर्शन के बाद लौटे, तो वे भी उनके साथ चल दिए।

उन दिनों तेक्कुमकूर के राजाओं पर राज्य संचालन का कार्यभार था। उनकी राजधानी आज तिरुनक्करा देवालाय जहां स्थित है उससे एक कोस उत्तर में ‘तलियल’ नामक जगह में स्थित थी। इसलिए पेरेप्परंबु के वे नंबूतिरी राजा के साथ वहीं जा पहुंचे और वहीं रहने लगे।

(... जारी)

24 जून, 2009

22. कुमारनेल्लूर भगवती - 2

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

उन दिनों केरल भर के एकछत्र राजा चेरमानपेरुमाल का यह विचार था कि भगवती का एक देवालय बनवाना चाहिए, और वैकम के उदयनाथपुरम में भी सुब्रमण्यम के लिए एक मंदिर बनाना चाहिए। तदनुसार उन्होंने आजकल कुमारनेल्लूर कहे जानेवाले स्थान में भगवती के लिए और वैकम के उदयनाथपुरम में सुब्रमण्यम के लिए एक-एक भव्य मंदिर बनवा दिया और उनके भरण-पोषण के लिए विपुल व्यवस्था करने के बाद वे उनमें प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहे थे। जिस मंदिर में वह पुजारी जाकर सोया था, वह चेरमान पेरुमाल द्वारा कुमारस्वामी (सुब्रमण्यम) की प्रतिष्ठा करने के लिए बनवाया गया मंदिर ही था। जब सुबह पुजारी की नींद खुली तो चारों ओर के नजारे से वह बहुत विस्मित हुआ और मंदिर की भव्यता देखकर बोल पड़ा, “यह कैसा आश्चर्य है!” तब उसकी नजर गर्भगृह की ओर गई और उसने देखा कि कल रात उसके आगे-आगे जो दिव्य स्त्री भागी चली गई थी, वह सुब्रमण्यम के लिए बनाए गए चबूतरे पर विराजमान है। वह साक्षात मुदुरैमीनाक्षी देवी ही थी, यह कहना तो आवश्यक नहीं है।

तब उस ब्राह्मण ने मंदिर से बाहर निकल आकर वहां उसे मिले सभी लोगों को बुला बुलाकर कहा कि देखो इस देवालय में मदुरै मीनाक्षी आ गई हैं। यह सुनकर सब लोग मंदिर के गर्भगृह में जाकर देख आए। उन्हें वहां कुछ नहीं दिखा। वे सब यही पूछने लगे, “कहां बैठी हैं वह?” तब उस पुजारी ने उंगली से इशारा करते हुए कहा, “यह तो रही वह, गर्भगृह के चबूतरे पर।“ पर देवी केवल उस ब्राह्मण को दिखाई दे रही थी, और बाकी सबके लिए वह अदृश्य थी। इसलिए उन सबने कहा, “लगता है यह ब्राह्मण सठिया गया है, बे सिर पैर की हांक रहा है,” और वे उसे चिढ़ाने लगे। यह सब समाचार कानों-कान चेरुमान पुरमाल तक पहुंच गया और वे अपनी आंखों से सब कुछ देखने परखने के लिए वहां आ गए। उन्हें भी देवी नहीं दिखी, और वे ब्राह्मण से बोले, "यहां तो कुछ भी नहीं दिख रहा।“ तब ब्राह्मण ने कहा, “मुझे छूते हुए देखिए।“ जब चेरुमान पेरमाल ने उस ब्राह्मण को छूते हुए देखा, तो उन्हें सचमुच देवी गर्भगृह के अंदर चबूतरे पर बैठी हुई दिखी। उसके बाद चेरुमान पेरुमाल ने देवी के इस तरह वहां आ धमकने का कारण सब उस ब्राह्मण से पूछा और उस ब्राह्मण ने जो कुछ भी उसके साथ घटा था, वह सब राजा को विस्तार से बता दिया। जब राजा को सब बातें मालूम हो गईं, तो उन्हें आश्चर्य और विस्मय तो हुआ ही, ब्राह्मण पर पूर्ण विश्वास भी हो गया। लेकिन उन्हें थोड़ा क्रोध और इच्छाभंग की अनुभूति भी हुई। वे सोचने लगे, “मैंने सुब्रमण्यम की प्रतिष्ठा के लिए जो मंदिर बनवाया उसमें सुब्रमण्यम की प्रतिष्ठा नहीं हो सकी और यह देवी बिन बुलाए ही उसमें आ जमी। इस बत्तमीज देवी के लिए मैं कुछ भी नहीं करूंगा, न ही उसके देवालय के रखरखाव के लिए ही कुछ व्यवस्था करूंगा। यदि उसमें इतना ही पराक्रम है, तो वह स्वयं ही इन सबका बंदोबस्त कर ले। मैंने जो मुहूर्त निश्चय किया है उसमें मैं सुब्रमण्यम की प्रतिमा की प्रतिष्ठा अवश्य करूंगा, लेकिन अब मुझे वह देवी प्रतिष्ठा के लिए जो स्थल चुना था, वहां करना पड़ेगा। यह लो, मैं अभी ही वैकम के लिए प्रस्थान करता हूं। यह यहीं बैठी रहे।" यों सोचते हुए वे राजा उसी वक्त वहां से चले भी गए।

अभी चेरुमान पेरुमाल उत्तर दिशा में पांच कोस भी नहीं गए थे कि वह सारा प्रदेश अत्यंत घने और भीषण कुहरे से ढंक गया। राजा को और उनके साथ मौजूद व्यक्तियों को कुछ भी दिखना बंद हो गया। चूंकि उन्हें यह समझ नहीं पड़ रहा था कि रास्ता कहां है, उन सबको वहीं रुक जाना पड़ा। तब चेरुमान पेरुमाल के एक सहायक ने कहा, "हम पर यह जो विपत्ति आ पड़ी है, लगता है वह उस देवी की माया वैभव के ही कारण है। अन्यथा इस समय ऐसे कोहरे के आने का कोई वजह नहीं है। उस देवी का माहात्म्य बहुत अधिक प्रतीत होता है। उस देवी और उस ब्राह्मण के यहां आ पहुंचने के प्रसंग से ही यह बात स्पष्ट है। इसलिए मुझे लगता है कि हम सबको लौट जाना चाहिए और वहां सब व्यवस्था कर देनी चाहिए।“ यह सुनकर चेरुमान पेरुमाल बोले, “यदि यह सचमुच उस देवी के माया वैभव का फल है तो इसी क्षण हमें दिखने लगे, यदि ऐसा होता है, तो यहां से जो सब प्रदेश दिखाई देता है, वह सब प्रदेश मैं उस देवी को दे देने को तैयार हूं। इतना ही नहीं वहां जो कुछ भी जरूरी हो, वह सब भी कर दूंगा।" तुरंत ही कुहरा छंट गया और सब लोगों को सब कुछ पहले जैसे ही दिखने लगा। यह देखकर चेरुमान पेरुमाल ने उसी क्षण घोषित कर दिया कि वह सब प्रदेश उन्होंने उस देवी के हवाले कर दिया है, और वहां से लौट चले। कोहरे से भर गए उस देश को मंञ्ञूर (कोहरे को मलयालम में मंञु और प्रदेश को ऊर कहते हैं) कहा जाने लगा जो बाद में माञ्ञूर हो गया। आज भी माञ्ञूर कहा जानेवाला सारा प्रदेश कुमारनेल्लूर देवी की ही बनी हुई है।

इस घटना के बाद चेरुमान पेरुमाल उस स्थान को लौट आए जहां उन्हें देवी का सान्निध्य प्राप्त हुआ था। वहां उन्होंने देवी की प्रतिष्ठा कराने का निश्चय किया और इसके लिए आवश्यक सब व्यवस्था करने के लिए वहीं रुक गए। यहां प्रतिष्ठा करने के लिए सुब्रमण्यम की जो प्रतिमा उन्होंनं बनवाई थी, उसे उदयनाथपुरम भिजवा दिया और देवी विग्रह को यहां ले आने का आदेश जारी किया।

जब विग्रह प्रतिष्ठा का मुहूर्त निकट आने लगा, तो राजा को यह सूचना मिली कि उदयनापुरम से देवी की प्रतिमा समय पर यहां नहीं पहुंच पाएगी। यह सुनकर उनकी बहुत ही विषम स्थिति हो गई। उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आया कि अब क्या किया जाए। नई प्रतिमा बनवाने के लिए भी पर्याप्त समय नहीं था। यदि इसी मुहूर्त पर विग्रह प्रतिष्ठा नहीं की गई तो मान-हानि तो होगी ही, उन्होंने इस समारोह के लिए जो भारी द्रव्य खर्च किया था, वह भी सब व्यर्थ चला जाएगा। इतना ही नहीं, इतना बढ़िया और इतना शुद्ध मुहूर्त अब कई दिनों तक न मिल पाने की संभावना भी प्रबल थी। यह सब सोचकर चेरुमान पेरुमाल किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए।

उस रात जब चेरुमान पेरुमाल सो रहे थे, तब उन्हें एक सपना दिखाई दिया जिसमें किसी ने उनके पास आकर कहा, “आप बिलकुल चिंता न करें। यहां से उत्तरपूर्वी दिशा में दो कोस की दूरी पर जंगल में एक पुराना कुंआ है। उस कुंए में मेरी एक अच्छी प्रतिमा पड़ी है। उसे बाहर निकालकर यहां प्रतिष्ठित कर दीजिए।“ सुबह उठने पर चेरुमान पेरुमाल ने निश्चय किया कि यह पता लगाना जरूरी है कि यह सपना सही है या नहीं, और दलबल के साथ उत्तरपूर्वी दिशा में पर्वत चढ़ने लगे। वहां सब घना जंगल था। राजा को जंगल काटकर साफ करते हुए आगे बढ़ना पड़ा। यों कुछ दूर जाने पर उन्हें एक कुंआ मिला। उसमें आदमी उतारा गया। तब उनहें बिना किसी प्रकार की खोट वाली देवी की एक सुंदर मूर्ति उस कुंए से मिली। चेरुमान पेरुमाल उस श्रेष्ठ मूर्ति को सावधानीपूर्वक उठवाकर मंदिर ले आए और शुभ मुहूर्त में उसकी प्रतिष्ठा करवा दी, लेकिन कुमार (सुब्रमण्य) स्वामी की प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने जो भव्य मंदिर बनवाया था, उसका नाम पहले के उनके निश्चय के अनुसार कुमारनेल्लूर ही रहने दिया। इसके बाद चेरुमान पेरुमाल ने सारे माञ्ञूर प्रदेश से अपनी सत्ता हटा ली, और उस प्रदेश को देवी के हवाले कर दिया। वहां से जाने से पहले मंदिर में नित्य पूजा, मासिक पूजा, उत्सव आदि की पूरी व्यवस्था कर दी। इन सबके लिए उन्होंने पर्याप्त द्रव्य सामग्री और नियमावलियां और परिपाटियां निश्चित कर दीं। उन्होंने एक देवस्वम की स्थापना की और उसका संचालन उस प्रदेश के कुछ नंबूतिरी घरानों के हाथों में सौंप दिया। इस तरह कुमारनेल्लूर एक समुदाय-शासित देवालय में बदल गया।

चेरुमान पेरुमाल ने तय किया था कि कुमारनेल्लूर में तुला माह की रोहिणी से लेकर वृच्छी माह की रोहिणी तक इक्कीस दिनों का उत्सव मनाया जाएगा। उस मंदिर के माञ्ञूर के नंबूतिरियों के हाथों में आ जाने के कई वर्षों तक इस परिपाटी का पालन होता रहा। बाद में उत्सव के दिनों को थोड़ा घटाकर वृच्छी माह के कार्ती के नौवें दिन से शुरू करके दस दिनों का कर दिया गया। आज भी वहां दस दिनों का उत्सव ही होता है। देवी के माहात्म्य और शक्ति के कारण उस मंदिर की अभिवृद्धि निरंतर होती गई। आज भी यही हाल है। यही कहा जाता है कि देवालय का संचालन यदि कोई देवी करे, तो वह अवगुण युक्त माना जाएगा। लेकिन कुमारनेल्लूर इसका स्पष्ट अपवाद प्रतीत होता है। उस भगवती के कारनामों का यदि वर्णन शुरू किया जाए तो उसका अंत ही नहीं होगा। आज भी उस मंदिर में देवी सान्निध्य देखा जा सकता है।

देवी के साथ मदुरै से जो ब्राह्मण चला आया था, उसके वंशज आज भी कुमारनेल्लूर में हैं। उन्हें मदुरै नंबूतिरी कहा जाता है।

22. कुमारनेल्लूर भगवती - 1

(समाप्त। अब नई कहानी।)

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