23 जून, 2009

22. कुमारनेल्लूर भगवती

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

केरल में ऐसा कोई नहीं होगा जिसने तिरुवितांकूर राज्य के समुदाय-प्रशासित देवालयों में अग्रणी एवं एट्टुमानूर तालुका में स्थित सुप्रसिद्ध कुमारनेल्लूर देवलाय के बारे में नहीं सुना हो। वहां की देवी के निम्नलिखित स्तोत्र को भी अनेक लोगों ने सुना होगा, यद्यपि वह उतना सुंदर नहीं है:-

शंखुंडिटत्तु वलमेयोरु चक्रमुंडु
कालिल चिलंबु चिल मुत्तुपडम कषुत्तिल
ओडीट्टु वन्नु कूडिकोंडे कुमारनेल्लूर-
कार्त्यायनी! शरणमेन्नि ता कै तोषुन्नेन

(अर्थ:- शंख जहां है, उसके दाएं चक्र है,
पैरों में पायल और गले में मोती की माला है
दौड़कर चढ़ बैठी कुमारनेल्लूर-
कार्त्यायनी! हाथ जोड़कर मैं नमस्कार करता हूं, मुझे शरण दे)

लेकिन इस स्तोत्र में “दौड़कर चढ़ बैठी” का तात्पर्य क्या है, इसे जाननेवाले लोग आजकल कम होंगे। इसलिए इस प्रसंग के बारे में कम शब्दों में यहां बताता हूं।

पुराने जमाने में “मदुरैमीनाक्षी” के नाम से जानी जानेवाली देवी का प्रसिद्ध देवालय पांड्य राजाओं के देश में उनकी राजधानी मदुरै में स्थित था। इस देवालय की व्यवस्था स्वयं पांड्य राजा करते थे। ये राजा इस देवी को अपनी कुल देवी के रूप में मानते थे और उसके प्रति अनन्य श्रद्धा रखते थे।

एक बार उस देवी की प्रतिमा का एक अत्यंत बेशकीमती रत्न-जटित नथ गुम हो गया। शायद पुरोहित द्वारा सुबह होने पर पिछली रात के फूल, हार आदि को प्रतिमा से हटाते समय नथ गिर गया था, और उन मुर्झाए पुष्पों और मालाओं के साथ ही कचरे में फेंक दिया गया था, अथवा अभिषेक आदि करते समय वह दूध, घी, आदि द्रवों के साथ बहकर नाले में चला गया था, या पूजा करते समय अनजाने में पुजारी का हाथ लगने से वह प्रतिमा से उखड़ गया था। ठीक ठीक किस तरह वह गुम हुआ, यह कोई भी निश्चयपूर्वक नहीं जान सका। जब पांड्य राजा को पता चला कि देवी का नथ गुम हो गया है, तो उन्होंने अनेक विधियों से पूछताछ कराई पर नथ का कुछ भी पता न चल सका। अंत में राजा इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रतिमा की वस्तुओं को पुजारी के सिवा और कोई हाथ नहीं लगाता, इसलिए पुजारी की जानकारी के बिना वह नथ कहीं नहीं जा सकता है। राजा का इस तरह सोचना अनुचित भी नहीं था। फिर भी सचाई यह थी कि पुजारी मंदिर का काफी पुराना सेवक था और देवी में उसकी अटल आस्था थी और उसे सचमुच पता नहीं था कि देवी का नथ किस तरह गुम हुआ और वह इस समय कहां है। देवी को रोज पहनाए जानेवाले इस आभूषण के खो जाने से उसे भी अतीव दुख और मानसिक क्लेष हो रहा था। पर यह सब राजा क्या जाने। अपने कठोर शासन के लिए प्रसिद्ध पांड्य राजा ने पुजारी को गिरफ्तार कर लिया और उससे कठोरतापूर्वक पूछताछ करने लगे। पर उस निर्दोष पुजारी ने यही जवाब दिया कि मुझे नथ के खो जाने के संबंध में कुछ भी नहीं पता है। अंत में राजा ने आदेश दिया कि चालीस दिनों के अंदर पुजारी किसी भी तरह वह नथ ढूंढ़कर लाए, वरना उसका सिर कलम कर लिया जाएगा। यह सुनकर पुजारी ने कुछ भी नहीं कहा, और दुखी मन से राजा के सामने से हट गया। उस ब्राह्मण-श्रेष्ठ ने कई प्रकार से नथ के संबंध में अन्वेषण किया पर वह नहीं मिला तो नहीं मिला। इस तरह उनचालीस दिन बीत गए। उनचालीसवीं रात को वह ब्राह्मण यह सोचते हुए कि सुबह होते ही मेरा शिरोच्छेद कर दिया जाएगा, अत्यंत खिन्न मन से लेट गया और आंखें बंद कर लीं। वह अभी अधिक समय नहीं सोया होगा कि उसे लगा कि कोई उसके निकट आया हुआ है और उससे कह रहा है, "अब आप यहां रहेंगे तो विपत्ति की संभावना है। देखिए, सभी पहरेदार गहरी नींद में हैं। इसका लाभ उठाकर आप मंदिर से बाहर निकलकर कहीं भाग जाइए। तब आप किसी सुरक्षित स्थल में पहुंचकर अपनी जान बचा सकेंगे।" तुरंत उस ब्राह्मण ने आंखें खोलकर देखा, पर वहां कोई नहीं था। तब यह कहते हुए कि, इस तरह किसने बोला होगा? वह दुबारा लेट गया। लेटे-लेटे वह सोचने लगा, जरूर मैंने कोई सपना देखा होगा। उसकी आंखें फिर लग गईं। तब फिर से उसी व्यक्ति ने उसके निकट आकर कहा, “क्यों जी नहीं जा रहे हैं? जल्दी जाना होगा। संशय न करें। अभी नहीं गए, तो बच नहीं पाएंगे।” पुजारी ने एक बार फिर आंखें खोलकर देखा, वहां कोई नहीं था। वह फिर सो गया। तब तीसरी बार वह व्यक्ति प्रकट हुआ और उसने वही बात फिर से कही। तब पुजारी ने सोचा, “जो भी हो, इस चेतावनी को नजरंदाज करना अब उचित नहीं लगता। हो सकता है कि यह देवी ही ने मुझे चेताया हो। इसलिए जल्दी से जहां से भाग चलना ही ठीक होगा।” इस निश्चय पर पहुंचकर वह ब्राह्मण चुपके से वहां से उठकर कुछ ही पलों में देवालय के बाहर आ गया और तुरंत ही वहां से भागने लगा। तब एक सर्वांगसुंदरी दिव्य स्त्री भी यह कहते हुए भागकर उनके साथ हो ली - “आपने बहुत समय से मेरी सेवा की है। इसलिए यदि आप यहां से जा रहे हैं, तो मैं भी यहां नहीं रुकूंगी”। कुछ और दूर जाने पर वह स्त्री पुजारी से आगे निकल गई और पुजारी उसके पीछे-पीछे भागने लगा। बिलकुल अंधेरी रात होने पर भी, उस दिव्य स्त्री की देह से निकलनेवाली कांति और उसके आभूषणों की झिलमिलाहट के कराण पुजारी को रास्ता बिलकुल साफ-साफ सूझने लगा। इस तरह वे दोनों कुछ चार-पांच कोस तक भागते चले गए। तब अचानव वह स्त्री अंतर्धान हो गई। इससे एक बार फिर चारों तरफ गहन अंधकार छा गया। कुछ भी न दिखने के कारण उस ब्राह्मण को भागना तो क्या चलना भी दुष्कर हो गया। तब उसे अत्यधिक डर लगने लगा और वह बहुत घबराया। फिर भी किसी तरह आगे बढ़ता रहा। अब तक वह काफी थक चुका था और उसके लिए चलते जाना अत्यंत कठिन प्रतीत हो रहा था। उसे यह डर भी था कि कहीं राजा के अनुचर उसका पीछा करते हुए वहां आ न पहुंचें। फिर भी उसके लिए यह जरूरी हो गया कि कहीं रुककर थोड़ा विश्राम किया जाए। तब आकाश में बिजली के चमकने की रोशनी में उसे रास्ते के पास ही एक मंदिर के होने का आभास हुआ। गिरते पड़ते, वह उसी दिशा में चल दिया और घुटनों के सहारे और हाथ से पकड़-पकड़कर किसी तरह मंदिर की सीढ़िया चढ़कर उसके चबूतरे में आ गया। फिर ऊपर के वस्त्र को बिछाकर वह चबूतरे में लेट गया और तुंरत ही थकावट के कारण गहरी नींद में चला गया।

(...जारी।)

4 Comments:

राज भाटिय़ा said...

कहानी बहुत सुंदर लगी इंतजार है अगली कडी का
धन्यवाद
मुझे शिकायत है
पराया देश
छोटी छोटी बातें
नन्हे मुन्हे

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अगली कडी का इंतजार है.

P.N. Subramanian said...

कहानी तो सुनी हुई है परन्तु यहाँ विस्तार से पढने मिल रहा है. अगली कड़ी कि प्रतीक्षा में

गिरिजेश राव said...

नथ बहुत महत्त्वपूर्ण आभूषण है। देवी का हो तो और भी।

उस समय के देवी देवता भी बड़े वफादार होते थे। अब आगे जाने क्या घटे?

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