26 जून, 2009

23. तिरुनक्करा देव और उनका सांड़ - 1

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

बहुत से लोगों ने तिरुवितांकूर के कोट्टयम नगर के मध्य स्थित तिरुनक्करा देवालय के बारे में सुना होगा। मुझे विश्वास है कि पाठकों को वहां के स्वयंभू शिव और सांड से संबंधिय ऐतीह्य सुनने में रुचि होगी।

पुराने समयों में एक तेक्कुमकूर राजा हुए जो नियमित रूप से तृश्शिवपेरूर वडक्कुमनाथन देवालय में तिंगल पूजा (हर महीने एक बार आकर देवालय में पूजा करना) करते थे। यदि एक महीने के अंतिम दिन देवालय पहुंचा जाए तो उस महीने की पूजा और अगले दिन अगले महीने की पूजा इस तरह दो महीने की पूजा एक साथ संपन्न की जा सकती है, और साल में केवल छह बार ही देवालय की यात्रा करना पर्याप्ता होता है। ये राजा भी यही करते थे। यों कई बरस बीत गए और एक बार भी बिना चूके ये देवालय में हर महीने तिंगल पूजा के लिए आते रहे। कुछ और वर्षों में राजा अत्यंत वृद्ध और रोग-ग्रस्त हो गए और शिव के इस अनन्य भक्त के लिए तृश्शिवपेरूर वडक्कुमनाथन के देवालय की यात्रा कर पाना अत्यंत कठिन हो गया। फिर भी तिंगल पूजा में व्यवधान न पड़े इसका उन्होंने यथासंभव प्रयास किया।

जब स्थिति इस तरह थी, एक बार महीने के अंतिम दिवस ये राजा नियमानुसार परिवार समेत तृश्शिवपेरूर आ पहुंचे। तब तक वे बहुत वृद्ध हो चुके थे और बड़ी मुश्किल से उन्होंने किसी तरह स्नानादि पूरा करके दूसरों की मदद से वडक्कुमनाथन के सामने पहुंचे और हाथ जोड़कर इस तरह प्रार्थना की, " हे भक्तवत्सल भगवान! मेरा यह नियम टूटने से पहले मुझे यहां से उठा ले और अपने पादारविंदों में स्थान दे दे! तिंगल पूजा न कर सकूं तो मैं जीवित भी नहीं रहना चाहता, और अब मैं इतना अशक्त हो गया हूं कि मेरे लिए यह यात्रा कर पाना संभव नहीं रह गया है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके मुझे अपने पास बुला ले।" उस दिन रात का भोजन समाप्त करके जब राजा सो रहे थे, तो उन्हें लगा कि कोई उनके निकट आकर इस तरह बोल रहा है, “अब मेरे दर्शन करने के लिए यहां आने का कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है। मैं ही 'नक्करा' की पहाड़ी पर आ जाऊंगा। मेरे आगे वृषभ होगा और पीछे सफेद चेत्ती का एक पौधा।“ तुरंत राजा ने आंखें खोलकर देखा, पर वहां कोई नहीं था। राजा ने मान लिया कि यह वडक्कुमनाथन ही थे जिन्होंने इस प्रकार कहा है, और वे फिर सो गए।

अगले दिन देव-दर्शन और भोजन करने के बाद राजा तृश्शिवपेरूर से चल पड़े।

यह सोचकर कि लौटते हुए वैक्कम के पेरुमतृक्कोविलप्पन के भी दर्शन करते जाना चाहिए, वे वहां की ओर मुड़े। जब वे देवालय में दाखिल हुए, उन्हें वहां एक ब्राह्मण दिखाई दिया जिसकी दाड़ी-मूछें और सिर के बाल खूब बढ़े हुए थे, शरीर पर भस्म लगा हुआ था, और गले में रुद्राक्ष की माला थी। राजा ने वहां मौजूद लोगों से पूछकर पता लगाया कि ये ब्राह्मण कौन हैं। तब उन्हें पता चला कि ये एक नंबूरी हैं जिनका घराना वैक्कम में ही है, और उसका नाम पेरेप्परंबु है। गरीबी अहस्य हो उठने से ये घर छोड़कर वैक्कम के देव की आराधना करने आए हैं और इन्होंने अभी दो-तीन दिन हुए संवत्सर-जप पूरा किया है। इन्हें कोई नित्यवृत्ति नहीं है और इनके घर में तीन चार बेटियां शादी के लिए तैयार हैं, पर इनके पास धन न होने से वे अभी अविवाहित हैं। तब राजा ने इन नंबूरी को अपने पास बुलवाया और उनसे यों कहा, “यदि आप मेरे साथ चलें, तो मैं आपकी एक-दो बेटियों के विवाह का बंदोबस्त करके दे सकता हूं।” यह सुनकर ये नंबूरी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “जैसी आपकी इच्छा” और जब राजा भगवद-दर्शन के बाद लौटे, तो वे भी उनके साथ चल दिए।

उन दिनों तेक्कुमकूर के राजाओं पर राज्य संचालन का कार्यभार था। उनकी राजधानी आज तिरुनक्करा देवालाय जहां स्थित है उससे एक कोस उत्तर में ‘तलियल’ नामक जगह में स्थित थी। इसलिए पेरेप्परंबु के वे नंबूतिरी राजा के साथ वहीं जा पहुंचे और वहीं रहने लगे।

(... जारी)

2 Comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छा लगा यह यह कथा पढ कर, आप का धन्यवाद

गिरिजेश राव said...

अपने काम की चीज है 'सफेद चेत्ती का एक पौधा'। details ?

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