27 जून, 2009

23. तिरुनक्करा देव और उनका सांड़ - 2

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

जब ये नंबूरी तलियल में रह रहे थे, एक दिन वे राजा को सूचित करके तिरुनक्करा स्वामियार के मठ को चल पड़े। उन्होंने ऐसा यही सोचकर किया कि यदि स्वामियार से मिलकर उनसे अपनी स्थिति के बारे में बताऊं तो वे शायद मेरी कुछ मदद कर सकेंगे। मठ में पहुंचकर पेरप्परंबु नंबूरी ने स्वामियार से अपने कष्टों की कथा सुनाई। चूंकि चौमासा शुरू हो चुका था, स्वामियार ने उनसे अनुरोध किया कि बारिश का मौसम समाप्त होने तक वे मठ में ही रुकें। उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि मैं आपकी कुछ मदद करूंगा। इसलिए पेरेप्परंबु नंबूरी वहीं रुक गए।

आज जिस प्रदेश में तिरुनक्करा का देवालय है वह उन दिनों घना जंगल था। उसे नक्कराक्कुन्नु (नक्करा की पहाड़ी) ही कहा जाता था। वहां देव सान्निध्य और देवालय के बन जाने के बाद ही नक्करा तिरुनक्करा बना (मलायालम में तिरु का मतलब श्री होता है)। स्वयं नक्करा भी मूल शब्द नलक्करा का संक्षिप्त रूप है। स्वामियार के नौकर उस पहाड़ी की जमीन पर सूरण, अरबी आदि कंद-मूलों की कृषि करते थे। चौमासे की समाप्ति पर मठ में एक भोज होता था, और चूंकि इस भोज का समय निकट आ रहा था, इसलिए दो नौकर हाथ में खुरपी लिए सूरण आदि खोदकर निकालने के लिए चल पड़े। जब उन्होंने खुरपी से जमीन पर आघात किया तो वे यह देखकर भयभीत और विस्मित हुए कि जमीन से खून की धारा बह निकली है। भागकर वे मठ में लौट आए और स्वामियार को सब बातें बता दीं। तब स्वामियार तुरंत उस जगह पर पहुंचे और उन्होंने सावधानीपूर्वक मिट्टी हटाकर देखा। तब उन्हें वहां एक शिवलिंग उगा हुआ मिला। चूंकि इस तरह स्वयंभू प्रकट हुए शिवलिंग को कोई देख लेने पर, तुंरत ही उसे नैवेद्य अर्पित न किया जाए तो वह अदृश्य हो जाता है, इसलिए स्वामियार ने मठ से पुष्प, चंदन आदि नैवेद्य की सारी सामग्री मंगवाई और पारेप्परंबु नंबूरी के हाथों से ही शिवलिंग को नैवेद्य दिलवाया और वहां एक पूजा भी करवाई। उसके बाद स्वामियार ने इस सबका विवरण पत्र में लिखकर उस पत्र को तेक्कुमकूर के राजा को भिजवा दिया।

पत्र मिलने पर राजा समझ गए कि उन्हें तृश्शिवपेरूर में जो स्वप्न हुआ था, वह घटित हो गया है, और वे अत्यंत प्रसन्न हुए और तुरंत ही नक्कराक्कुन्नु चल पड़े। वहां पहुंचकर राजा ने देखा कि शिवलिंग के आगे एक वृषभ है और उससे कुछ उत्तर दिशा में एक सफेद पुष्प वाली चेत्ती का पौधा भी उगा हुआ है। अब राजा को विश्वास हो गया कि स्वयं तृश्शिवपेरूर वडक्कुमनाथन ही यहां प्रकट हुए हैं।

उसके बाद तेक्कुमकूर राजा ने वहां चार गोपुरोंवाले, अनेक मंजिलों, नाट्यशाला, पाकशाला आदि से परिपूर्ण एक विशाल देवालय बनवा दिया तथा नित्य दान, हर महीने के लिए प्रमुख दिवस, घोषयात्रा का दिवस, उत्सव का दिवस आदि निश्चित कर दिए और इन सबके लिए आवश्यक धन-वस्तुओं, देवस्वम, आदि का भी इंतजाम कर दिया। तदनुसार मंदिर में नित्य पांच बार पूजा, तीन शिवेली, नवकम, पंचगव्यम आदि होने लगे, और हर साल, तुला, मीन, मिथुन, इन तीन महीनों में उत्सव भी आयोजित किया जाने लगा। एक महा देवालय में जो सब गतिविधियां होनी चाहिए, उन सबकी व्यवस्था उस राजा ने यहां भी कर दी। इस कारण से तिरुनक्करा का वह देवालय कुछ ही समय में अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हो गया। राजा ने उस देवालय के मुख्य पुजारी के रूप में पेरेप्परंबु के नंबूतिरी को ही नियुक्त भी कर दिया। चेंगष़श्शेरी और पुन्नश्शेरी इन दो घरानों के वरिष्ठ व्यक्ति को देव के परिचारक के रूप में उन्होंने नियुक्त कर दिया। स्वामियर मठ के जिन दो भृत्यों ने शिवलिंग की खोज की थी, उनके परिवार को राजा ने क्रमशः देवालय के दीपों की व्यवस्था करने और मंदिर की पाकशाला में चावल पहुंचाने का काम सौंप दिया।

यह सब हो जाने के कुछ ही समय बाद इस प्रदेश के लोग एक विकट उपद्रव का शिकार होने लगे। तिरुनक्करा में या उसके अड़ोस-पड़ोस में यदि कोई चावल या अन्य धान-तरकारी की खेती करे, तो रात के समय उन खेतों का बाड़ा तोड़कर एक सफेद सांड़ खेतों में घुस आ जाता था और सारी फसल चट कर जाता था। यह सांड़ किसका है, कहां से आता है, और रात बीतने के बाद कहां चला जाता है, यह सब किसी को भी ठीक-ठीक पता नहीं चल सका। न ही कोई उसे पकड़ने में ही सफल हो पाया। जब चांदनी खिली हो, तब दूर से देखने पर खेतों में वह सफेद सांड़ दिखाई दे जाता था, लेकिन जब कोई उसके निकट जाने की कोशिश करता, वह किसी तरह बचकर भाग निकल जाता था। उससे वहां की जनता खूब परेशान रहने लगी।

जब परिस्थितियां इस तरह की थीं, एक अच्छी चांदनी वाले दिन तिरुनक्करा से दो कोस पश्चिम में स्थित 'वेलूर' में एक परयन (एक निम्न जाति का व्यक्ति) ने उस सांड़ को खेतों में देखकर उस पर पत्थर फेंककर मारा। उसी रात राजा को एक सपना दिखा जिसमें एक सांड़ ने आकर उनसे इस प्रकार कहा, “आपने देव के लिए तो सब इंतजाम कर दिया, पर मेरे लिए कुछ भी नहीं किया। क्या मैं उनका वाहन नहीं हूं? मुझे दूसरों के खेतों से चुराकर अपना पेट भरना पड़ रहा है। इतना ही नहीं आज मैं एक परयन द्वारा फेंके गए पत्थर से घायल भी हो गया हूं। यह बहुत ही खेदजनक स्थिति है।” अगले दिन जब राजा ने इस स्वप्न के बारे में ज्योतिषियों को बुलाकर प्रश्न विचारकर देखा, तो पता चला कि यह सांड़ तिरुनक्करा देव का ही है और उसके लिए मंदिर में कोई व्यवस्था न किए जाने के कारण ही यह सब उपद्रव हो रहा है, तथा मंदिर के नैवेद्य में सांड़ के लिए भी एक अंश निर्धारित करना चाहिए। राजा ने ऐसा ही किया। वेलूर के जिस खेत में उस सांड़ को पत्थर फेंका गया था, उसे सांड़ के नाम करके देवस्वम को सौंप दिया ताकि उसकी उपज से सांड़ के नैवेद्य की सामग्री नियमित रूप से प्राप्त हो सके। आज भी उस खेत का नाम 'कालक्कंडम' (मलयालम में काला मने सांड़ और कंडम मने खेत होता है) चला आ रहा है।

इस प्रकार उस राजा ने तिरुनक्करा देव के मंदिर के लिए सब व्यवस्थाएं कर दीं और वहीं अपना तिंगल पूजा नियमित रूप करने लगे। इस तरह कई वर्ष बीत जाने पर तिंगल पूजा का अपना नियम बिना भंग किए ही वे एक दिन इस संसार से कूच कर गए।

(... जारी।)

23. तिरुनक्करा देव और उनका सांड़ - 1

2 Comments:

राज भाटिय़ा said...

मजेदार कथा, इंतजार रहेगा अगली कडी का.
धन्यवाद

'अदा' said...

bahut hi badhiya katha, mujhe pratiksha hai agli kadi ki,
samay nikaal agar mere blog par bhi aapke charan-kamal pade to ahobhagya hoga hamara

swapn manjusha 'ada'
http://swapnamanjusha.blogspot.com/

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट