26 अप्रैल, 2009

६. परयी से जनमा पंदिरम कुल -1 : वररुचि

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

इतिहास-प्रसिद्ध गोविंदस्वामी के पुत्र और मलयालम भाषा में "नडप्पुल्ल वाक्यम्", "परल्पेरु" आदि ज्योतिष-शास्त्र के ग्रंथों के रचयिता बताए जाने वाले वररुचि नाम के ब्राह्मण-श्रेष्ठ के संबंध में जो न जानते हों, उनकी संख्या शायद बहुत अधिक न होगी। ये महोदय राजा विक्रमादित्य की सेवा में थे। चूंकि वे सकलशास्त्रपारंगत और पुराणों के विद्वान थे, जब भी राजा को शास्त्रों को लेकर कोई संशय होता, वे उनसे परामर्श करके अपनी शंका का समाधान करते थे।

एक दिन राजा विक्रमादित्य ने वररुचि से पूछा, "रामायण का सबसे महत्वपूर्ण श्लोक कौन सा है? इस श्लोक का प्रधान वाक्य कौन सा है?" वररुचि इस सवाल का कोई संतोषजनक उत्तर न दे सके और उन्हें बड़ी ग्लानि हुई। राजा ने तुरंत कहा, "यदि नहीं मालूम तो जाइए, किसी से पूछकर या कहीं जाकर पता लगाइए और इकतालीस दिन के अंदर मुझे आकर बताइए। यदि नहीं मालूम कर सके तो फिर यहां वापस आने की जरूरत नहीं, न ही मुझे आपका मुंह देखने की आवश्यकता रहेगी।" राजा के इस कठोर आदेश को सुनकर वररुचि का हृदय विषाद, चिंता एवं दुख से भर गया और उन्होंने तुरंत वहां से प्रस्थान कर दिया।

इसके बाद वररुचि ने कई स्थलों की यात्रा की और कई विद्वानों से परामर्श किया, लेकिन सभी ने यही कहा कि रामायण के सभी श्लोक और वाक्य एकसमान महत्वपूर्ण हैं। इसलिए मात्र एक श्लोक या वाक्य को कैसे चुना जा सकता है? "नहि गुणगुणिकयाः क्वापि माधुर्य भेदः" यह भी कई लोगों ने कहा, पर किसी ने भी सही जवाब नहीं दिया। यों चालीस दिन बीत गए। ब्राह्मण की बेचैनी असह्य हो उठी। राजा की नौकरी हाथ से निकल जाने की चिंता तो थी ही, इससे भी अधिक गंभीर चिंता अपमान की थी। अब तक लोगों में उनकी यही कीर्ति फैली थी कि वे सर्वज्ञ हैं। जब सर्वसाधारण को विदित होगा कि उनसे राजा के सवाल का जवाब नहीं देते बना, तो यह सारी कीर्ति धूल में मिल जाएगी। इस अपमान के बोझ तले स्वदेश में रहने से अच्छा मर जाना होगा। यों चितांतुर होकर आहार और जल तक की उपेक्षा करते हुए वह सरल ब्राह्मण दिन भर इधर-उधर भटकता रहा। रात होने पर वह जंगल में एक पीपल के चबूतरे पर जा पहुंचा। भूख, प्यास, थकान और चिंता से परेशान वह चबूतरे पर ही लेट गया और तुरंत गहरी नींद में सो गया। सोने से पहले उसने यह वाक्य उच्चरित किया, "वनदेवता मेरी रक्षा करें!"

लगभग आधी रात को आकाशमार्ग से गुजरनेवाले कुछ देवता उस पीपल पर आ रुके और उस पेड़ पर स्थायी रूप से रहनेवाले देवताओं को पुकारकर कहने लगे, "क्या आप लोग नहीं चल रहे? अभी एक जगह प्रसव होनेवाला है। हम लोग वहीं जा रहे हैं। यदि आपको भी रक्त और नीर का पान करना हो तो हमारे साथ चलिए।" तब पीपल के पेड़ के देवताओं ने कहा, "हम नहीं आ सकेंगे। यहां नीचे एक विशिष्ट ब्राह्मण लेटे हुए हैं। उन्होंने सोने से पहले अपनी सुरक्षा हेतु हमसे प्रार्थना की थी। इसलिए आप लोग हो आइए और लौटती बार यहां रुककर हमें सब हाल सुना जाइए।" "हम ऐसा ही करेंगे," यह कहकर आकाशमार्ग से आए देवता चले गए।

अंतिम पहर को वररुचि की नींद खुली पर बेचैनी के कारण वे आंखें मूंदे पड़े रहे और सोचते रहे, उठे नहीं। तभी पहले जो देवता चले गए थे, वे लौट आए। पीपल पर रहनेवाले देवताओं ने उनसे पूछा, "प्रसव कहां था? लड़का हुआ या लड़की?" तब आगंतुक देवताओं ने कहा, "एक परयन (एक नीच जाति) के यहां था। लड़की पैदा हुई।" "उससे विवाह करनेवाला कौन होगा?" पीपल वाले देवताओं ने जानना चाहा। आगंतुकों ने कहा, "'मां विद्धि' से बेखबर नीचे लेटा यह वररुचि ही।" इस संभाषण के बाद आगंतुक देवता अपने गंतव्य स्थान की ओर उड़ चले।

अत्यंत बुद्धिशाली वररुचि ने जब यह सुना तो उनका हृदय राजा द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर सहसा मिल जाने के आनंद और अपने अधःपतन की पूर्वसूचना पाने के विषाद इन दो विपरीत भावों से एक साथ भर गया। इसी समय अधोपतन से बचने का एक उपाय भी उन्हें सूझा और उस पर थोड़ा विचार करके एक निश्चय पर पहुंचकर वे संतोषपूर्वक उठे। तब तक सुबह हो चुकी थी और उन्होंने वहां से प्रस्थान किया।

इकतालीस दिन पूरे होने पर भी वररुचि का अता-पता न मिलने से राजा पर मायूसी छाने लगी थी, पर उनके सभा-सदस्यों को अपार संतोष की अनुभूति होने लगी। दरबार के अन्य विद्वानों को वररुचि से तीव्र ईर्ष्या थी, क्योंकि उनका मानना था कि वररुचि के होने के ही कारण राजा उनकी विद्वत्ता का पर्याप्त आदर नहीं करते और उनकी ख्याति पर्याप्त फैल नहीं पाती। दरबार लगने पर राजा ने कहा, "यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि हमारा वररुचि कहीं नजर नहीं आ रहा। उसने अपमान से बचने के लिए या तो आत्महत्या कर ली है, या देश त्याग दिया है। नहीं तो सभी शास्त्रों के मर्म को समझनेवाला वररुचि किसी प्रकार से हमारे सवाल का उत्तर खोज ही लाता।" वे यह सब विलाप कर ही रहे थे कि प्रसन्न मुख-मुद्रा लिए वररुचि वहां आ पहुंचे। उनके मुख पर छाए हुए प्रसन्नता के चिह्न देखकर ही राजा तथा उनके दरबारियों को ज्ञात हो गया कि वररुचि कार्य सिद्ध करके ही आ रहे हैं। तुरंत राजा ने पूछा, "क्यों वररुचि, मेरे प्रश्न का हल मिला?"

वररुचिः- "ईश्वर कृपा, गुरु के आशीर्वाद और आप सब महानुभावों के अनुग्रह से मिल गया, यों कहा जा सकता है।

राजाः- "तब बताइए, वह कौन-सा श्लोक है और उसका कौन-सा वाक्य?"

वररुचिः- रामायण का सबसे प्रधान श्लोक यह हैः-

रामं दशरथं विधि मां विद्धि जनकात्मजाम्।
अयोध्यामटविं विद्धि गच्छ तात यथासुखम्॥

इसका मुख्य वाक्य "मां विद्धि जनकात्मजाम्" है।

यह सुनने पर राजा समेत सभा के सभी सदस्यों ने एककंठ से प्रशंसा की और कहा, "खूब! खूब!" प्रसन्नता के अतिरेक में राजा अपने सिंहासन से उठकर आए और वररुचि को अपने हाथों से अपने पास वाले आसन पर सम्मानपूर्वक बैठलाया। फिर अमूल्य हीरे-जवाहरात और आभूषणों की भेंट देकर वररुचि को संतुष्ट किया और कहा कि वे पहले के जैसे ही राजसेवा में निरत रहें।

तब वररुचि ने ऊपर उल्लिखित श्लोक का दस प्रकार से अर्थ लगा करके राजा को सुनाया। उनमें से केवल दो का हम नीचे उल्लेख कर रहे हैं। यह श्लोक उस समय सुमित्रा ने लक्ष्मण से कहा था जब वे राम और सीता के साथ वन को प्रस्थान करने से पहले अपनी माता (सुमित्रा) के चरणों में पड़कर उनका आशीर्वाद ले रहे थे।

हे तात (वत्स) "रामं दशरथं विद्धि" अर्थात राम को दशरथ तुल्य समझना। तात्पर्य यह कि अपने बड़े भाई राम को पिता दशरथ के समान समझना। "जनकात्मजां मां विद्धि" जनकपुत्री (सीता) को अपनी मां (यानी कि मैं सुमित्रा) समझना। "अटविं अयोध्यां विद्धि" अर्थात अटवि (वन) को अयोध्या समझना। "यथासुखम् गच्छ", सुखपूर्वक प्रस्थान करो।

दूसरा अर्थः-

"रामं दशरथं विद्धि" राम को "दश-रथं" (पक्षी (गरुड) की सवारी करनेवाले महाविष्णु) समझना। "जनकात्मजां मां विद्धि" जनकपुत्री (सीता) को "मा" (महालक्ष्मी) समझना। "अयोध्याम् अटवीं" अयोध्या को (राम के चले जाने के बाद) "अटवि" (वन) समझना। (इसलिए) हे वत्स! तुम सुखपूर्वक प्रस्थान करो।

इस प्रकार वररुचि ने एक-के-बाद एक करके उपर्युक्त श्लोक के दस प्रकार से अर्थ बताए, जिसे सुनकर राजा की प्रसन्नता का पार न रहा और उन्होंने एक बार फिर अनेक प्रकार से वररुचि का सम्मान किया। इसके बाद सभी सभा-सदस्य विभिन्न राजनीतिक विषयों पर चर्चा करने लगे। तब वररुचि ने कहा, "महाराज, कल रात एक परयन के परिवार में एक परयी ने जन्म लिया है। उसके ग्रह-फल देखने पर मुझे विदित हुआ है कि जब वह लड़की तीन साल की हो जाएगी, इस राज्य का नाश हो जाएगा। आज से विनाश की प्रक्रिया आरंभ होने वाली है, इसलिए उसे तुरंत मरवा देना चाहिए। यह सुनकर राजा तथा सभी सभा-सदस्य अत्यंत चिंतित हो उठे, क्योंकि ज्योतिष-शास्त्र के परम विद्वान और अतिविशिष्ट ब्राह्मण वररुचि का वचन कभी भी झूठा नहीं निकलता था। फिर भी एक नवजात शिशु की हत्या कितनी जघन्य बात है, विशेषतः जब वह लड़की हो। स्त्री-हत्या बिलकुल शास्त्र-विरुद्ध है। ऐसे में क्या किया जाए, इस पर सभी दरबारी गंभीरता से विचार करने लगे और अंत में एक युक्ति ढूंढ़ निकाली। वह यह थी कि केले के पेड़ के तने से एक नाव बनवाकर उस पर बच्ची को लिटाकर नदी में बहा दिया जाए। बहाने से पहले बच्ची के सिर पर एक बत्ती जलाई जाए। इस युक्ति पर राजा भी सहमत हुए। तब कुछ राजकर्मचारियों को बुलाकर उन्हें इस योजना को कार्यान्वित करने का आदेश दिया गया। उन्हें वररुचि ने उस जगह तक पहुंचने का निर्देश दे दिया जहां वह बच्ची जनमी थी। राजकर्मचारी उस स्थल पर पहुंचे और बच्ची के सिर पर एक बत्ती सुलगाकर उसे नाव में लिटाकर नदी में बहा दिया। तत्पश्चात उन्होंने राजा को उनके आदेश के सफलतापूर्वक पालन की सूचना भी दे दी। इसे सुनकर वररुचि बहुत प्रसन्न हुए कि उनके भावी अधःपतन से बचने की उनकी युक्ति सफल हुई। इसके बाद वे राजसेवक के रूप में महल में ही रहे। कुछ समय बाद वे घर जाकर रहने लगे।

6 Comments:

मुनीश ( munish ) said...

sundar jaankari ! very nice post!

Mired Mirage said...

बहुत जानकारीपूर्ण लेख के लिए धन्यवाद। एक बात जो सोचने वाली है और जिसे हम वर्तमान समय की बुराई करते समय भूल जाते हैं वह है कि मानव, चाहे वह कितना भी श्रेष्ठ क्यों न रहा हो, सदा से ही बहुत क्रूर व स्वार्थी रहा है। एक नवजात बच्ची की हत्या करवाने से भी वह नहीं चूकता।
घुघूती बासूती

P.N. Subramanian said...

वररुचि के बारे में इस जानकारी के लिए आभार.

MAYUR said...

इस जानकारी के लिए धन्यवाद ।

मयूर दुबे
अपनी अपनी डगर

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

बहुत ही अच्छी जानकारी बड़े रोचक ढंग से आपने दी है. साधुवाद!

Sandeep Kumar said...

वररुचि ने चलो श्लोक का तो पता लगा लिया ।
लेकिन, रक्त का सेवन करने वालोँ को देवता कहना हमारी बेवकूफी नहीँ है ?
क्या अपने निहित स्वार्थ के लिये किसी कन्या शिशु को मरवा देने वाले को श्रेष्ठ कहने पर हम महामूर्ख नहीँ समझे जाऐँगे ?
ब्लॉग्गर से मेरा आग्रह है कि इस बारे मेँ अपने विचार जरूर रखे ।

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