16 अप्रैल, 2009

३. महाभाष्य

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

महान व्याकरण-ग्रंथ महाभाष्य की रचना करने के पश्चात महर्षि पतंजलि अपने हजार शिष्यों को पास बैठाकर उन्हें भाष्य सिखा रहे थे। तभी एक शिष्य उनसे पूछे बगैर उठकर चला गया। शिष्य का यह अभद्र व्यवहार महर्षि को बिलकुल रास न आया। उनके हृदय में अचानक क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो उठी और इस क्रोध से उन्होंने जो आंखें तरेरकर देखा, उनके समीप बैठे सभी शिष्य जलकर राख हो गए। अपने प्रिय शिष्यों की यह गति देखकर उस निर्मल-हृदय तपस्वी का मन घोर पश्चात्ताप से भर गया। लोकमंगल के हेतु रचे गए महाभाष्य को कंठस्थ कर चुके अपने परम प्रिय शिष्यों को खोकर ऋषि का मन अतीव विषाद से खिन्न हो उठा। इसी समय वह शिष्य जो उठकर चला गया था, अपने सहपाठियों के दुखद अंत का समाचार पाकर अपने गुरु के पास आया और बोला, "माननीय गुरुवर, आप बिलकुल विषाद न करें। आपकी शिष्य-मंडली में से मैं अभी जीवित हूं। पूरा का पूरा महाभाष्य मुझे कंठस्थ है। मैं परोपकारार्थ शिष्य-परंपरा द्वारा उसका खूब प्रचार करूंगा।"

यह सुनकर महर्षि के हृदय में एक बार फिर क्रोधाग्नि भड़क उठी। उन्होंने अपने एकमात्र शिष्य को डांटकर कहा, "हट जा दुष्ट, मेरी नजरों से परे हो जा। तेरे ही कारण मेरी प्रिय शिष्य-मंडली नष्ट हुई। इसलिए तू भी उन्हीं की गति पा!" इस प्रकार उन्होंने उस एकमात्र शिष्य को भी शाप देकर भस्म कर दिया।

क्षण-भर में ही महर्षि का हृदय सीमातीत विषाद से छलछला उठा। शुद्धात्माओं को क्रोध और पश्चात्ताप का अचानक आना और जाना स्वाभाविक ही है। एक बार फिर विषाद के सागर में निमग्न होकर महर्षि आश्रम में बैठे थे कि उनके पास एक गंधर्व आया। उसने कहा, "ऋषिवर, आप चिंता-मुक्त हों। मैं एक गंधर्व हूं। बहुत समय से इस आश्रम की परिधि में स्थित पीपल के पेड़ में रहता आ रहा हूं। जब आप अपने प्रिय शिष्यों को पढ़ा रहे होते हैं, तब मैं आपके वचनों को बड़े श्रद्धाभाव से सुना करता हूं। आपकी सारी बातें मुझे कंठस्थ हो गई हैं। इसलिए मुझे एक शिष्य के रूप में स्वीकार करें। आपके आशीर्वाद से मैं महाभाष्य को दुनिया में अमर बना दूंगा।" यह सुनकर महर्षि को एक बार फिर बड़ा क्रोध आया। भड़ककर वे बोले, "तुमने बिना मेरी अनुमति के चोरी-छिपे मेरे भाष्य को सीखा है। इस अपराध के लिए तुम एक ब्रह्मराक्षस में बदल जाओ!" महर्षि ने उस गंधर्व को शाप दे डाला।

यह सुनकर गंधर्व एकदम घबरा गया और शापमुक्ति के लिए महर्षि के पैरों पड़कर गिड़गिड़ाने लगा। शुद्ध हृदय के होने के कारण महर्षि का क्रोध भी पल भर में ही गायब हो गया। उन्होंने शापमुक्ति का उपाय बताया, "मेरे भाष्य को ग्रहण करने योग्य व्यक्ति को तुम भाष्य सिखाओ। उसे भाष्य सिखाने का काम पूरा होते ही तुम्हें पूर्वशरीर प्राप्त हो जाएगा।" यों कहकर महर्षि ने गंधर्व को आशीर्वाद दिया।

शाप के प्रभाव से ब्रह्मराक्षस बन गए गंधर्व ने महर्षि को प्रणाम किया और पुनः पीपल के पेड़ में जाकर बैठा। उसने भाष्य सीखने की योग्यता रखनेवाले व्यक्ति की खोज शुरू कर दी। पीपल के नीचे से गुजरनेवाले सभी ब्राह्मणों को बुलाकर वह उनकी परीक्षा लेता। परीक्षा की विधि यह थी--अपने पास आनेवाले व्यक्ति से वह "पचेर्निष्ठायाम् किं रूपम्" ("पच" धातु में "क्त" प्रत्यय लगाने से क्या रूप बनता है?) यह सवाल पूछता। इसका सही जवाब न देनेवाले को वह पकड़कर खा जाता। यही निरापद व्यवस्था थी उसकी। इस प्रश्न का सही उत्तर "पक्वं" किसी भी ब्राह्मण से देते न बनने से बहुतेरे ब्राह्मणों को ब्रह्मराक्षस ने उदरस्थ कर लिया। यों बहुत दिन बीत गए।

एक दिन सभी शास्त्रों का पंडित, वेदज्ञ, वेदांती, योगशास्त्रविशारद एवं विरक्त स्वभाव का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण वहां से गुजरा। वह युवा ब्राह्मण संन्यासाश्रम में प्रवेश करने का निश्चय कर चुका था और योग्य गुरु की खोज में निकला था। ब्रह्मराक्षस ने उससे भी वही सवाल पूछा। ब्राह्मण ने तपाक से उत्तर दिया, "पक्वं"। यह सुनकर ब्रह्मराक्षस को विश्वास हो गया कि इस ब्राह्मण में महाभाष्य ग्रहण करने की क्षमता है। उसने ब्राह्मण को भाष्य का उपदेश देना शुरू कर दिया। ब्रह्मराक्षस पीपल की शाखाओं में बैठ जाता और उसका शिष्य नीचे चबूतरे पर। प्रारंभ में ही ब्रह्मराक्षस ने अपने शिष्य को एक दिव्य औषध का सेवन कराया, जिससे भूख, प्यास और निद्रा से उसे मुक्ति मिल गई। ब्रह्मराक्षस पीपल के पत्तों पर भाष्य की कुछ पंक्तियां लिखकर नीचे गिरा देता। शिष्य उन्हें उठाकर पढ़ता और उनका मनन करता। शिष्य के समझ लेने पर ब्रह्मराक्षस आगे के वाक्य पत्ते पर लिखकर नीचे गिराता।

इस प्रकार छह महीने में ब्रह्मराक्षस ने पूरा भाष्य लिखकर नीचे गिराया और ब्राह्मण ने उसे सीख लिया। इसके तुरंत बाद ब्रह्मराक्षस शापमुक्त हो गया और उसे अपना पूर्वरूप वापस मिल गया। ब्राह्मण ने अपने गुरु की वंदना की और उनसे प्रस्थान करने की अनुमति मांगी। तब अपने प्रिय शिष्य को आशीर्वाद देते हुए गंधर्व ने कहा, "हे ब्राह्मण श्रेष्ठ, भूख, प्यास और निद्रा से मुक्त कराने के लिए मैंने आपको जिस दिव्यौषध का सेवन कराया था, उसका प्रभाव जल के स्पर्श से तुरंत नष्ट हो जाता है। जल को छूते ही आप तुरंत निद्रामग्न हो जाएंगे और छह महीने तक आपकी निद्रा भंग न होगी। इसलिए आप कृपा करके जल से दूर ही रहें।" यों कहकर गंधर्व अदृश्य हो गया। ब्राह्मण ने भी वहां से चल देने का निश्चय किया लेकिन तभी उसे खयाल आया कि यदि गंधर्व के सिखाए महाभाष्य का कोई अंश यदि वह भूल गया, तो उस अंश को पुनः समझाने वाला कोई नहीं मिलेगा। इसलिए उसने ब्रह्मराक्षस द्वारा लिखकर गिराए गए सभी पीपल के पत्ते बटोरकर उनकी गठरी बांध ली।

बहुत से स्थानों से गुजरने के पश्चात वह ब्राह्मण एक दिन एक नदी के किनारे पहुंचा। नदी पार करने के लिए नाव, बेड़ा या अन्य कोई साधन वहां मौजूद नहीं था। नदी उथली और संकरी थी और लोग उसमें उतरकर उसे पैदल ही पार कर रहे थे। इसलिए ब्राह्मण ने सोचा कि मैं भी क्षणभर में उसे पार कर लूंगा। नदी में उतरने से पहले उसने गठरी जमीन पर रखी और मुंह धोने के लिए अंजलि में पानी भरा। पानी को छूते ही उस पर गहरी निद्रा छा गई और वह वहीं गिर पड़ा।

नदी में स्नान कर रही एक अति सुंदर शूद्र कन्या ने उसे गिरते देखा और उसके पास दौड़ी आई। ब्राह्मण को देखकर वह समझ गई कि वह नींद में है, मूर्छित नहीं है। फिर भी किसी ब्राह्मण को यों नदी किनारे सोते छोड़ना उसे उचित नहीं लगा और उसने अपनी एक दासी को घर भेजकर चार भृत्यों को बुलवाया। वे ब्राह्मण को सावधानीपूर्वक उठाकर शूद्र सुंदरी के घर ले गए। वहां उस बाला ने एक बड़े, साफ-सुथरे, हवादार एवं रोशनदार कमरे में पलंग पर बिस्तर बिछाकर ब्राह्मण को उस पर लिटाया।

यह बाला उस प्रदेश पर शासन करने वाले एक शूद्र राजा की बेटी थी। वह न केवल अतीव सुंदर थी, बल्कि सुशील, सुशिक्षित, विदुषी एवं विनयशील भी थी। अभिजात कुल में जनमी किसी भी युवती को शोभा देने वाले सभी गुण उसमें विद्यमान थे। उसका भवन उसी नदी के तट पर था।

बाला ने सोचा कि ब्राह्मण कुछ समय में जग जाएंगे। परंतु जब काफी समय बीतने पर भी ब्राह्मण की नींद नहीं टूटी, तो वह सोच में पड़ गई कि माजरा क्या है? उसने इसका सारा विवरण अपने पिता को कह सुनाया। वे तुरंत एक वैद्य को साथ लेकर आ पहुंचे। ब्राह्मण का निरीक्षण करके वैद्य ने कहा, "इसमें शक नहीं कि ये नींद में ही हैं और इन्हें कोई बीमारी नहीं है। पर इस तरह लंबी अवधि तक इनके सोए रहने का कारण मेरी समझ में नहीं आ रहा है। फिर भी चिंता की कोई बात नहीं। यदि ये अब भी नहीं उठें, तो इन्हें हर रोज तीन बार अन्न लेप (अन्न को पीसकर शरीर भर में उसका लेप लगाना) करते रहें, नहीं तो ये जीवित नहीं रह पाएंगे। अन्न लेप विधिवत किया जाए तो ये चाहे जितने दिन सोते रहें, इन्हें कोई क्षति नहीं पहुंचेगी। इतना ही नहीं, अन्न ग्रहण न करने से होनेवाली शिथिलता या कमजोरी भी जगने पर इन्हें महसूस नहीं होगी।" यह सब समझाकर वैद्य चला गया।

ब्राह्मण के प्राणों की रक्षा के लिए अपनी पुत्री के सिवा और किसी को नियुक्त करना ठीक नहीं रहेगा, यों विचारकर शूद्र प्रभु ने उसे ही उनकी शुश्रूषा का भार सौंपा। शूद्रबाला भी यही सोच रही थी कि ब्राह्मण की रक्षा उसके सिवा और किसी से न हो सकेगी। इसलिए जब उसे इस आशय की आज्ञा अपने पिता से मिली तो उसे अत्यंत प्रसन्नता हुई। वह बड़ी निष्ठा एवं लगन से दिन में तीन बार ब्राह्मण पर अन्न का लेप लगाती और अन्य सभी प्रकार से उसकी सेवा करती रही।

यों छह महीने बीतने पर ब्राह्मण की नींद खुली। सबसे पहले उसे अपनी गठरी की ही याद आई, जिसमें उसने ब्रह्मराक्षस द्वारा लिखे गए पत्तों को संजोकर रखा था। इसलिए उठते ही ब्राह्मण नदी की ओर भागा। वहां खोजने पर उसे गठरी वहीं पड़ी हुई मिली, जहां उसने छह महीने पहले उसे रखा था, किंतु एक गाय उसमें मुंह मार रही थी। गाय को हटाकर जब ब्राह्मण ने गठरी को टटोलकर देखा तो उसने पाया कि गाय ने कुछ-एक पत्ते खा लिए हैं। उसका मन विषाद से भर गया, पर खोई वस्तु के लिए आंसू बहाने में लाभ नहीं जानकर उसने बचे हुए पत्तों को समेटकर यथाक्रम रखा। इतने में ब्राह्मण को ढूंढ़ने के लिए शूद्रबाला द्वारा भेजे गए दो सेवक भी वहां आ पहुंचे। इनसे ब्राह्मण ने पूछा कि यह गाय किसकी है। उन्होंने जवाब दिया, "यह हमारे मालिक की ही है।" ब्राह्मण अपनी गठरी लिए पुनः शूद्र राजा के भवन में गया। तब शूद्रकन्या ने उसका यथोचित ढंग से सत्कार करके आसन पर बैठाया। फिर दोनों में जो देर तक वार्तालाप चला, उससे शूद्रकन्या को ब्राह्मण के इतने दिनों तक सोते रहने का रहस्य मालूम हुआ और ब्राह्मण को भी शूद्रकन्या की स्थिति, उसके गुणों तथा उसके द्वारा अपने प्राणों की रक्षा के लिए किए गए प्रयासों के बारे में सब बातें जानने को मिलीं। इससे दोनों में एक-दूसरे के प्रति स्नेह एवं सम्मान की भावना उपजी। फिर ब्राह्मण के कहे अनुसार शूद्रकन्या ने पीपल के पत्तों को खाने वाली गाय को पकड़कर एक विशेष बाड़े में रखवाया। ब्राह्मण उस रात उस बाड़े के पास ही सोया। चूंकि शूद्रकन्या ने वहां भी उसकी सुविधा के सभी साधन जुटा दिए, इसलिए उसे रात को कोई तकलीफ नहीं हुई।

सुबह उठकर ब्राह्मण ने जब बाड़े का निरीक्षण किया तो उसे पीपल के सभी पत्ते गोबर में पड़े हुए मिले। इन्हें श्रद्धापूर्वक उठाकर और धो-पोंछकर ब्राह्मण ने उनका निरीक्षण किया। बाकी पत्तों के साथ रखकर देखने पर उसे हर्ष हुआ कि एक भी पत्ता न तो नष्ट हुआ था न खोया था। ये पत्ते इतने महीनों मुरझाए बगैर रहे तथा गाय द्वारा खाए जाने पर भी नष्ट नहीं हुए। इस चमत्कार के पीछे गंधर्व का दिव्य प्रभाव था अथवा उन पर लिखे महाभाष्य के वाक्यों का माहात्म्य, यह कहना कठिन है, पर कोई कारण जरूर रहा होगा, क्योंकि ऐसे चमत्कार रोज की जिंदगी में तो देखने में नहीं आते।

फिर उस ब्राह्मण ने पीपल के सभी पत्तों को समेटकर उनकी गठरी बांधी। विदा होने से पहले उसने शूद्र कन्या को अपने पास बुलाया और कहा, "मैं कुछ चार-छह महीने से यहां रहता आ रहा हूं। अब मैं यहां से प्रस्थान करना चाहता हूं। इतने दिनों तुमने मेरी सेवा-शुश्रूषा की। इतना ही नहीं, तुमने मुझे प्राणदान दिया। तुमने मुझ पर जो इतना बड़ा उपकार किया है, उसका योग्य प्रतिफल मेरी दृष्टि में कोई नहीं है। पर इसके संबंध में कुछ कहे बगैर मेरा यहां से जाना कृतघ्नता होगी। इसलिए मैं यह प्रसंग उठा रहा हूं। यदि तुम्हारी कोई इच्छा हो तो उसके फलीभूत होने का आशीर्वाद मैं दूंगा। मेरा आशीर्वाद कभी भी खाली नहीं जाता। इसके सिवा और कोई उपकार मेरी समझ में नहीं आ रहा। इसलिए कृपा करके यह बताओ कि तुम्हारी क्या इच्छा है?" तब वह शूद्रकन्या बोली, "हे स्वामी, जब से मैंने जन्म लिया है, तब से अब तक किसी पुरुष की चरण-शुश्रूषा मैंने नहीं की है। सबसे पहले आपके ही चरणों की सेवा का सौभाग्य मुझे मिला है। इसलिए इस जन्म में किसी और पुरुष के चरणों की सेवा मुझे न करनी पड़े, यही मेरी विनम्र इच्छा है। इसलिए आप मुझे कृपापूर्वक अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करके मुझे अनुगृहीत करें। इससे बड़कर कोई मेरी इच्छा नहीं है। यदि आप मेरी यह मनोकामना पूरी करेंगे तो मैं अपना जन्म सफल मानूंगी।"

शूद्रकन्या के इन शब्दों को सुनकर ब्राह्मण चिंतित हो उठा, "अहो दुर्भाग्य! इहलोक के सभी सुखों को त्यागकर संन्यास ग्रहण करने के लिए उपयुक्त गुरु की तलाश में घर से निकला मैं इससे कैसे विवाह कर सकता हूं? पर मेरे प्राणों की रक्षा करने वाली इस अबोध कन्या की उपेक्षा भी मैं किस प्रकार कर सकता हूं? क्या ईश्वर की यही इच्छा है कि चतुर्थाश्रम की खोज में निकला मैं पुनः द्वितीयाश्रम में प्रवेश करूं? यदि ईश्वर यही चाहते हैं तो ब्राह्मण कुल में जनमे मेरे लिए शूद्रकुल में जनमी इस कन्या से प्रथम विवाह करना विधिविरुद्ध भी तो है। शास्त्र कहता है कि ब्राह्मण शूद्रकन्या से तभी विवाह कर सकता है जब उसने पहले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कुलों की एक-एक कन्या से यथाक्रम विवाह कर लिया हो। अतः इससे विवाह करने के लिए मुझे अन्य तीन वर्णों की तीन कन्याओं से भी विवाह करना पड़ेगा। मैंने तो एक भी विवाह न करने का निश्चय किया था, अब क्या मैं चार-चार विवाह करूं? क्या ईश्वर मेरी परीक्षा ले रहे हैं? लेकिन दूसरी तरह से विचारने पर यह उचित ही प्रतीत होता है। शास्त्रों के अध्ययन से, बुद्धि से और अनुभव से संसार की निस्सारता की अनुभूति कुछ अधिक सशक्त होगी। इसलिए इस कन्या की इच्छा पूरी करने के बाद अपनी भी इच्छा की पूर्ति करूंगा। इसके सिवा कोई उपाय नहीं है।" यों निश्चय करके ब्राह्मण ने शूद्रकन्या से कहा, "भद्रे, तुम्हारे हितों का मैं हमेशा ध्यान रखूंगा। लेकिन मुझ ब्राह्मण को शूद्र कुल में जनमी तुमसे विवाह करने से पहले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कुलों की एक-एक कन्या से विवाह करना पड़ेगा। शास्त्रों का यही आदेश है। इसलिए पहले मैं ये तीन विवाह कर लूं, फिर तुमसे भी विवाह करूंगा। तब तक तुम्हें मुझे क्षमा करना होगा।" यह सुनकर शूद्रकन्या ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, "शास्त्रविरुद्ध कोई भी कार्य करने के पक्ष में मैं भी नहीं हूं। यदि आप दयापूर्वक मुझे स्वीकार करेंगे, तो मैं आपकी चाहे जितने समय तक प्रतीक्षा करने को तैयार हूं।" ब्राह्मण ने भी कहा, "तथास्तु", और अपनी गठरी लेकर स्वदेश की ओर चल पड़ा।

कुछ ही समय में अपने घर पहुंचकर उस ब्राह्मण ने यथाक्रम एक ब्राह्मण, एक क्षत्रिय और एक वैश्य कन्या से विवाह किया और अंत में उस शूद्रकन्या से भी विधिपूर्वक विवाह किया। (पुराने जमाने में ब्राह्मणों के चारों वर्णों की कन्याओं से अग्नि को साक्षी रखकर विवाह करने की बात प्रसिद्ध ही है।)।

इस प्रकार वह ब्राह्मण अपनी चारों पत्नियों के साथ अपने घर में सुखपूर्वक रहने लगा। यथासमय चारों पत्नियों से उसे एक-एक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ। इन पुत्रों के सभी जातकर्मों को ब्राह्मण ने स्वयं यथासमय यथोचित ढंग से किया। अपने पुत्रों का विद्याध्ययन भी ब्राह्मण ने स्वयं ही कराया। चारों पुत्र परम विद्वान, सकलशास्त्रपारंगत एवं पिता के जैसे ही गुणसंपन्न हुए। ब्राह्मण-कन्या की कोख से जनमे प्रथम पुत्र की ओर विशेष ध्यान देकर ब्राह्मण ने उससे वेदों का अध्ययन करवाया। तत्पश्चात चारों पुत्रों को महाभाष्य की शिक्षा दी। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि चूंकि चौथा पुत्र शूद्र कुल से संबंधित था इसलिए उसे सामने बैठाकर महाभाष्य सिखाना उचित नहीं है, यों सोचकर ब्राह्मण ने उसे एक पर्दे के पीछे बैठाकर महाभाष्य सिखाया। ब्राह्मण ने उस पुत्र से यह वचन भी लिया कि वह शूद्र कुल में जनमे वेदज्ञानहीन व्यक्तियों में महाभाष्य का प्रचार नहीं करेगा।

इस प्रकार जब चारों पुत्र योग्य, सुशिक्षित एवं युवा हो गए, तब ब्राह्मण गृहत्याग करके कई स्थलों का भ्रमण करते हुए अंत में श्री गौडपादाचार्य से संन्यास ग्रहण करके ब्रह्म का ध्यान करते हुए बदरी आश्रम में रहने लगा। ऐसे बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने केरल के जगप्रसिद्ध आदिशंकराचार्य के गुरु श्री गोविंदस्वामी के बारे में नहीं सुना होगा। इसलिए इस ब्राह्मण-श्रेष्ठ के संबंध में केवल यह कहना पर्याप्त होगा कि योगेश्वर श्री गोविंदस्वामी स्वयं यही ब्राह्मण थे। इतना कहने के बाद इस ब्राह्मण की योग्यता एवं सिद्धि के विषय में अन्य कुछ और कहने की भी आवश्यकता नहीं रहती। इस ब्राह्मण की चार पत्नियों से जनमे चार पुत्रों में से प्रथम ब्राह्मण-पत्नी की संतान स्वयं वररुचि, क्षत्रिय-पत्नी की संतान विश्वविख्यात महाराजा विक्रमादित्य, वैश्य-पत्नी की संतान विक्रमादित्य के महामंत्री भट्टी और शूद्र-पत्नी की संतान महाविद्वान भर्तृहरि थे। इतना कहने के बाद इनकी योग्यता के संबंध में भी और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रहती। परयी (एक नीच जाति की स्त्री) से जनमे पंतिरम कुल के आद्यपुरुष वररुचि के संबंध में और विक्रमादित्य-भट्टी के संबंध में अनेक रोचक कथाएं प्रचलित हैं, जिनसे सभी परिचित होंगे। भर्तृहरि के शतकत्रय का मलयालम में अनुवाद हो चुका है, अतः उनके बारे में भी अधिकांश लोग जानते होंगे। अतिविद्वान और संस्कृत व्याकरण तथा अन्य अनेक गंभीर विषयों पर अनेक भारी ग्रंथों के निर्माता भर्तृहरि आज भी संस्कृत के पंडितों के लिए प्रातःस्मरणीय हैं। वार्तिकम्, प्राकृतप्रकाशम्, धनपंचकम् आदि अनेक ग्रंथों का प्रणयन वररुचि ने किया है। भट्टि काव्यम् (रामायण की कथा) व अन्य अनेक प्रसिद्ध ग्रंथों को भट्टी ने रचा है। हरीडिका, वाक्यपदीयम् आदि व्याकरण ग्रंथों, शतकत्रयी व अनेक वेदांत-ग्रंथों का निर्माण भर्तृहरि ने किया है। कुछ लोगों का यह भी मत है कि अमरुकशतक के भी प्रणेता भर्तृहरि ही थे। यद्यपि इन महानुभावों के भौतिक शरीर आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनका कीर्ति-शरीर सदा हमारे साथ रहेगा। महाभाष्य को पर्याप्त प्रचार-प्रसार दिलानेवाले भी ये ही चार महानुभाव थे।

इन चारों महापंडितों ने अपने पिता गोविंदस्वामी के चरणों में बैठकर महाभाष्य सीखने के बाद भाष्यकर्ता पतंजलि से मिलने की इच्छा प्रकट की। पतंजलि के बारे में उन्होंने खोज की तो पता चला कि काफी समय पहले ही वे इहलोक से विदा ले चुके हैं। तब भर्तृहरि ने जो श्लोक रचा उसे मैं नीचे दे रहा हूं:

अहो भाष्यमहो भाष्यमहो वयमहो वयम्।
अदृष्ट्वास्मान् गतः स्वर्गमकृतार्थः पतंजलि॥

6 Comments:

Anil said...

बहुत लंबी कहानी थी, लेकिन इतनी रोचक कि पूरी पढ़ गया।

योग्य होते हुये भी शूद्रों को जिस तरह भेदभाव का सामना करना पड़ता है, यह कई हजारों सालों से चल रहा है। इसके चलते पूरी आबादी का एक चौथाई हिस्सा तो वैसे ही शिक्षा-दीक्षा से वंचित रह गया। हमें जरूरत है कि जातिप्रथा को खत्म करें, ताकि सभी को शिक्षा और वृद्धि के समान अवसर प्राप्त हों।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अनिल से सहमत।

बालसुब्रमण्यम said...

अनिल और दिनेयराय जी: इस कहानी को छापते समय मेरा आधा मन था कि उन पंक्तियों को हटा दूं जो आपत्तिजनक हो सकते हैं।

फिर सोचा कि मैं तो मात्र इन कहानियों का अनुवादक हूं और मुझे ऐसा करने का अधिकार नहीं है, यह मूल ग्रंथ की भावना से छेड़-छाड़ करना होगा।

ध्यान रखनेवाली बात यह है कि यह दो सदी पूर्व लिखा गया ग्रंथ है, और उस समय के मूल्यों की दृष्टि से देखा जाए, तो कोट्टारत्तिल शंकुण्णि (इस ग्रंथ के मूल लेखक) निम्न वर्गों के प्रति अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाते हुए नजर आते हैं।

आगे की कहानियों में भी ऐसे कई प्रसंग आएंगे जो आजकल के मानदंडों की नजर से आपत्तिजनक प्रतीत हो सकते हैं। आप सबसे विनती है को इन प्रसंगों को पढ़ते समय ऊपर कही गई बात का ध्यान रखें।

Anil said...

बालसुब्रह्मण्यम जी, स्पष्टीकरण के लिये शुक्रिया। लेख मूल ही छापें, कम से कम सत्यदर्शन तो हों! कई सदियों में बहुत कुछ बदला, इन कहानियों को पढ़कर यह भी पता चलेगा कि क्या-क्या नहीं बदला। साधुवाद!

अनुनाद सिंह said...

कल ही भट्टिकाव्यम् के बारे में जानकारी मिली थी। भट्टि की प्रतिभा के बारे मेंप>धकर और यह जानकर कि ऐसे ग्रन्थ न्ही लोगोंने लिखे हैं, बहुत आश्चर्यहुआ था। भर्तृहरि के बारे में और उनकी प्रतिभा के बारे में तो पहले से ही परिचित हूं।

बालसुब्रमण्यम said...

अनुनाद जी, अगली कहानी भर्तृहरि के ही बारे में है। पढ़कर आपको मजा आएगा। इसे मैं आजकल में पोस्ट कर दूंगा।

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