23 अप्रैल, 2009

५. अध्यात्म रामायण

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

श्री वाल्मीकि महर्षि रचित गायत्री-रामायण, अद्भुत-रामायण, आनंद-रामायण आदि के समान अध्यात्म-रामायण किसी ऋषि द्वारा रची गई नहीं है, यही सब लोग कहते हैं। आध्यात्म रामायण अपनी काव्यशैली एवं अन्य विशेषताओं के कारण अन्य सभी रामायणों से भिन्न कोटि की मालूम पड़ती है। यद्यपि ऋषि-प्रोक्त रामायणों में श्रीराम को महाविष्णु का अवतार बताया गया है, पर उन्हें एक नीतिमान, धीरोदात्त राजा के रूप में ही चित्रित किया गया है। अध्यात्म-रामायण के रचयिता ने श्रीराम का ईश्वर के रूप में वर्णन करते हुए ही कथा आगे बढ़ाई है। इन भिन्नताओं को देखते हुए इस मत को स्वीकारना समीचीन लगता है कि अध्यात्म-रामायण ऋषि-प्रणीत नहीं है। पर इस ग्रंथ के रचयिता आखिर हैं कौन? इस संबंध में कोई भी विद्वान सूक्ष्मतापूर्ण मंतव्य व्यक्त नहीं करता। खैर, कुछ पुराने लोगों से इस विषय में जो राय मैंने सुनी है, उसे नीचे देता हूं।

अध्यात्म-रामायण के रचयिता एक विष्णुभक्त ब्राह्मण थे। उन्होंने सोचा था कि उनकी रामायण में भक्तिरस अधिक होने के कारण जनसाधरण उसका अधिक आदर करेगा और उसका अधिक प्रचार हो सकेगा। पर ग्रंथ समाप्त होने पर उन्हें जो अनुभव हुआ, वह इससे ठीक उल्टा था। यद्यपि ब्राह्मण ने स्वयं जाकर बहुत-से योग्य आलोचकों को अपना ग्रंथ दिखाया और उनसे विनती की कि वे उस पर अपना बहुमूल्य मत प्रकट करें, पर किसी ने भी उस ग्रंथ का आदर नहीं किया। इतना ही नहीं, लोग यह भी कहने लगे कि ऋषियों द्वारा प्रणीत इतनी सारी रामायणों के होते हुए इस मूर्ख को एक नई रामायण रचने की सूझी, यह कितने आश्चर्य की बात है! कौन इस निरर्थक ग्रंथ को देखेगा। अधिक कहने की क्या जरूरत, ग्रंथ को किसी ने भी अपनाया नहीं। कुछ ही दिनों में लोगों की टीका-टिप्पणी एवं हंसी उस ब्राह्मण के लिए इतनी असह्य हो उठी कि उससे बचने के लिए अंत में उन्हें स्वदेश छोड़ना पड़ा।

स्वदेश छोड़कर इधर-उधर भटकते हुए एक दिन ये ब्राह्मण महानुभव एक ऐसे बीहड़ एवं भयानक जंगल में जा पहुंचे जहां मनुष्यों का आना-जाना बिलकुल नहीं था। चूंकि रात होने से पहले वहां से निकटतम मानव-बस्ती तक पहुंचा नहीं जा सकता था, ब्राह्मण ने उसी जंगल में रात बिताने का निश्चय किया। जंगल की एक पगडंडी के किनारे उन्हें एक तालाब और पीपल का पेड़ दिखाई दिया। तालाब में स्नान करने के पश्चात उन्होंने संध्यावंदन किया और उसके बाद वे पेड़ के नीचे अध्यात्म-रामायण ग्रंथ को सिरहाने रखकर लेट गए। भूख, प्यास और लंबे समय तक भटकने की थकान के कारण लेटते ही उन्हें गहरी नींद आ गई।

आधी रात को एक तेजस्वी दिव्य पुरुष वहां आए और पीपल के नीचे लेटे ब्राह्मण को देखकर कह उठे, "कौन यहां लेटा है?" यह सुनकर ब्राह्मण तुरंत हड़बड़ाकर उठ बैठे। तत्पश्चात दोनों में इस प्रकार से संभाषण हुआः-

दिव्य पुरुषः- आप कौन हैं? यहां क्यों लेटे हुए हैं?

ब्राह्मणः- मैं एक ब्राह्मण हूं। देश-देश भटकते हुए मैं आज देवयोग से यहां पहुंचा। रात से पहले मानव बस्ती तक पहुंचने का समय न रहने से यहीं लेट गया।

दिव्य पुरुषः- आपके सिरहाने रखा हुआ ग्रंथ कौन-सा है?

ब्राह्मणः- वह मैं बताऊं तो आप मेरा मजाक उड़ाएंगे। इसलिए मैं नहीं बताऊंगा।

दिव्य पुरुषः- अरे नहीं, बताइए तो सही।

इस प्रकार बाध्य किए जाने पर ब्राह्मण ने उस ग्रंथ के बारे में तथा उसके कारण उन्हें जो उपेक्षा सहनी पड़ी थी, उस सबके बारे में दिव्य पुरुष को कह सुनाया। तुरंत दिव्य पुरुष ने ब्राह्मण से कहा, "आप बिलकुल परेशान न हों। मैं एक युक्ति बताता हूं। यदि आप उसके अनुसार चलेंगे, तो सभी लोग इस ग्रंथ का आदर करने लगेंगे और इसे अपार लोक-प्रसिद्धि हासिल होगी। आगामी शिवरात्रि को इस ग्रंथ को लेकर आप गोकर्ण चले जाएं। सुबह होने पर मंदिर के पूर्वी द्वार पर अपार भीड़ होगी। उस भीड़ में आपको एक तेजस्वी ब्राह्मण दिखाई देंगे। उनके पीछे चार कुत्ते भी चल रहे होंगे। उनके हाथ में आप अपना ग्रंथ दे दें और उन्हें सब हाल कह सुनाएं। वे आपकी समस्या से पार पाने का उपाय कर देंगे। जब वे आपसे यह पूछें कि "मुझसे मिलने के लिए आपको किसने कहा", आप कुछ न कहें।" यह युक्ति बताकर दिव्य पुरुष अंतर्धान हो गए।

यह कहना अनावश्यक है कि ब्राह्मण को अपार संतोष की अनुभूति हुई। सूर्योदय होते ही वे वहां से चल पड़े और अनेक देशों में से गुजरते हुए शिवरात्रि के दिन गोकर्ण आ पहुंचे। कुछ ही समय में उस दिव्य पुरुष के कहे अनुसार एक तेजस्वी ब्राह्मण आते हुए दिखाई दिए। उनके हाथ में ग्रंथ रखकर ब्राह्मण ने सब हाल कह सुनाया। उन्होंने तब पूछा, "यह ग्रंथ मुझे देने के लिए आपसे किसने कहा?" ग्रंथ के रचयिता ने दिव्य पुरुष के कहे अनुसार चुप्पी साध ली। तब तेजस्वी ब्राह्मण ने कहा, "खैर, आपके कुछ कहने की जरूरत नहीं। मैं सब समझ गया हूं। आपको यह युक्ति सुझानेवाला एक गंधर्व है। उसने इस प्रकार का कूट उपाय सुझाया इसके लिए मैं उसे शाप देता हूं कि वह शूद्र होकर भू-लोक में अवतरित हो।" यह शाप देकर उन्होंने अपने कमंडल से कुछ जल निकालकर ग्रंथ पर छिड़का और ब्राह्मण को ग्रंथ लौटाकर कहा, "अब आप इसे ले जा सकते हैं। आपकी समस्या अब हल हो जाएगी और इस ग्रंथ के कारण आपको अपार यश की प्राप्ति होगी।" यों कहकर वह ब्राह्मण गोकर्ण के देवालय में प्रविष्ट हो गए।

इस घटना के पश्चात सभी लोग अध्यात्म-रामायण का आदर करने लगे और नित्य पारायण के लिए उसका उपयोग करने लगे। कुछ ही समय में ऋषि-प्रोक्त रामायणों से भी अधिक ख्याति उसे प्राप्त हो गई।

अध्यात्म-रामायण रचने वाले उस ब्राह्मण को जिस गंधर्व ने वह कारगर युक्ति बताई थी, वह भूमि पर तुनचत्तेषुत्तच्चन के नाम से एक शूद्र कुल में अवतरित हुए। इन्हें अन्य सभी रामायणों से अधिक अध्यात्म-रामायण के प्रति लगाव था, तथा किलिप्पाट्टु के लिए रामायण का अनुवाद करते समय उन्होंने इसी रामायण को आधार बनाया। इसका मुख्य कारण अध्यात्म-रामायण के साथ इनका पूर्व-जन्म का संबंध ही था।

गोकर्ण के देवालय पर शिवरात्रि के दिन चार कुत्तों सहित आनेवाला ब्राह्मण साक्षात वेदव्यास महर्षि थे। वे चार कुत्ते चार वेद ही थे। अध्यात्म-रामायण के मूल रचयिता स्वयं वररुचि थे, ऐसी कुछ लोगों की मान्यता है।

3 Comments:

Anil said...

कुत्तों को अकसर हीन भावना से देखा जाता है, ऐसे में वेदों का कुत्तों के रूप में "स्वांग" बहुत ही रोचक है। रचना पसंद आयी।

बालसुब्रमण्यम said...

हां अनिल, यह बात तो है। लेकिन कुत्तों के प्रति हिकारत की भावना अभी हाल का फैशन लगता है।

आपको याद होगा, जब पांडव महाभारत युद्ध के बाद स्वर्ग जा रहे थे, तो उनके साथ एक कुत्ता भी साथ चल रहा था। जब धर्मराज ने युद्धिष्ठर से कहा कि स्वर्ग में आना हो, तो इस कुत्ते को छोड़ना होगा, तो युधिष्ठर ने इससे मना कर दिया।

वास्तव में वह कुत्ता सत्य और सदाचार का प्रतीक था, और धर्मराज युद्धिष्ठर की परीक्षा ले रहे थे। अपने निर्णय पर अडिग रहकर युद्धिष्ठर इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए।

इस तरह हमारे पुराने साहित्यों में कुत्तों को ऊंची बातों और विचारों का प्रतीक बनाया गया है।

Dr Ajai said...

हरी ऊँ शरणम् ---जिनके ह्रदय में पौराणिक कथाओं के प्रति हीन भावना हो। वह कुत्ते से भी गया गुजरा होता है ।मरने के बाद वह नाली का कीडा होता है ।----------
डा.अजय दीक्षित----------------

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