07 जून, 2009

17. वेणमणि नंबूरिप्पाड - 3

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

तब तक नंबूतिरी के बेटे का उपनयन करने का वक्त आ गया। उपनयन का मुहूर्त निश्चित किया गया और उसके अनुष्ठानों के लिए आवश्यक व्यक्तियों को निमंत्रित किया गया, जरूरी सामग्री मंगाई गई और सभी तैयारियां पूरी कर ली गईं। उपनयन की पिछली रात यक्षी नियत समय पर नंबूरी के पास आई। तब नंबूरी ने प्रसंगवश उससे कहा, "कल सुबह कुंभ राशि के मुहूर्त पर मुन्ने का उपनयन करने का निश्चय किया है।" यह सुनकर यक्षी ने कहा, "यदि ऐसी बात है तो मेरी एक इच्छा है। उसे आप कृपा करके पूरा करें। अग्नि को साक्षी रखकर आपने जिस स्त्री से विवाह किया है, वह आपकी प्रधान पत्नी अवश्य है, फिर भी सही अर्थ में मैं ही आपकी पहली पत्नी हूं। इस हिसाब से आपकी उस पत्नी से हुए पुत्र की मैं बड़ी मां हूं। इसलिए कल उपनयन के समय जब मुन्ना भिक्षा मांगेगा, तब मैं ही उसे पहली भिक्षा देना चाहती हूं। आप इसकी अनुमति दें और इसे संभव बना दें। ठीक समय पर मैं एक गृहिणी के वेष में आ जाऊंगी।" नंबूरी ने तुरंत कहा, "इसमें क्या आपत्ति हो सकती है! मुझे भी इससे बहुत संतोष होगा। सही समय पर तुम आ जाना। मैं सब प्रबंध कर दूंगा।"

उपनयन संस्कार के लिए आवश्यक पंडित, पुरोहित, ब्रह्मचारी, पाचक आदि सभी तरह के ब्राह्मण तथा उनके पत्नी-बच्चे सब एक दिन पहले ही नंबूरी के घर पहुंच गए। सुबह होने पर वे सब स्नानादि करके उपस्थित हुए। तुरंत अनुष्ठान आरंभ हो गया। भिक्षा देने का समय आया तो छतरी तानकर और धोती-दुशाला ओढ़कर नंबूरी गृहिणी का वेष धरकर एक पात्र में चावल के दाने लिए यक्षी भी उस जगह आ पहुंची। बिना किसी संकोच के यक्षी अन्य गृहिणियां जहां खड़ी थीं, वहां जाकर खड़ी हो गई। नंबूरी ने उसे देखते ही पहचान लिया। लेकिन अन्य ब्राह्मण- ब्राह्मणियों में उसे लेकर तरह-तरह की बातें होने लगीं--"यह कौन है? कहां से आई है? किस लिए आई है?" आदि, आदि। अंत में उन सबने यही तय किया कि जो भी हो, इसे छूना उचित न होगा, और वे सब उससे थोड़ा दूर हटकर खड़े हो गए।

जब भिक्षा की याचना करने का समय आया तो नंबूरी ने पुजारी से कहा, "यहां विशेष रूप से आई हुई उस स्त्री से ही लड़के को पहली भिक्षा मांगनी चाहिए। पहली भिक्षा भी वही डालेगी। लड़के की मां उस स्त्री के भिक्षा डालने के बाद भिक्षा डालेगी।"

तब पुजारी ने कहा, "यह शास्त्रविरुद्ध होगा। लड़के की मां को ही पहली भिक्षा डालनी चाहिए। उसके बाद ही बाकी लोग भिक्षा डाल सकते हैं।"

नंबूरी- यह स्त्री लड़के की बड़ी मां है। मैंने इसी से पहले विवाह किया है। इसलिए इसे ही पहले भिक्षा देनी चाहिए।

यह सुनकर वहां इकट्ठा हुए ब्राह्मण, पुरोहित, नंबूरी, उनकी पत्नियां सबने एक स्वर में कहा, "आपने अगर लड़के की मां से शादी करने से पहले शादी की थी तो वह हम सबको मालूम हुए बिना कैसे रह सकता है? आप जो कह रहे हैं वह पहले दर्जे का झूठ है। नहीं तो जरा बताएं तो, हम भी सुनें, यह स्त्री कहां की है, किसकी बेटी है?" इस प्रकार के अनेक कठिन प्रश्न वे किए गए। जब नंबूरी की पत्नी को पता चला कि यह जो स्त्री आई है वह मेरी सौत है तथा मुन्ने को मुझसे पहले भिक्षा देने वाली है, तब उसे असह्य संताप, क्रोध एवं बेचैनी होने लगी। उसने कहा, "बड़ी मिन्नतों और प्रार्थनाओं के बाद मेरी कोख से पैदा हुए इस आंखों के तारे को मुझसे पहले तो क्या कभी भी मैं इस जबरन घुस आई कुलटा को भिक्षा देने नहीं दूंगी। अपने बेटे को मैं ही पहले भिक्षा दूंगी। यह पिशाचिनी बड़ी मां इस समय यहां कैसे आ गई। यदि यह मेरे बेटे को भिक्षा देगी तो मैं इसके मुंह पर झाड़ू मारूंगी।" जब सब लोग इस प्रकार नंबूरी का विरोध करने लगे तो वह बेचारा किंकर्तव्यविमूढ़ होकर चुपचाप खड़ा रहा। तब यक्षी ने कहा, "मैं इस मुन्ने को भिक्षा देने के लिए ही यहां आई हूं। मुन्ने के पिता इसके लिए सहमत हैं। इसलिए आप सब जो चाहे कह लें, मैं भिक्षा डाले बगैर यहां से हरगिज नहीं जाऊंगी।" तुरंत लड़के की मां ने कहा, "तुझमें इतनी हिम्मत है? जरा मैं भी देखूं। तुझे यहां से घसीटकर बाहर निकालने के बाद ही उपनयन की आगे की गतिविधियां होंगी। हां, मैं कहे देती हूं। भिक्षा की याचना करना और भिक्षा डालना सब इसे यहां से निकालने के बाद ही होगा। आइए आप सब भी। हम सब मिलकर इसे इसी समय घर से बाहर निकालते हैं।" फिर सबने मिलकर यक्षी को घर के बाहर धकेल दिया। तुरंत कुछ नंबूरी बालकों और उनके सहायकों ने मिलकर उसे घर की चौहदी के बाहर कर दिया।

"हे भगवान! यह क्या अनर्थ कर दिया।" यह चिल्लाते हुए नंबूरिप्पाड यक्षी के पीछे दौड़ा। घर के बाहर इस प्रकार अनादरपूर्वक धकेले जाने से अपमानित और क्रुद्ध होकर यक्षी ने अपने निज स्वरूप में आकर नंबूरी से कहा, "आप बिलकुल चिंता न करें। मैं जानती हूं कि इसमें आपकी गलती नहीं है। मुझे आप पर लेशमात्र भी क्रोध नहीं है। लेकिन मुझे इस प्रकार इस महत्वपूर्ण अवसर पर अपमानित करने की वजह से इस घर में तीन पीढ़ियों के बाद पुत्र ही न होगा और उपनयन करने का अवसर ही नहीं आएगा। लेकिन चूंकि इस स्थल के साथ काफी समय से मेरा संबंध रहा है इसलिए अंतिम दो पीढ़ियों के दो पुत्र सरस्वती के अनुग्रह से विश्वविश्रुत हो जाएंगे। इतने दिनों से मनुष्य के साथ सहवास करती हुई मैं भूलोक में रहती आ रही हूं। इसलिए अब मेरे स्वजन मुझे स्वीकार करेंगे ऐसा मुझे नहीं लगता। यही नहीं, इस प्रकार अपमानित किए जाने के बाद मेरी जीने की इच्छा ही समाप्त हो गई है। आप मेरे बारे में सोचकर बिलकुल चिंतित न हों। भीतर जाकर उपनयन की शेष क्रियाएं पूरी करें। आप बहुत दिनों तक पत्नी व बच्चों के साथ सुखपूर्वक जिएंगे। मैं अपने इस शरीर को योगाग्नि में विलीन कर रही हूं।" इतना कहकर यक्षी सब के लिए अदृश्य हो गई और जहां वह खड़ी थी वहां से एक तेज प्रकाश पुंज मेघमंडल की ओर उड़ा और विलीन हो गया। यक्षी के वचनों को सुनकर और इन अद्भुत दृश्यों को देखकर वहां के सभी लोगों को विदित हुआ कि हमने जो कुछ किया है वह ठीक नहीं किया, लेकिन, "अतीतकार्यानुशयेन किंस्यात्?" (जो हो चुका उस पर पश्चात्ताप करने से क्या लाभ?)

वेणमणि नंबूरिपाड का वंश पुरुष संतानों के अभाव में आज जो मृतप्राय हो रहा है, वह इसी यक्षी के शाप के कारण ही। अंतिम दो पीढ़ी के दो नंबूरी भी क्रमशः कोल्लम संवत के १०६६ वाले वर्ष के वृश्चिक महीने में और १०६८ के मकर महीने में चल बसे। ये थे अच्छन वेणमणि नंबूतिरिप्पाड और महन वेणमणि नंबूतिरिप्पाड। ये दोनों यक्षी के अनुग्रह के माहात्मय से ही विश्वविख्यात हुए, यह कहना शायद आवश्यक नहीं है। आज जितने वेणमणि नंबूतिरिप्पाड हैं, वे सब बहुत पहले इस कुटुंब से अलग हुए एक नंबूरी के वंशज हैं।

(समाप्त। अब नई कहानी)

17. वेणमणि नंबूरिप्पाड - 1
17. वेणमणि नंबूरिप्पाड - 2

3 Comments:

गिरिजेश राव said...

इन कहानियों में बात मैंने नोटिस की है - लगभग सभी बिना किसी नैतिक भार के खाली टाइम पास के लिए लिखी गई हैं। सम्भवत: इनकी लोकप्रियता का भी यही कारण हो ।

बालसुब्रमण्यम said...

गिरिजेश: हां आपका यह विश्लषण सही है। ये बस किस्से हैं, उसी प्रकार जैसे एक हजार एक रातें, चंद्रकांता संतति, आजाद कथा, आदि हैं।

इन कथाओं की एक दूरी विशेषता यह है कि इन सबमें नंबूरी ब्राह्मणों की सर्वोपरिता को प्रतिष्ठित करने का भोंड़ा प्रयास नजर आता है। इसीलिए मैंने इन कथाओं को केरल पुराण नाम दिया है, क्योंकि पुराणों में भी यही अभिरुचि देखने में आती है।

पर है ये कथाएं बड़े रोचक। पीढ़ी-दर-पीढ़ी वे मलयाली बच्चों द्वारा पढ़ी जाती रही हैं।

इन कहानियों के जरिए हम एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाते हैं, जिसमें नैतिकता, रीति-रिवाज, भाषा, घटनाएं, पात्र, सब विचित्र और अपरिचित से लगते हैं, और इस कारण वे हमें बांधे रखते हैं। इन कहानियों में गजब के ट्विस्ट, अस्वाभाविकताएं और मोड़ आते हैं, इसलिए न चाहते हुए भी हम उन्हें पढ़ते जाते हैं।

यदि हम इन कथाओं से कोई ऊंचे आदर्श या ज्ञान की आशा न रखते हुए केवल कथा तत्व के लिए उन्हें पढ़ें, तो ये हमें घंटों अच्छा मनोरंजन दे सकते हैं।

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

लेकिन मैं सहमत नहीं हूं। कहानी द्वारा बांधा जाना ही यह सिद्ध करता है कि यह कहीं न कहीं हमारी चेतना को प्रभावित कर रहा है।

रामायण और महाभारत को भी काल्‍पनिक सिद्ध किया जा चुका है। लेकिन क्‍या यह इतना ही आसान और काल्‍पनिक बता दिए जाने योग्‍य है। मानव मन की कुंठाओं या कह दें साइकोलॉजी या तत्‍कालीन सामाजिक व्‍यवस्‍था से क्‍या इसका कोई लेना देना नहीं है।

हो सकता है आज हमें संदर्भ और कारण पता न हों लेकिन कुछ तो होता होगा। आज कारण नहीं है तो ठीक है कहानियों को ही पढ़ लेते हैं लेकिन कभी इसके पीछे के कारण भी स्‍पष्‍ट होंगे।

ऐसा मैं सोचता हूं।

एक और अच्‍छी कहानी। कहानी में प्रेम की पराकाष्‍ठा अतिन्द्रिय को इंद्रिय और फिर सामाजिक स्‍तर तक लाने का प्रयास करती है। यह सोचने लायक बात है।

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