14 जून, 2009

19. वयक्करै अच्छन मूस - 1

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

वैद्यों की प्रमुख अर्हताओं में मुख्य हैं गुरुत्व, हस्तपुण्य, प्रसिद्धि तथा सर्वसम्मति। शास्त्रपारंगत, बुद्धिमान एवं कौशलपूर्ण होने के बावजूद यदि वैद्य में गुरुत्व एवं हस्तपुण्य न हों, तो उसकी चिकित्सा सफल नहीं होगी, यह तय है। यदि वैद्य में शास्त्रज्ञान, कौशल, एवं बुद्धि न होकर केवल गुरुत्व एवं हस्तपुण्य ही हों, तो भी काम नहीं चलेगा। लेकिन गुरुत्व एवं हस्तपुण्य से संपन्न वैद्य का शास्त्रज्ञान आदि थोड़ा कम हो तो उससे उसकी सफलता में खास फर्क नहीं होगा। गुरुत्व और हस्तपुण्य संपन्न वैद्य में यदि शास्त्रज्ञान, बुद्धिमत्ता और कौशल भी हों, तो कहना ही क्या। अष्टवैद्यों में अव्वल समझे जानेवाले पुराने समय के प्रसिद्ध वयक्करै मूसों में ऊपर बताए गए सभी गुण यथेष्ट मात्रा में थे। इसके दृष्टांतस्वरूप स्वर्गीय आर्यनारायण मूस और उनके पिता अच्छन मूस के कुछ अद्भुत पराक्रमों के बारे में नीचे दो-चार बातें कहता हूं। केवल सुनी हुई बातों पर आधारित इन कथाओं की विश्वसनीयता-अविश्वसनीयता को लेकर अधिक परेशान होने की आवश्यकता नहीं। इतना भर ध्यान में रखें कि महान व्यक्तियों के लिए कोई भी कार्य असाध्य नहीं होता।


1.

एक व्यक्ति का मल-मूत्र-त्याग बंद हो गया और पेट फूल जाने से उसे बेहद बेचैनी होने लगी। पीड़ा के कारण उससे न बैठा जाता था, न लेटा, न खाया जाता था, न सोया। कुछ भी करना असंभव होने से वह बेचारा पीड़ा से कराहते हुए जमीन पर लोटने लगा। बहुत-से वैद्यों का परामर्श लेने और उनके अनुसार दवादारू करने से भी कोई फायदा नहीं हुआ। सभी वैद्यों और आस-पड़ोस के लोगों ने यही सोचा कि वह बच नहीं पाएगा। लेकिन एक बार वयक्करै मूस को भी दिखा दिया जाए यह सोचकर उस व्यक्ति के हितैषी वयक्करै पहुंचे। उस समय अच्छन मूस सब्जी काट रहे अपने नौकरों के पास खड़े होकर उनसे कुछ कह रहे थे। जब ये लोग उनके पास आए तो अच्छन मूस ने उनसे रोगी की तकलीफों का विवरण ध्यान से सुना, फिर नीचे पड़ा कद्दू का एक डंठल उठाकर उन लोगों को देकर बोले, "इसे ले जाकर उबले हुए पानी में घोलकर रोगी को पिलाएं।" उन लोगों ने उस डंठल को भक्तिपूर्वक मूस से लिया और घर लौट आए। मूस के कहे अनुसार उस डंठल के एक टुकड़े को पीसकर गरम पानी में घोलकर रोगी को पिलाया गया। उसे पीने के कुछ समय बाद ही रोगी के लिए मूत्र और मल त्याग करना संभव हो गया और उसके सभी दर्द दूर हो गए और उसे आराम मिलने लगा। लेकिन मल-मूत्र का निकलना एक बार जो शुरू हुआ तो बंद ही नहीं होने में आया। शाम होते-होते मूत्र का बार-बार निकलना तो किसी प्रकार बंद हुआ, लेकिन मल का निकलना जारी रहा। लोगों ने यही सोचा कि वह भी कुछ समय बाद रुक जाएगा। वह दिन यों बीता। लेकिन मल निकलने की समस्या कायम रही, बल्कि अधिक गंभीर हो गई। तब तक रोगी भी अत्यंत क्षीण एवं विकल हो गया था। रोगी के हितैषी एक बार फिर वयक्करै की ओर भागे और अच्छन मूस के पास जाकर उन्हें सारा समाचार सुनाया। तब अच्छन मूस ने उनसे पूछा, "मैंने जो दवा दी थी, वह सब रोगी को खिलाया कि नहीं?" उन लोगों ने कहा, "नहीं, उसका एक टुकड़ा ही रोगी को दिया था। बाकी अब भी शेष है।" तब मूस ने कहा, "उसे भी रोगी को खिला दीजिए। सब ठीक हो जाएगा।" तुरंत वे सब घर लौट आए और डंठल के शेष भाग को भी पीसकर गरम पानी में घोलकर रोगी को पिला दिया। उसे पीते ही रोगी स्वस्थ हो गया और उसका बार-बार मल निकलना बंद हो गया और कुछ ही समय में रोगी अपना खोया हुआ स्वास्थ्य पुनः प्राप्त करने में सफल हो गया।


2.

एक बार अत्यधिक मुटापे के कारण बैठने, चलने, खड़े होने और लेटने में असमर्थ एक माप्पिलै (केरलवासी मुसलमान) अच्छन मूस के पास आया। उसका शरीर असामान्य रूप से फूला हुआ था, अन्यथा उसे कोई रोग अथवा तकलीफ नहीं थी। वह असामान्य रूप से मोटा तो था ही, दिन-पर-दिन और अधिक मोटा होता जा रहा था। उसने कई हकीमों से इलाज करवाया लेकिन उसका वजन बढ़ता ही रहा। कहा भी गया है, "कार्श्यमेव वरं स्थौल्यान्न हि स्थूलस्य भेषजम्" अर्थात मुटापे से तो दुबलापन ही अच्छा है; मुटापे का कोई दवा नहीं है। इसलिए उन सबके इलाज का फल न निकलना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। अंत में वह वयक्करै आया। रोगी की तकलीफों को सुनकर अच्छन मूस ने उसे तीन-चार बार सिर से पांव तक देखा और कहा, "तुझे इलाज-विलाज की जरूरत नहीं है, तीस दिनों में वैसे ही तेरी मृत्यु होनेवाली है। मौत के लक्षण तेरे सारे शरीर में स्पष्ट दिख रहे हैं। ईश्वरकृपा से यदि तीस दिनों बाद तू जीवित रह जाए तो मेरे पास आना। इलाज के बारे में उस समय सोचेंगे। अभी कुछ करने से लाभ नहीं।" यह सुनकर ही माप्पिलै को असह्य भय एवं चिंता हुई और वह मूर्च्छित होकर वहीं गिर गया। वयक्करै अच्छन मूस कुछ कह दे तो उसमें तिल भर भी अंतर नहीं होता, यह सब लोगों का अनुभव था। सो माप्पिलै ने सोचा, उनके कहने का अर्थ यही है कि मैं महीने भर में मर जाऊंगा। मृत्यु भय किसे नहीं होता?

साढ़े तीन घंटे बाद उस माप्पिलै को होश आया। तुरंत आठ-दस साथियों ने उसे किसी प्रकार उठाकर एक नाव में चढ़ाकर घर पहुंचाया। घर पहुंचकर माप्पिलै की भोजन आदि में तनिक भी रुचि नहीं रह गई। नींद भी आनी बंद हो गई। किसी भी कार्य में उसका मन नहीं लगता था। पत्नी और पुत्रों के बहुत कहने पर वह थोड़ा कुछ खा लेता, अन्यथा निराहार ही रहता। समय बीतने के साथ उसका शरीर भी उतरने लगा। क्यों कहानी व्यर्थ बढ़ाऊं? हाथी जितनी बड़ी देह वाला वह व्यक्ति महीने-भर में कृशकाय हो गया। तीस दिन बीत जाने पर उसे यह आशा भी होने लगी कि शायद अब मैं नहीं मरूंगा। अत्यधिक कमजोरी के बावजूद उसे अब चलने-फिरने, उठने-बैठने आदि में कोई तकलीफ नहीं होती थी। फिर भी उसने सोचा, मूस ने यही कहा था कि एक महीने के बाद भी यदि न मरो तो मेरे पास दुबारा आना, तब इलाज की बात करेंगे। इसलिए उनसे जरा मिल आना चाहिए। तदनुसार वह सपरिवार एक बार फिर अच्छन मूस के पास गया और सारा समाचार उन्हें सुनाया। तब अच्छन मूस ने कहा, "अब तू नहीं मरेगा। मैंने उस दिन जो कुछ कहा था, वह सब यह जानते हुए ही कहा था कि तू मरने वाला नहीं है। मुटापे के शिकार लोगों का वैसे कोई इलाज नहीं है। केवल मानसिक चिकित्सा से उन्हें थोड़ा-बहुत आराम मिलता है। मृत्यु से बढ़कर कोई चिंता का विषय नहीं है। इसीलिए मैंने तुझे मृत्यु का भय दिखाया। उसे एक चिकित्सा ही समझना। यह चिकित्सा सफल भी हुई। अब शरीर की चपलता सब लौट आई कि नहीं? चूंकि तुझे और कोई रोग नहीं है, इसलिए अब किसी दवा आदि की भी तुझे जरूरत नहीं है। केवल इसका ध्यान रखना कि दुबारा वजन न बढ़े। इसके लिए नित्य इतना व्यायाम करना कि पसीना निकलने लगे। बाल-बच्चों और धन-दौलत सबका भरपूर होना, मानसिक क्लेश का अभाव, भरपेट स्वादिष्ट भोजन की नियमित प्राप्ति और व्यायाम की कमी -- ये ही सब मुटापे के मुख्य कारण हैं। यथाशक्ति व्यायाम करना मनुष्य के लिए अत्यावश्यक है। इसलिए अब से नियमित रूप से व्यायाम किया कर।" यह सुनकर वह माप्पिलै संतुष्ट होकर वहां से चला गया और नित्य व्यायाम करने लगा और सुखपूर्वक रहने लगा।


3.

एक बार एक स्त्री को प्रसव-वेदना आरंभ हुई, लेकिन तीन-चार दिनों तक बच्चा नहीं हुआ। पांचवें दिन बच्चे के एक हाथ का सिरा मात्र बाहर दिखाई दिया। सामान्यतः बच्चे का सिर पहले बाहर आता है। इसके विपरीत बच्चे का हाथ पहले दिखाई देने से वहां मौजूद धाई आदि स्त्रियां अत्यंत विस्मित हुईं। उन दिनों आज की तरह डाक्टर-नर्स आदि तो होते नहीं थे। इसलिए ऐसी स्थतियों में लोगों को वैद्य-हकीमों पर ही भरोसा करना पड़ता था। इसलिए स्त्री के रिश्तेदार तुरंत वयक्करै पहुंचे और अच्छन मूस से सारी बातें कहीं। कुछ देर सोचकर मूस ने कहा, "लोहे की एक कील अथवा चाकू को खूब गरम करके उसे बच्चे के हाथ पर रखें।" स्त्री के रिश्तेदारों को इस प्रकार करना जरा भी उचित नहीं लगा, लेकिन यह जानते हुए कि अच्छन मूस के कहे अनुसार करने से कभी कोई अहित नहीं हो सकता, उन्होंने ऐसा ही किया। गरम लोहा छुआने पर बच्चे ने तुरंत अपना हाथ अंदर खींच लिया और थोड़े ही समय में स्त्री ने प्रसव कर दिया। बच्चे का हाथ थोड़ा जल गया, लेकिन यह समाचार अच्छन मूस को बताने पर उन्होंने उसके लिए कुछ उपचार बताया और उससे बच्चा भी स्वस्थ हो गया।

(...जारी)

2 Comments:

गिरिजेश राव said...

"गुरुत्व, हस्तपुण्य, प्रसिद्धि तथा सर्वसम्मति"

ये तो आज भी आवश्यक हैं।
अगली कड़ी की प्रतीक्षा है. .

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

एक थे वैद्यराज रामीराम। कभी अपने ब्‍लॉग पर उनके बारे में लिखूंगा। अभी हिम्‍मत नहीं जुटा पा रहा हूं। उनकी मृत्‍यु तीन दिन पहले ही हुई है।

अभी तो बस सोचने में ही लगा हूं।

अच्‍छी पोस्‍ट। वैद्य शारीरिक और मानसिक दोनों स्‍तर पर इलाज करते हैं।

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