02 जून, 2009

16. कालड़ी के भट्टतिरी - 3



(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

16. कालडी के भट्टतिरी - 1


16. कालडी क भट्टतिरी - 2

एक बड़े जमींदार के नारियल के बागान में एक मूत्तचेकोन (एक शूद्र जाति का व्यक्ति) चौकीदार के रूप में नियुक्त था। चूंकि बागान में बहुत-से नारियल पेड़ से टपकते थे इसलिए जहां-तहां इन नारियलों के ढेर लगे हुए थे। अधिकांश समय ये नारियल वहीं पड़े-पड़े सूखते रहते थे। इस बागान में इस मूत्तचेकोन ने एक झोंपड़ी बना ली थी और रात को वह उसी में सोता था। झोपड़ी में आग जलाने के लिए एक बड़ा गड्ढा भी था। ठंड के मौसम में चौकीदार उस गड्ढे में नारियल की जटा जलाकर आग तापता था और ताजे गिरे नारियलों को आग में भूनकर खाता था।

एक बार सर्दियों में रात के अंतिम पहर में कुहरा छा जाने से ठंड इतनी बड़ गई कि मूत्तचेकोन के लिए ठंड सहना अत्यंत मुश्किल हो गया। इसलिए वह उठा और दो-तीन नारियल उठाकर उनकी जटाएं काटकर अलग कीं और उन्हें जलाकर आग तापने लगा और नारियल की गरी को आग में भूनकर खाने लगा। तब झोंपड़ी की दीवार की एक छेद में से एक नन्ही-सी सूंड़ मूत्तचेकोन के सामने डोलने लगी। तुरंत सूंड़ पर उसने भुने हुए नारियल का एक टुकड़ा रख दिया। उसे लेकर मुंह में डालने के बाद सूंड़ एक बार फिर मूत्तचेकोन के सामने प्रकट हुई। उसने नारियल का एक और टुकड़ा उसे दिया। इस तरह कई बार हुआ। अंत में पूरा नारियल समाप्त हो गया। सुबह भी हो गई। तब सूंड़ भी गायब हो गई और मूत्तचेकोन भी अपने काम में लग गया।

अगले दिन सुबह होने से पहले मूत्तचेकोन ने पिछले दिन के समान नारियल भूनकर खाना फिर आरंभ किया। तब पिछले दिन के ही समान वह सूंड़ एक बार फिर प्रकट हुई। मूत्तचेकोन भुने हुए नारियल के टुकड़े उसे देता रहा और वह गजशिशु उन्हें लेकर खाता रहा। इस प्रकार कुछ दिन बीतने पर मूत्तचेकोन और गजशिशु में गाढ़ी दोस्ती हो गई। एक पल के लिए भी वह शिशु मूत्तचेकोन से अलग नहीं होता था। मूत्तचेकोन जो कुछ भी खाता था, वह सब उस गजशिशु को भी देता, लेकिन हाथी के उस बच्चे को भुने हुए नारियल से अधिक कोई वस्तु पसंद नहीं थी। मूत्तचेकोन हर रोज तीन-चार नारियल भूनकर उसे खिलाता। उस बगीचे में असंख्य नारियल यों ही पड़े-पड़े सूखते रहते थे। इसलिए बगीचे के मालिक को भी नारियलों के इस प्रकार व्यय होने के बारे में पता नहीं चल सका। मूत्तचेकोन जब कहीं किसी काम से जाता था, तब भी यह गजशिशु उसके साथ ही जाता था।

लेकिन गजशिशु मूत्तचेकोन के सिवा और किसी को दिखाई नहीं देता था।

एक बार कालड़ी का एक भट्टतिरी कहीं से तंत्र-साधना करके लौट रहा था। नारियल का यह बागान रास्ते में ही होने से वह उसे देखने रुका। तब इस गजशिशु पर उसकी नजर पड़ी। भट्टतिरी एक दिव्य पुरुष था, इसलिए वह समझ गया कि यह कोई साधारण हाथी नहीं है और उसने उसे मूत्तचेकोन से खरीदना चाहा। मूत्तचेकोन को इस गजशिशु पर अत्यधिक वात्सल्य था इसलिए उसने कहा, "अरे नहीं मालिक, यह दास इस एकदंती को (उस गजशिशु के एक ही दंत था) नहीं दे सकता।" लेकिन भट्टतिरी द्वारा बाध्य किए जाने पर और यह कहने पर कि उसके बदले मुंह मांगा दाम मिलेगा, वह अंत में हाथी बेचने के लिए राजी हुआ। तब भट्टतिरी ने मूत्तचेकोन के बताए दाम चुकाए और उस हाथी को खरीद लिया। लेकिन हाथी उसके साथ जाने को तैयार नहीं हुआ और मूत्तचेकोन के पास ही खड़ा रहा। तब भट्टतिरी ने मूत्तचेकोन से दो-तीन भुने हुए नारियल भी खरीद लिए। उन्हें फोड़कर उसकी गरी का एक टुकड़ा आगे बढ़ाने पर गजशिशु उसे खाने आया। भट्टतिरी आगे-आगे चलता गया और उसके पीछे-पीछे हाथी। रह-रहकर भट्टतिरी नारियल का एक-एक टुकड़ा बढ़ाता जाता जिसे गजशिशु सूंड़ में लेकर खा लेता। इस प्रकार भट्टतिरी उस हाथी को लिए अपने घर पहुंच गया।

मूत्तचेकोन को उस गजशिशु की असलियत समझ नहीं आई थी। उसने यही सोचा कि वह भट्टतिरी के पीछे नारियल खाने की लालच में ही गया। लेकिन भट्टतिरी ने पहली नजर में ही समझ लिया कि यह गजशिशु साक्षात गणेश जी हैं। नारियल लेकर उसने मन ही मन गणपति होम किया था और गणपति का आह्वान करके ही नारियल का टुकड़ा गजशिशु के सामने बढ़ाया था। यह सब मूत्तचेकोन को पता नहीं था।

भट्टतिरी के घर पहुंचने पर वह गजशिशु उसे साक्षात गणेश के रूप में प्रत्यक्ष हुआ। भट्टतिरी उस गणपति को अपने घर में अन्य देवताओं के साथ प्रतिष्ठित कर दिया। कालड़ी में भट्टतिरी के समक्ष गणपति के प्रत्यक्ष होने का यही रहस्य है।

उस दिन से उस घर के सभी लोग गणपति की विधिवत पूजा करने लगे। इतना ही नहीं उन्होंने यह नियम भी बना लिया कि उस घराने के सभी बालक समावर्तन के बाद हर रोज गणपति होम करेंगे और उस घर में देवाराधना के समय हर रोज गणपति होम भी किया जाएगा और इन सब कार्यों की देखरेख के लिए एक पुरुष घर पर हमेशा मौजूद रहेगा। इससे इस घर के सभी लोगों को गणपति प्रत्यक्ष होने लगे। तब से उन सबको तंत्रसिद्धि के मामले में पहले से सौ गुना अधिक ख्याति होने लगी। अपस्मार, ब्रह्मराक्षस आदि सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करने में कालड़ी के भट्टतिरी को किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती थी। किसी प्रकार का अप्राकृतिक उपद्रव होने पर लोग कालड़ी के भट्टतिरियों को अपने यहां ले जाते थे अथवा स्वयं उनके घर आकर भजन करते थे या कोई पूजा या तांत्रिक अनुष्ठान करवाते थे। इसके सिवा वे किसी अन्य ओझा या तांत्रिक के पास नहीं जाते थे। कालड़ी के गणपति के माहात्म्य की अनेक कथाएं प्रचलित हैं। विस्तार भय से मैं उन सबका यहां विवरण नहीं दे सकता। लेकिन नमूने के तौर पर एक-दो कथाएं यहां देता हूं।

तिरुवितांकूर राज्य के चंगनाश्शेरी तालुके में काडमुरी नामक गांव में कुंजमणपोट्टी नामक एक तांत्रिक रहता था। उसके घराने के लोगों को चात्तन लोग (छोटा शैतान) प्रत्यक्ष होते थे। यह बात तो आज भी प्रसिद्ध है। इस घराने में आजकल जो लोग रह गए हैं, वे चात्तन को प्रत्यक्ष देख नहीं सकते, परंतु चात्तन उनके आदेशों का पालन करते हैं। आज भी इस घराने के लोग कई स्थानों पर जाकर चात्तन के उपद्रवों को दूर करते हैं। कुंजमणपोट्टी की झाड़-फूंक से दूर न होनेवाला चात्तन आज भी इस दुनिया में नहीं है, ऐसा ही कुछ लोगों का विश्वास है। यदि कोई इन पोट्टियों के पास चात्तन का उपद्रव दूर करने का अनुरोध लेकर जाए और व्यस्तता के कारण पोट्टी उसके घर न जा सके तो वह उस व्यक्ति को एक पर्ची लिखकर दे देता था। उस पर्ची में यही लिखा होता था कि अमुख तिथि को मैं इस व्यक्ति के घर आ रहा हूं। तब तक इसके यहां किसी प्रकार का भी उपद्रव नहीं होना चाहिए। इस पत्र को घर ले जाकर जोर से पढ़ने पर चात्तन का उपद्रव उस पत्र में लिखी तिथि तक रुक जाता था। ऐसा आज भी देखने में आता है।

चात्तन की सेवा करके उन्हें प्रत्यक्ष करने वाले कुंजमणपोट्टी और गणपति की सेवा करके उन्हें प्रत्यक्ष करने वाले कालड़ी के भट्टतिरी समकालीन थे।

बहुत दिन पहले एक बार एक कुंजमणपोट्टी कालड़ी भट्टतिरी से मिलने आया। यह पोट्टी अठारह तनों को जोड़कर बनाई गई एक बड़ी नौका में आया था। भट्टतिरी का घर नदी-किनारे ही था और पोट्टी ने नाव को नदी-किनारे ही बांध दिया। पोट्टी नाव से उतरकर भट्टतिरी के घर गया। तब सांझ हो गई थी इसलिए गृहस्थ भट्टतिरी जप कर रहा था। जब पोट्टी घर के द्वार पर पहुंचा, तब भट्टतिरी ने उससे कहा, "जल्दी ही जाकर स्नान कर आएं।" और उसे नहाने के लिए तालाब की ओर भेज दिया और स्वयं मकान के भीतर गया। यह जानकर कि पोट्टी नाव से आया है, उसने पोट्टी तथा उसके खेवटों के लिए भोजन तैयार करने का आदेश दिया। इसके बाद भट्टतिरी ने अपनी पूजा जारी रखी। तब तक पोट्टी भी नहाकर आ गया। इसके बाद दोनों बैठकर अपनी-अपनी रीति से जप-पूजादि कार्य करते रहे। कुछ समय में जब वह सब पूरा हो गया, वे एक-दूसरे की कुशलक्षेम पूछने लगे। तब तक खाना तैयार हो गया था और दोनें खाने बैठे। खाना खाने के बाद वे बाहर आकर वार्तालाप करने लगे। तब भट्टतिरी ने अपने नौकरों को आदेश दिया कि पोट्टी के खेवटों को भी भोजन कराएं। यह सुनकर पोट्टी ने कहा, "वह सब आवश्यक नहीं है। अपने खेवटों को मैं ही भोजन करा दूंगा। दूसरे किसी के खिलाने से वे तृप्त नहीं होते।" तब भट्टतिरी ने कहा,"अगर ऐसी बात है तो आप ही चलकर उनको भोजन करा दें। चलिए, परोसने में मैं भी आपकी मदद कर देता हूं।" तब पोट्टी ने कहा, "वह सब किसलिए? मैंने उनको रात का भोजन करा दिया है। वे सब चले भी गए हैं। इसके बारे में आप चिंतित न हों।" यह सुनकर सब बातें भट्टतिरी की समझ में आ गईं। उसने पूछा, "खेवट सब चात्तन लोग होंगे, क्यों?" पोट्टी ने हंसकर कहा, "हां, किसी की सेवा करनी ही हो, तो चात्तन की ही करनी चाहिए। वे सब बातों में सहायता कर देते हैं।" भट्टतिरी समझ गया कि पोट्टी का बेकार में दस-बीस लोगों के लिए रात के समय खाना तैयार करवाना, फिर इस प्रकार टोकना यह सब उसे अपमानित करने के लिए है, तथा गणपति की सेवा करने से सब कार्यों की सिद्धि नहीं होती, यही पोट्टी का आशय है। लेकिन इन सब ख्यालों को मन में ही रखकर भट्टतिरी ने सहमति जतलाते हुए कहा, "आपका कहना ठीक है।" इसके बाद वे दोनों काफी देर तक बातें करते रहे। रात काफी होने पर भट्टतिरी ने पोट्टी के सोने के लिए बिस्तर आदि की व्यवस्था कर दी और पोट्टी के लेट जाने के बाद स्वयं भी भीतर जाकर सो गया।

सुबह होने पर दोनों उठ गए और पोट्टी उसी समय भट्टतिरी से विदा लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा। नदी-किनारे पहुंचकर उसने देखा कि नाव कहीं नहीं नजर आ रही। उसे चोर ले गए यह सोचकर पोट्टी बहुत घबराया। तुरंत उसने जाकर भट्टतिरी से सारा समाचार कह दिया। तब भट्टतिरी ने कहा "यहां से कोई भी वस्तु चोरी नहीं जाती। इसलिए नाव को भी चोर नहीं ले गए होंगे। यहां एक एकदंती रहता है। यह सब उसी की कारगुजारी लगती है। आप बिलकुल परेशान न हों। मैं सब ठीक किए देता हूं।" फिर भट्टतिरी ने इधर-उधर देखा तो उसे एक बड़े पीपल के पेड़ के ऊपर नाव रखी हुई दिखी। तुरंत उसने पोट्टी से कहा, "मुझे छूते हुए ऊपर देखें।" पोट्टी ने ऐसा ही किया। तब उसने देखा कि गणपति अपने एकल दंत पर नाव को रखकर सूंड़ से उसे पकड़े, पेड़ के ऊपर बैठे हैं। पोट्टी समझ गया कि रात को मैंने गणपति सेवा के तिरस्कार के जो शब्द कहे थे, उसी का बदला लेने के लिए गणपति ने ऐसा किया है। इसलिए उसने भट्टतिरी से माफी मांगी। तुरंत भट्टतिरी ने गणपति से कहा, "नाव लौटा दें। इन्हें देर हो रही है। नाहक इन्हें परेशान न करें।" तब गणपति ने वहीं से नाव नदी के जल में फेंक दी। पीपल के ऊपर से अपनी नाव को गिरते देखकर पोट्टी ने यही समझा कि वह चूर-चूर हो जाएगी। लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। यह देखकर पोट्टी अत्यंत आश्चर्यचकित हुआ और उसमें भट्टतिरी के प्रति बड़ा आदर जगा।

नाव तो मिल गई, लेकिन खेवटों का कहीं पता नहीं था। इसलिए पोट्टी फिर परेशान हो उठा। गणपति के डर से उसके सब चात्तन वहां से भाग गए थे और वापस आने से डर रहे थे। यह भट्टतिरी से कहते पोट्टी को शरम आई। इसलिए वह वहीं चुपचाप खड़ा रहा। अंत में और कोई चारा न देखकर इसकी भी सूचना भट्टितरी को देनी पड़ी। तब भट्टतिरी ने कहा, "डरने की कोई बात नहीं। उन्हें आने को कहिए। उनको कोई परेशान नहीं करेगा। मैं इसका जिम्मा लेता हूं।" तब कहीं जाकर चात्तन नाव पर चढ़ सके। पोट्टी ने गणपति की पूजा के लिए धन दिया और वहीं से गणपति को नमस्कार करके चला गया।

(... जारी)

3 Comments:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

बहुत खूब सूर्य भ‍ट्टतिरी और एकदंत की बांध लेने वाली कथा।

एक और रोचक सीरीज के लिए आभार।

इस बार लिंक से मुझे भी फायदा हुआ। मैं कंफ्यूजन में था कि दूसरी कड़ी पढ़ ली है या नहीं। लेकिन देखा तो लिंक का रंग बदला नहीं था। तो पहले दूसरी कथा पढ़ी फिर आखिरी कड़ी। :)

बेनामी said...

Bravo .............

बेनामी said...

well done......

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