11 जून, 2009

18. कुंजनपोट्टी और मट्टप्पल्लि नंबूतिरिप्पाड

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

चात्तन (छोटे शैतान) की सेवा करके उसे प्रत्यक्ष करनेवाले प्रसिद्ध कुंजनपोट्टी और श्रीपोरक्कला जाकर भद्रकाली की सेवा करके उसे प्रत्यक्ष करनेवाले विश्वविख्यात मट्टप्पल्लि नंबूतिरिप्पाड समकालीन थे। मट्टप्पल्लि नंबूतिरिप्पाड के घराने का नाम पहले केवल "मट्टप्पल्लि" था। भद्रकाली की सेवा करके उसे प्रत्यक्ष करा लेने के बाद से ही उसका नाम "भद्रकाली मट्टप्पल्लि" हो गया। तब से सब लोग इस घराने को "भद्रकाली मट्टप्पल्लि" ही कहने लगे और इस घराने में पैदा हुए नंबूरियों का नामकरण आज भी भद्रकाली मट्टप्पल्लि नंबूतिरि (प्पाड) ही किया जाता है।

प्रथम भद्रकाली मट्टप्पल्लि नंबूतिरीप्पाड एक बार नाव से वेंबनाड के कायल (समुद्र का अंदरूनी भाग) के जरिए तिरुवनंतपुरम की ओर जा रहा था। वैक्कम के पश्चिमी छोर पर पहुंचने पर उसे देवालय से नगाड़े की आवाज सुनाई दी। चूंकि नगाड़ा बजाने की रीति असाधारण रूप से शुद्ध थी, इसलिए नंबूरी ने सोचा, "इतनी शास्त्रीय रीति से नगाड़ा कौन बजा रहा है, यह जानना चाहिए। ऐसा नहीं लगता कि बजाने वाला कोई मनुष्य है। जरूर वह कोई देवलोकवासी होगा। जो भी हो, नाव यहीं रोक देता हूं।" और नाव को वहीं रुकवाकर तट पर उतरकर स्नानादि करके वह देवालय पहुंचा। वहां तब उत्सव का समय था। उत्सव की बलि के नगाड़े की आवाज ही नंबूरी ने सुनी थी। नगाड़ा एक स्त्री बजा रही थी।

वैक्कम देवालय के कर्मचारियों और अधिकारियों में से एक मारार के घर एक समय पुरुषों का अभाव हो गया। एक स्त्री और दो-तीन लड़कियां ही वहां बची थीं। वैक्कम देवालय से नियमित रूप से प्राप्त होनेवाले अन्न ही उनकी जीविका का एकमात्र साधन था। इसके बदले उस घर के लोग नगाड़ा बजाना, गाना गाना आदि कार्य मंदिर में किया करते थे। यह स्त्री इन सब कार्यों को अन्य मारारों को समझा-बुझाकर उनसे करवा लेती थी और मंदिर से प्राप्त अन्न पर गुजारा करती थी।

ऐसे में एक दिन उन सब मारारों ने सोचा कि उस स्त्री का घराना मंदिर में जो सेवा-कार्य करता है, उन्हें करने में हम उसकी मदद करना बंद कर दें, तो उसके ये सब अधिकार छिन जाएंगे और ये अधिकार तथा इनसे जुड़ी सुविधाएं हमें ही प्राप्त हो जाएंगी। तब उन सबने मिलकर उस स्त्री को बुलाकर कहा, "आपकी ओर से मंदिर में जो-जो काम होने चाहिए, उन्हें करने में अब हमारी रुचि नहीं है। कल उत्सव-बलि का दिन है। उसमें नगाड़ा बजाने की मुख्य जिम्मेदारी आपके घराने के लोगों की है। इसलिए किसी और को बुलाकर इस रस्म को विधिवत पूरा कराने की व्यवस्था कर लें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगी तो यह रस्म पूरी नहीं होगी। हमने आपको पहले ही सूचित कर दिया है।" उन दिनों वैक्कम का पेरुंतृक्कोविल देवालय कुछ नंबूतिरियों के अधिकार में था और वहां के राज्याधिपति वडक्कुमकूर राजा के आधिपत्य में आता था। मारारों ने जाकर इन सब से भी कह दिया कि उस स्त्री द्वारा की जाने वाली रस्मों को पूरा करने में हम मदद नहीं करेंगे।

उस स्त्री के बड़ी दीनता से प्रार्थना करने पर भी उन दुष्ट एवं दुराग्रही मारारों का दिल नहीं पसीजा और उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला। तब तक सूर्यास्त का समय लगभग हो गया और अगली सुबह तक दूसरी जगह से किसी को बुलाकर लाना संभव नहीं था। नगाड़ा बजाने में निपुण मारार वैसे भी आस-पास कहीं नहीं थे। कुल मिलाकर वह स्त्री चिंता एवं विषाद से ग्रस्त होकर निस्साहय हो गई। रात का भोजन किए बिना ही वह लेट गई और सोने से पहले उसने कहा, "मेरे पेरुंतृक्कोविलनाथ! अन्नदाता प्रभु! मेरी जीविका बचा लेना। आप ही इस विषम स्थिति से मुझे उभार सकते हैं। और कोई मार्ग मुझे नहीं सूझ रहा।" और रोते-रोते किसी प्रकार उसे नींद आ गई।

कुछ देर बाद पेरुंतृक्कोविलनाथ ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, "तुम बिलकुल चिंता मत करो। इस समय तुम गर्भवती हो। तुम्हारे गर्भ में एक पुत्र विद्यमान है। इसलिए कल उत्सव बलि के समय तुम्हीं नगाड़ा बजाना। सुबह उठकर स्नानादि करके मंदिर पहुंच जाना। तब नगाड़ा बजाने की रीति सब मैं समझा दूंगा।" राजा तथा नंबूरियों को भी स्वप्न में पेरुंतृक्कोविलनाथ ने आदेश दिया कि उत्सव-बलि के समय उसी स्त्री से नगाड़ा बजवाया जाए। इसलिए जब वह स्त्री स्नानादि करके सुबह मंदिर गई तो वहां मौजूद राजा व नंबूरी अधिकारियों ने उसी से नगाड़ा बजाने को कहा और उसने नगाड़ा बजाना शुरू कर दिया। उस दिन उत्सव के दौरान एक स्त्री द्वारा नगाड़ा बजाए जाने के पीछे यही कारण था।

स्नान करके मंदिर पहुंचने से लेकर उत्सव-बलि समाप्त होने तक उस स्त्री को अपना बोध नहीं रहा। पेरुंतृक्कोविलनाथ ने जैसे-जैसे सुझाया वैसे-वैसे वह करती गई। भगवान के निर्देशानुसार बजाने के कारण नगाड़ा बजाना एकदम शास्त्रानुकूल एवं असाधारण रूप से उत्तम रहा। चूंकि नगाड़ा इतने श्रेष्ठ ढंग से बजाया गया था, इसलिए बलि की सामग्री को स्वीकार करने के लिए तृक्कोविलनाथ के भूतगण सब प्रत्यक्ष होकर मुंह बाए पुजारी की ओर दौड़ आए। उन दिनों वैक्कम का पुजारी साधारण शिक्षा, तपोबल एवं बुद्धि का एक नंबूरी था और नगाड़े की दिव्य गूंज के अनुकूल बलि देने की सामर्थ्य उसमें नहीं थी। वह बस रस्मों की खानापूरी करना भर जानता था। इसलिए जब उसने विकराल स्वरूप वाले भूतगणों को प्रत्यक्ष होकर अपनी ओर बढ़ते देखा तो वह भय से कांपने लगा और उसने सोचा, "बलि देने में मुझसे कोई गलती हो गई तो ये भूतगण मुझे ही खा जाएंगे।" उस समय भद्रकाली मट्टप्पल्लि नंबूतिरिप्पाड मंडप में बैठा-बैठा जप कर रहा था। पुजारी ने तुरंत उससे कहा,"नंबूरिप्पाड मेरी रक्षा करें। नहीं तो ये सब मुझे पकड़कर खा जाएंगे। इस मंदिर की पुरोहिताई में से आधा हिस्सा इसी समय मैं आपको सौंपता हूं।" तब मट्टप्पल्लि नंबूरी ने उससे बलि का पात्र व फूलदान लेकर विधिवत सभी भूतों को बलि का अन्न दिया। सभी भूत अत्यंत तृप्त एवं संतुष्ट होकर वहां से चले गए। भद्रकाली को प्रत्यक्ष करनेवाले, सकलशास्त्रपारंगत, एक अच्छे तांत्रिक तथा मंदिर की रस्मों के पारखी मट्टप्पल्लि नंबूरिप्पाड को भूतों से डर न लगना स्वाभाविक ही था। वह उन्हें यथोचित रीति से तुष्ट कर सका, इसमें भी आश्चर्य की कोई बात नहीं। भद्रकाली मट्टप्पल्लि नंबूरिप्पाड को वैक्कम देवालय की पुरोहिताई इस प्रकार से प्राप्त हुई। आज भी वैक्कम की पुरोहिताई में मेक्काट्टु नंबूरी और मट्टप्पल्लि नंबूरी का बराबर का हिस्सा रहता है।

वैक्कम देवालय में पुरोहित का कार्यभार संभालने के बाद प्रथम भद्रकाली मट्टप्पल्लि नंबूरी ने वहीं रहना आरंभ किया। तब एक दिन कुंजमणपोट्टि कहीं से लौटते समय वैक्कम आया। भोजन आदि के बाद नंबूरी और पोट्टी परस्पर वार्तालप करके मन बहलाने लगे। तब प्रसंगवश पोट्टी ने कहा, "यदि किसी की सेवा करनी ही हो, तो वह चात्तन की ही करनी चाहिए। वह सब कामों में सहायता कर देता है।" तब नंबूरी ने कहा, "यह ठीक नहीं कहा आपने। सेवा करनी ही हो तो भद्रकाली की करनी चाहिए। भद्रकाली की सेवा करने से सिद्ध न होनेवाला कार्य इस दुनिया में नहीं है।" इस प्रकार वे दोनों बहस करने लगे। जब बहस गरम हो उठी तब पोट्टी ने कहा, "ठीक है, इसकी अभी परीक्षा करके देख लेते हैं। आइए, हम मंदिर के भीतर जाते हैं।" नंबूरी ने कहा, "हां-हां, चले चलिए।" दोनों जाकर मंडप में बैठ गए। तुरंत पोट्टी ने कहा, "कोई है? जरा पान तो ले आओ।" तब एक चात्तन एक नौकर के भेष में आकर पोट्टी को पान दे गया। तुरंत नंबूरी ने कहा, "काली कहां है? जरा पान तो लाना।" तब साक्षात भद्रकाली एक अति सुंदर स्त्री के रूप में पान लेकर आई। पोट्टी ने फिर कहा, "कोई है? जरा पीकदान तो लाना।" तुरंत एक आदमी, जिसके पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे, एक पीकदान लेकर हाजिर हुआ। पोट्टी ने उस पर पान की पीक थूक दी और वह आदमी उसे लिए हवा में विलीन हो गया। तुरंत नंबूरी ने कहा, "पीकदान कहां है? उसे लेकर आइए।" तुरंत एक स्त्री, जिसके भी पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे, पीकदान लेकर आई। नंबूरी ने उस में थूक दिया और स्त्री उसे लेकर अंतर्धान हो गई।

यह देखकर कुंजमणपोट्टी ने नंबूरी से कहा, "आपकी ही जीत हुई। मैं हार मान लेता हूं। मैंने नहीं सोचा था कि भद्रकाली इस हद तक सेवा करेगी।" और वह उठकर चला गया। तुरंत भद्रकाली नंबूरी के सामने एक बार फिर प्रत्यक्ष हुई और बोली, "इस तरह के कामों में मुझे लगाकर आपने ठीक नहीं किया। ये सब काम करना मेरे लिए मुश्किल है। इसलिए आप अब मुझे देख नहीं सकेंगे। लेकिन आपकी जो वाजिब मांगें होंगी, वे सब मैं पूरी करूंगी। आखिर आपने इतने दिनों मेरी सेवा जो की है।" यों कहकर भद्रकाली नंबूरी की आंखों से ओझल हो गई। उस दिन से भद्रकाली नंबूरी को अप्रत्यक्ष हो गई।

(समाप्त। अब नई कहानी।)

1 Comment:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

तांत्रिकों के वर्चस्‍व को बताने वाली एक और कथा।

धन्‍यवाद। जारी रखिएगा।

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