29 जून, 2009

24. भवभूति

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर - भाग-2)

उत्तररामचरित, मालतीमाधव आदि नाटक और अन्य कई साहित्यिक ग्रंथों के रचयिता महाकवि भवभूति के बारे में संस्कृत से थोड़ा भी परिचय रखनेवाले सभी लोगों ने सुना होगा। उनका असली नाम 'श्रीकंठन‘ था। उन्होंने एक बार

तपस्वी काम गतोवस्थामिति स्मेराननाविव ।
गिरिजाया स्तनौ वंदे भवभूतिसिताननौ ।।

इस तरह का एक श्लोक रचकर सहृदय समाज के सामने पेश किया था। इस श्लोक में जो ‘भवभूति’ शब्द आया है उसके शब्द-चमत्कार से प्रसन्न होकर सहृदयों ने उन्हें भवभूति नाम से विभूषित कर दिया और इसी नाम से उनकी भावी प्रसिद्धि हुई।

एक बार पार्वती देवी ने शिव भगवान से कहा, “कवित्व कला में कालिदास अधिक योग्य हैं या भवभूति?” इसका उत्तर शिव भगवान ने यों दिया, “दोनों में इस मामले में कोई खास अंतर नहीं है। कविता के पद ठीक किस तरह होने चाहिए, इस संबंध में कालिदास को पूर्ण निश्चय रहता है, लेकिन भवभूति इस संबंध में उतने पक्के नहीं हैं, यही फर्क है दोनों में।” इतना ही नहीं, शिव भगवान ने पार्वती को एक तरकीब भी बता दिया, जिससे इसका परीक्षण किया जा सकता था।

भगवान के उपदेशानुसार पार्वती ने एक बूढ़ी ब्राह्मण स्त्री का रूप धारण कर लिया और उनका बेटा सुब्रमण्य एक मृत बालक में बदल गया। पार्वती बालक के शव को गोदी में लेकर भोज राजा के प्रासाद के द्वार पर पहुंच गई और शव को वहीं लिटाकर स्वयं उसके पास खड़ी हो गई। जब राजा की सभा विसर्जित हुई कविगण एक-एक करके द्वार से निकलने लगे। उनमें से प्रत्येक से पार्वती इस प्रकार कहती, "अरे इस ओर जरा धयान दीजिए। मेरा बेटा एक शाप के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गया है। यदि कोई ‘पुरोनिस्सरणे रण:’ इस पद की ठीक प्रकार से समस्या पूर्ति कर दे, तो यह बच्चा जीवित हो सकता है। आप जरा मेरी मदद कर दीजिए।" यह सुनकर सभी कवियों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार समस्या-पूर्ति कर दी। तब पार्वती ने कहा, “लेकिन मेरा बेटा तो जीवित नहीं हुआ।” उन सबने यही जवाब दिया, “वह सब हम नहीं जानते” और चले गए। तब भवभूति द्वार से बाहर निकले। उनसे भी पार्वती ने वैसे ही कहा। भवभूति ने उस काव्य समस्या की पूर्ति इस तरह की –

यामीति प्रियपृष्ठायाः प्रियायाः कंठसक्तयोः ।
अश्रुजीवितयोरासील पुरोनिस्सरणे रण: ।।

तब पार्वती ने कहा, “मेरा बेटा तो जीवित नहीं हुआ।”

“इसका कारण मैं नहीं जानता। मैं जितनी अच्छी तरह से इस समस्या को पूरा कर सकता था, पूरा कर दिया। इससे बेहतर श्लोक रचना मेरे लिए संभव नहीं है। मेरे बाद एक और श्रेष्ठ कवि आएंगे, उनसे यदि आप अनुरोध करें, तो वे इसे और भी अच्छी तरह से पूरा करके देंगे,” यह कहकर भवभूति भी वहां से चले गए।

अंत में कालिदास द्वार से बाहर आए। उनसे भी पार्वती देवी ने उसी प्रकार कहा और कालिदास ने तुंरत ही उस समस्या को पूरा करके दे दिया। कालिदास ने समस्या को जिस तरह पूरा किया और भवभूति ने जिस तरह पूरा किया, उन दोनों में एक अक्षर का भी अंतर नहीं था। कालदिस से भी पार्वती ने कहा, "लेकिन मेरा बेटा तो जीवित नहीं हुआ।" यह सुनकर कालिदास बोले, “तब आपका बेटा जिंदा हो ही नहीं सकता, अथवा वह मरा ही नहीं है। इससे अधिक सुंदर रीति से इस समस्या की पूर्ति कोई भी नहीं कर सकता।” यों कहकर वे भी चले गए।

भवभूति और कालिदास द्वारा रचा गया श्लोक हूबहू एक जैसा था। कालिदास को पूरा भरोसा था कि उनकी समस्या-पूर्ति श्रेष्ठतम है, भवभूति को उतना भरोसा नहीं था। इस तरह पार्वती को बोध हो गया है कि शिव भगवान ने इन दोनों के संबंध में जो कहा था, वह सही है, और वे सुब्रमण्य को लेकर कैलास लौट आई और शिव को जो कुछ भी घटा था, कह सुनाया।

(समाप्त। अब नई कहानी।)

8 Comments:

shubhi said...

मुझे लगता है कि कालिदास भले ही अन्य रसों में भवभूति से कहीं आगे रहे होंगे लेकिन करूण रस के मामले में कालिदास उनकी बराबरी नहीं कर सकते। त्वया जगन्ति पुण्यानि, त्वया पुण्यानी जगन्तः अर्थात राम कहते हैं सीता से कि तुमसे सारा जग पवित्र है और लोग तुम्हारी पवित्रता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। भवभूति का उत्तररामचरित मास्टरपीस है।

अनुनाद सिंह said...

मुझे तो वह श्लोक सबसे पसन्द है जो मानवमात्र के लिये आशावादिता की प्रतिमूर्ति है-

ये नामकेचिद प्रथयन्त अवज्ञां,
जानन्तु ते तान् प्रति नैष यत्न:|
उत्पत्य्स्यते हि मम् कोपि समानधर्मा,
कालोऽयं निर्वधिर्विपुलास्च पृथ्वी||

(उत्तररामचरितम् की रचना के बाद पण्डितों ने भवभूति को उतना सम्मान नहीं दिया। इस पर उन्होने अत्यन्त आधावादिता और आत्मविश्वास का परिचय देते हुए कहा-

कुछ अनाम लोग जो मेरी कृति की अवज्ञा कर रहे हैं वे जान लें कि यह यत्न उनके लिये किया ही नहीं गया है। अवश्य ही कोई मेरा समानधर्मा उत्पन्न होगा (तब इस रचना को अवश्य ही सम्मान मिलेगा) क्योंकि इस काल की कोई सीमा नहीं है और पृथ्वी बहुत बड़ी है। )

अनुनाद सिंह said...

"...अत्यन्त आधावादिता और आत्मविश्वास.."

की जगह

"अत्यन्त आशावादिता और आत्मविश्वास"

P.N. Subramanian said...

सुन्दर प्रस्तुति. आभार

हिमांशु । Himanshu said...

भवभूति के कृतित्व के संबंध में कुछ भी अनावश्यक होगा । सब कुछ सर्वसिद्ध है । सुन्दर प्रसंग । आभार ।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लेख लिखा आप ने .
धन्यवाद

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

दोनों ही महाकवियों को मूलरूप में पढने और समझने का अपना भाग्य नहीं है परन्तु इस कथा में शिवजी के कथन में और माँ पार्वती के परीक्षण में जो बड़ा सन्देश छिपा है वह समझ में आ गया, ऐसा लगता है.

गिरिजेश राव said...

अन्ने, कालिदास, बाण, भारवी बचते हैं। उन पर भी लेख दें।

संस्कृत श्लोकों के अर्थ भी दे दें तो अच्छा हो। सभी संस्कृत नहीं जानते।

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