18 जून, 2009

21. गज कथा - किडङूर कंठघोरन



(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)


तिरुवितांकूर राज्य के प्रसिद्ध देवालयों में से सबसे कम प्रसिद्ध एक सुब्रह्मणयक्षेत्र (देवालय) है जो ऐट्टुमानूर तालुके के किडङूर प्रदेश में स्थित है। यह देवालय किडङूर ग्राम के अंतर्गत आनेवाले कुछ नंबूरियों के अधिकार में है। एक समय इस देवालय में कंठघोरन नामक एक प्रसिद्ध दंतैल हाथी था। आकृति और प्रकृति की दृष्टि से उसकी टक्कर का हाथी किसी भी देश में पहले कभी हुआ हो या इस समय मौजूद हो, ऐसा सुनने में नहीं आया है। इस हाथी का कद एवं आकर्षण वैक्कम के प्रसिद्ध तिरुनीलकंठन से कहीं अधिक था। तिरुनीलकंठन से वह ऊंचा भी था और उसके शरीर के मध्य भाग की लंबाई आसानी से उससे एक हाथ अधिक थी, ऐसा मैंने सुना है। सिर का उठान भी उतना ही शानदार था। आगे की ओर घुमावदार उसके दोनों दंतों की सुंदरता भी तिरुनीलकंठन के दंतों से कहीं ज्यादा थी। उसकी चाल भी उसी प्रकार अत्यंत प्रीतिकारी थी।

इस हाथी की बौद्धिक विशेषताएं तो इन सबसे अधिक विस्मयकारी थीं। साधुता और शूरता उसमें समान मात्रा में मौजूद थीं, जो किसी अन्य हाथी में विरले ही देखने में आता है। मदमस्त अवस्था में भी उसने किसी की हत्या नहीं की। साथी हाथियों पर अपने दंतों से प्रहार करने जैसी दुर्वृत्ति भी उसमें नहीं थी। अबोध बच्चे भी उसके समीप जाएं तो उन्हें उसने कभी नुकसान नहीं पहुंचाया। इतना साधु स्वभाव का होते हुए भी वह किसी भी महावत के आदेश का पालन नहीं करता था। महावतों को ही उसकी मर्जी समझकर उनके अनुसार चलना होता था। साधारण हाथियों के समान उसे बांधकर नहीं रखा जाता था। उसे इच्छानुसार विचरने को खुला छोड़ दिया जाता था। खुला रहने पर भी वह किसी प्रकार का उपद्रव नहीं मचाता था। रात होने पर वह कहीं जाकर लेट जाता था। देवालय के उत्तर में बहती नदी में एक बड़ा कुंड था। दिन में अधिकांश समय वह उसी में लेटा रहता था। भैंसों के साथ कंठघोरन को बड़ा लगाव था। जिस कुंड में वह लेटता था, वहां नियमित रूप से बहुत-से भैंस-भैंसे भी एकत्र हो जाते थे। जब उन सबको भूख सताने लगती, तब कंठघोरन उन्हें लेकर तट पर आ जाता था। किडङूर में गन्ने की खूब खेती होती थी और नदी-किनारे गन्ने के बहुत से खेत थे। किसी एक खेत की बाड़ को तोड़कर सब भैंसों को उस राह खेत में घुसाकर कंठघोरन बाड़ के पास ही पहरा देने लगता था। भैंसों को खेत से खदेड़ने के इरादे से कोई वहां आए, तो कंठघोरन उस पर झपट पड़ता था। लेकिन वह किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाता था। कंठघोरन को अपनी ओर बढ़ते देखकर लोग भयभीत होकर स्वयं ही तितर-बितर हो जाते थे। जब भैंसों का पेट भर जाता, कंठघोरन उन सबको लेकर जलकुंड में लौट आता था। लेकिन वह स्वयं खेत में से गन्ने का एक डंठल भी नहीं लेता था। उसे उसका भोजन महावत ही नियमित रूप से खिलाते थे। वह था मंदिर से प्राप्त चावल, खीर, केला आदि। इसके अलावा वह दूसरे से कुछ भी छीनकर नहीं खाता था।

एक बार रात के समय जब कंठघोरन उस कुंड में लेटा हुआ था, तब अदरक, हलदी, नारियल, सुपारी आदि से लदी एक नाव पूर्व से उस नदी में बहती हुई आई। खेवटों ने पानी में लेटे हाथी को नहीं देखा और नाव उसके ऊपर चढ़ा दी। क्रोध में आकर कंठघोरन ने नाव को उलट दिया और उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। सब खेवट डर के मारे किसी प्रकार तैरकर किनारे पहुंच गए। उन्हें उसने कुछ नहीं किया। उस दिन से कंठघोरन को नौकाओं और खेवटों से बड़ा वैर हो गया। कोई नाव दिखते ही वह उसे तोड़ देता था। इसलिए कंठघोरन जब तक जीवित रहा, खेवट उस मार्ग से नाव तभी ले जाते थे, जब उन्हें पूरा निश्चय हो जाए कि वह कुंड में नहीं है। पूर्व से पश्चिम और पश्चिम से पूर्व को जानेवाली नावें कुंड के बहुत दूर ही रुक जाती थीं और खेवट नाव से उतरकर तट पर आकर अच्छी तरह देख लेते थे कि कंठघोरन कुंड में है या नहीं। जब वह नहीं होता था, तभी वे नाव को आगे बढ़ाते थे। कंठघोरन से कुंड में मुलाकात न होने के लिए वे सब किडङूर सुब्रह्मण्यम क्षेत्र में पूजा करते थे और हुंडी में पैसा डालते थे। इस प्रकार इकट्ठे हुए पैसे से उस मंदिर में एक नया दीपस्तंभ बनाया गया था, जो आज भी वहां खड़ा है।

जब मंदिर में घोषयात्रा का समय होता था, तो महावत कंठघोरन को बुलाकर या पकड़कर नहीं लाते थे। घोषयात्रा के आरंभ में बजाए जानेवाले नगाड़े की आवाज सुनकर वह स्वयं ही कुंड से उठकर ध्वजदंड के नीचे उपस्थित हो जाता था। उसको सजाने के लिए महावत उसके पास जाते तो वह अपना एक पिछला पैर ऊपर उठा देता था। वे सब उस पर पांव रखकर उसकी पीठ पर चढ़ते थे और उसके मस्तक पर चादर बांधते थे। इसके बाद वे उसके पीछे की ओर से ही नीचे उतर पड़ते थे। कंठघोरन ने यह नियम बना रखा था कि कोई भी आगे की ओर से उस पर नहीं चढ़ेगा। केवल घोषयात्रा के दौरान प्रतिमा को पकड़े हुए व्यक्ति को वह आगे से चढ़ने देता था। प्रतिमा को चढ़ाते समय वह किसी के कहे बगैर ही अपने घुटनों को मोड़कर झुक जाता था। छतरी, चंवर आदि पकड़नेवाले सबको पीछे की ओर से उस पर चढ़ना होता था। श्रीवेली, दीपाराधना आदि के लिए घोषयात्रा करते समय यदि महावत उससे तेज अथवा धीमी चाल से चलने के लिए कहता तो वह उसके आदेश की ओर कान नहीं देता था। उसे स्वयं इसका अनुमान था कि इन सबके लिए कितना समय लेना चाहिए। उसी के अनुसार वह चलता था। उसका यह अनुमान अत्यंत सटीक और सबके लिए सुविधाजनक भी होता था। चेंडै (नगाड़े जैसा एक वाद्य) बजाने आदि के लिए कहां-कहां और कितनी देर रुकना है, यह भी उसे पता था। इसी प्रकार नागस्वरम प्रदक्षिणा (शहनाई जैसे एक वाद्य को बजाते हुए प्रतिमा को लेकर मंदिर की प्रदक्षिणा करना) के बारे में भी उसकी एक धारणा थी। उत्सव के दूसरे दिन घोषयत्रा के दौरान हर जगह वह पहले दिवस से अधिक समय रुकता था और तीसरे दिन दूसरे दिन से अधिक समय के लिए। इस प्रकार उत्सव के उत्साह के क्रमेण बढ़ने की उसे जानकारी थी और उसी के अनुसार वह आचरण करता था। पल्लिवेट्टा (भगवान की मृगया), आराट्टु (घोषयात्रा) आदि के दौरान सूर्योदय तक खड़े रहने में उसे कोई एतराज नहीं था। इस सबके लिए उससे कुछ कहने की भी आवश्यकता नहीं होती थी, उसे स्वयं सब पता था। लेकिन यदि मंदिर के अधिकारी यह सोचें कि किसी दिन दीपाराधना या श्रीवेली (दिन की प्रथम घोषयात्रा) थोड़ी जल्दी समाप्त करें, तो इसकी वह इजाजत नहीं देता था। वह तेज न चले तो दूसरे लोग कर भी क्या सकते थे? इसी प्रकार इन सब रस्मों के लिए नियत समय से अधिक समय कोई लेना चाहे, तो इसकी भी वह अनुमति नहीं देता था। समय हो जाने पर वह आगे बढ़ जाता था। तब बाजा बजाने वाले आदि उसके पीछे चल पड़ने के सिवा कर ही क्या सकते थे? दीपाराधना में हर दिन के लिए निश्चित मात्रा भर नारियल का तेल मापकर दीपक में डाला गया हो और बत्ती की लंबाई ठीक रखी गई हो तो दीपाराधना की समाप्ति पर दीपक का सारा तेल खर्च हो चुका होता था। तेल नियत मात्रा से थोड़ा ज्यादा डाला जाए तो दीपाराधना समाप्त होने पर दीपक में तेल बचेगा। इसी प्रकार कम डाला जाए तो दीपाराधना समाप्त होने से पहले दीपक में और तेल डालना पड़ेगा। कंठघोरन का समय पालन इतना पक्का होता था। जब तक कंठघोरन जीवित था, तब तक मंदिर के वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए तेल की खपत में घोटाला करके पैसा कमाना असंभव रहा। कुछ भी गड़बड़ करने पर वह तुरंत ही पकड़ी जाती थी। यह सभी जानते थे कि कंठघोरन का समय बोध गलत नहीं हो सकता।

कंठघोरन के स्वभाव को दर्शाने वाले अनेक दृष्टांतों में से एक दृष्टांत मैं यहां दे रहा हूं। एक बार श्रीवेली के बाद कंठघोरन एक संकरे रास्ते से जा रहा था। एक मोड़ मुड़ने पर उसका सामना पकी उम्र की एक नंबूरी स्त्री से हुआ। अपने सामने हाथी को देखकर वह वृद्धा तुरंत बेहोश होकर हाथी के पैरों के सामने गिर पड़ी। उसके साथ आई लड़कियां हाथी को देखते ही पलटकर भाग गईं। हाथी के लिए न फीछे हटना संभव था न आगे बढ़ना। वह गली बहुत ही संकरी थी। कंठघोरन ने कुछ समय इंतजार करके देखा। पर तब भी स्त्री को होश न आने से उसे उसने बड़ी सावधानी से अपनी सूंड़ में उठाकर पास के एक घर के बरामदे में रख दिया। वृद्धा की छतरी भी वहां पड़ी थी। उसे भी उसने उठाकर स्त्री के पास रख दिया। इस प्रकार अपने लिए रास्ता बनाकर वह आगे बढ़ गया। यह कहने की जरूरत नहीं कि उस समय महावत आदि कोई वहां नहीं मौजूद था। उस स्त्री को जरा भी तकलीफ नहीं हुई। इतनी बुद्धिसामर्थ्य किस हाथी में होती है? हाथी के चले जाने के कुछ समय बाद स्त्री को होश आया। वह उठकर छतरी लेकर अपने रास्ते चली गई। इस प्रकार की अनेक विस्मयकारी घटनाएं कंठघोरन के साथ जुड़ी हुई हैं।

बहुत-से लोग कंठघोरन को लकड़ी उठवाने ले जाते थे। तना चाहे जितना मोटा और लंबा क्यों न हो, कंठघोरन उसे आसानी से उठा लेता था। उसका एक सिरा बांधकर उसकी सूंड़ में दे देने पर वह उसे उठा लेता था। लेकिन यह सब तभी करता था जब उसका जी करे। किसी के कहने से वह नहीं करता था। महावतों और मंदिर के अधिकारियों को जो रकम नियमानुसार देना होता था, उसके अलावा कंठघोरन को भी कुछ दिए बगैर उससे लकड़ी उठवाना किसी के लिए भी संभव नहीं था। इन सब कार्यों के लिए एक महावत तो चाहिए ही। मंदिर में पांच-छह महावत थे, जिनमें से एक प्रधान था। उसी के साथ कंठघोरन लकड़ी उठाने जाता था। किसी दूसरे महावत के कहने से वह एक टहनी भी नहीं उठाता था। इसलिए मंदिर के अधिकारियों की अनुमति प्राप्त कर लेने के बाद इस महावत को भी कुछ देकर मनाना पड़ता था। इसके बाद कंठघोरन को क्या-क्या दिया जाएगा, यह भी कहना पड़ता था। काम हो जाने के बाद यह सब सामग्री तुरंत न दी गई, तो कंठघोरन लकड़ी को उठाकर पहले की जगह पर डाल देता था। कंठघोरन की यही विशेषता थी। लकड़ियों की लंबाई, मोटाई, संख्या, उन्हें कहां रखना है, काम के बदले क्या प्रतिफल उसे मिलेगा, यह सब उसके सामने पहले ही कहना पड़ता था। इन सबसे वह सहमत है या नहीं, यह वह सिर हिलाकर या चिंघाड़कर जाहिर कर देता था। यदि वह सहमत न हो तो प्रतिफल की मात्रा बढ़ा देने से वह कभी-कभी मान जाता था। प्रतिफल के रूप में उसे केला, नारियल, गुड़, खीर आदि दिया जा सकता था।

एक बार एक व्यक्ति एक बड़े तने को उठाकर एक स्थान पर रखवाने के लिए कंठघोरन के पास आया। मंदिर के अधिकारी व महावत सहमत हो गए। महावत ने उस व्यक्ति से पूछा, "कंठघोरन को क्या देंगे?" तब उसने कहा, "केले के दस गुच्छे, दस नारियल और एक मन गुड़।" तुरंत महावत और कंठघोरन ने जाकर वह तना नियत स्थान पर रख दिया। लेकिन काम हो जाने के बाद उस व्यक्ति ने कंठघोरन को नियत प्रतिफल नहीं दिया, बल्कि कहा कि कुछ दिनों बाद दूंगा। यह सुनकर कंठघोरन को बेहद गुस्सा आया। उसने उसी समय उस तने को उठाकर उसके पूर्व स्थान पर रख दिया। उस समय वह व्यक्ति वहां नहीं था। जब वह आया तो तने को पहली वाली जगह पर ही पड़ा देखकर चकित रह गया। दूसरे बहुत से हाथियों को बुलाकर उसने उसे उठवाने की कोशिश की, लेकिन वे उसे तिल भर दूर भी खिसका नहीं सके। अंत में हारकर उसे कंठघोरन के ही पास आना पड़ा। उसने मंदिर के अधिकारियों और महावत को तो मना लिया, लेकिन कंठघोरन से पूछा गया तो उसने मना कर दिया।

(समाप्त। इसके साथ ही कोट्टारत्तिल शंकुण्णि द्वारा विरचित मलयालम ग्रंथ ऐतीह्यमाला का प्रथम भाग पूरा हुआ। अब भाग 2 की कहानियां।)

5 Comments:

गिरिजेश राव said...

कंठघोरन को 'गज मानव' की उपाधि आद दे दें।

बालसुब्रमण्यम said...

गिरिजेश: हां सही कहा। लेखक ने हाथी का मानवीकरण हद दर्जे तक किया है। दरअसल उसने उसे एक आदर्श मजदूर के रूप में प्रस्तुत किया है - थोड़ा सा बेवकूफ, काम में कुशल, अपने अधिकारों के प्रति सजग, ईमानदार, अन्याय को न बर्दाश्त करनेवाला।

आखिर केरल साम्यवाद की प्रयोगशाला भी रही है, हाथी भी साम्यवादी विचारधारा से बचे कैसे रह सकते थे!

सलीम खान said...

आपका ब्लॉग सुन्दर है और तर्कों से परिपूर्ण भी....

yuva said...

Balaji, aap itna samay kaise nikaal lete hain. Adbhut prayaas

राज भाटिय़ा said...

भाई सुना है कि हाथी बहुत ही समझदार जानवर होता है, लेकिन यह कंठ्घोरन तो हम सब से भी ज्यादा समझदार है, आप ने लेख को इस ढंग से लिखा की पढते पढते पता ही नही चला कि इतना लम्बा लेख है, यानि आप ने आंधे रखा,
बहुत सुंदर.
धन्यवाद

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