16 मई, 2009

10. मुट्टस्सु नंबूरी - 1

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

सरस्वती के क्रीड़ास्थल जिह्वा के बल पर अत्यंत कीर्तिशाली हुए ब्राह्मणों का यह घराना तिरुवितांकूर राज्य के प्रसिद्ध वैक्कम मंदिर के पास रहता था। इतना ही नहीं, वैक्कम मंदिर में आम भोज के प्रबंध का ठेका भी इसी घराने के ब्राह्मणों को मिलता था। आज भी मंदिर की सबसे बड़ी पाकशाला में मुट्टस्सु नंबूरी की अनुपस्थिति में चूल्हा सुलगाना मना है। यहां मैं इस घराने में लगभग पचास साल पूर्व जीवित एक नंबूरी के बारे में कुछ बताने वाला हूं।

इस प्रसिद्ध नंबूरी का असाधारण वाग्विलास किस प्रकार विकसित हुआ, इसके संबंध में सबसे पहले बता दूं। जब ये नंबूरी दीक्षा ग्रहण करके विद्यार्थी के रूप में रह रहे थे, तब उन्होंने एक बार मूकांबिका जाकर वहां के मंदिर में एक मंडलपूजा की थी। उस समय इस मंदिर के दिव्य त्रिमधुर नैवेद्य का सेवन करने का अवसर प्राप्त होने से ही उन्हें यह सिद्धि हुई। मूकांबिका का यह दिव्य प्रसाद मलयालियों को सुलभ न था, यह तो प्रसिद्ध ही है। इस त्रिमधुर के माहात्म्य के बारे में भी कुछ जान लेना आवश्यक है।

मूकांबिका में शाम की पूजा के बाद गर्भगृह का द्वार बंद करते समय शक्कर, केला, शहद आदि मधुर पदार्थों को एक बर्तन में डालकर प्रतिमा के सामने रखने का रिवाज है। चूंकि हर रोज रात होने पर देवी-देवता वहां आकर भगवती की पूजा करते थे, इसलिए उस त्रिमधुर नैवेद्य का सेवन भी वे ही करते थे। इसी कारण से उस त्रिमधुर को असाधारण दिव्यता प्राप्त है और उसे खानेवाले को वाणी का असामान्य विलास प्राप्त होता था। इसीलिए परदेशियों के प्रति, विशेषकर मलयालियों के प्रति, अत्यंत ईर्ष्या भाव रखने वाले वहां के पुजारी यह नैवेद्य किसी को भी न देकर, एक गहरे कुंए में फेंक देते थे। क्योंकि प्रतिदिन सवेरे गर्भगृह का द्वार खोलने पर पिछले दिवस देवी-देवताओं द्वारा भगवती की आराधना में अर्पित पारिजात आदि दिव्य पुष्प वहां पड़े मिलते थे, इसलिए मंदिर में यह नियम-सा बन गया था कि रात की पूजा करने वाला पुजारी अगले दिन सुबह पूजा न करे। इतना ही नहीं, "गर्भगृह में जो कुछ भी मैंने देखा है, उसके बारे में किसी से नहीं कहूंगा," यह प्रतिज्ञा कराकर ही पुजारियों को प्रतिदिन गर्भगृह में जाने दिया जाता था।

मुट्टस्सु नंबूरी ने मुकांबिका पहुंचकर कुछ ही दिनों में वहां के रीति-रिवाजों के बारे में सब जान लिया। जैसे भी हो इस दिव्य त्रिमधुर का सेवन करना ही है, यह निश्चय करके वे मौके की ताक में रहने लगे। एक दिन प्रभातवेला में प्रतिदिन की तरह स्नान आदि करके नंबूरी मंदिर के मंडप में पहुंचे और वहां आंखें मीचकर जप करने लगे। तब पुजारी ने आकर गर्भगृह का द्वार खोला। पिछले दिन के त्रिमधुर को कुंए में फेंकने से पहले एक घड़ा पानी लाने के विचार से पुजारी कुंए की जगत की ओर चल पड़ा। मौका देखकर नंबूरी ने गर्भगृह में घुसकर थोड़ा त्रिमधुर निकालकर अपने मुंह में डाल लिया। यह देखकर पुजारी दौड़कर आया और नंबूरी के गले पर अपना पंजा जमा दिया। फिर दोनों में वहीं द्वंद्व युद्ध ही छिड़ गया। लेकिन नंबूरी ने अपने मुंह में पड़ा त्रिमधुर किसी प्रकार पेट में भी डाल लिया। पुजारी की पुकारें सुनकर असंख्य जन वहां इकट्ठे हो गए। सभी ने मिलकर नंबूरी को पकड़कर मारना शुरू कर दिया। उनके सिवा वहां कोई और मलयाली आदमी मौजूद नहीं था। ऊपर से वे एक अपरिचित स्थल पर भी थे। जब वे सोच रहे थे कि हे ईश्वर, प्राण रक्षा के लिए क्या करूं? तब भगवती के अनुग्रह से उन्हें एक उपाय सूझा। श्वास खींचकर, आंखें मूंदकर वे यों लेट गए मानो मर ही गए हों। यह देखकर उन्हें मारनेवाले लोगों को डर लगा और वे नंबूरी को उठाकर मंदिर के बाहर ले गए। फिर भी श्वास के चलने का कोई संकेत न मिलने पर उन्होंने समझा कि यह तो मर गया और उन्हें उठाकर एक बड़े वन में ले जाकर डाल दिया। जब सब लोग चले गए, तब नंबूरी सावधानी से उठे। मार खाकर उनके शरीर का पोर-पोर दुख रहा था और हड्डी-पसली एक हो गई थी। फिर भी प्राणभीति के कारण वे किसी प्रकार वहां से लंगड़ाते हुए चल पड़े और कुछ ही दिनों में अपने घर पहुंच गए। फिर इलाज से वे पहले के जैसे स्वस्थ-तंदुरुस्त हो गए। इसके बाद ही उनमें एक-एक करके अनेक दिव्यताएं प्रकट होने लगीं। लेकिन इनके अधिकांश क्रियाकलाप असभ्यतापूर्ण होने से, कुछ निर्दोष प्रसंगों की ही यहां चर्चा संभव हो सकेगी।

(... अगले लेख में जारी)

3 Comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

दिलचस्प!

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

रोचक,


जारी रखिएगा।
एक नियमित पाठक का आग्रह।

Shahi said...

Very Intresting....

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