10 मई, 2009

7. तलक्कुलत्तूर भट्टतिरी और पाषूर की कुटियां - 5

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

भट्टतिरी के वीर्य से गर्भवती हुई कणियन स्त्री का गर्भ दस माह का होने पर परिपक्व हुआ और उसने एक तेजस्वी एवं कोमल स्वरूप के पुत्र को जन्म दिया। उस स्त्री ने यथासमय उस लड़के का विद्याध्ययन कराया और वह अपनी बुद्धिसामर्थ्य से एक अच्छा विद्वान और ज्योतिष बन गया। जन्मकुंडली लिखने, प्रश्न विचारने आदि में उसकी प्रवीणता लगभग भट्टतिरी की जितनी ही थी।

एक बार इस कणियन से एक नंबूदिरी की अकस्मात मुलाकात हुई। उस समय नंबूदिरी की पत्नी गर्भवती थी। नंबूदिरी ने कणियन से कहा, "मेरी स्त्री लड़के को जन्म देगी या लड़की को?" कणियन ने तुरंत कहा, "लड़की होगी और मैं अभी उसकी जन्मकुंडली बना देता हूं" और एक बच्ची की जन्मकुंडली बना कर दे दी। उस कुंडली में बताए गए समय पर नंबूदिरी की पत्नी का प्रसव हुआ और एक लड़की पैदा हुई। यह देखकर नंबूदिरी को कणियन पर अपार विश्वास हो गया। इसके बाद जब भी नंबूदिरी की पत्नी गर्भवती होती, नंबूदिरी कणियन के पास जाता और कणियन तुरंत ही गर्भस्थ शिशु की जन्मकुंडली बनाकर दे देता। यों नंबूदिरी के नौ पुत्रियां हुईं और एक भी पुत्र न हुआ। इससे उसे जो दुख हुआ वह निश्चय ही वर्णनातीत है। दसवीं बार जब पत्नी गर्भवती हुई तो नंबूदिरी एक बार फिर कणियन के पास गया। हर बार की तरह कणियन ने कहा कि इस बार भी लड़की होगी और एक बच्ची की जन्मकुंडली बनाकर नंबूदिरी को दे दी। कणियन के कह देने के पश्चात तिल भर का भी बदलाव संभव नहीं है, यह जानकर नंबूदिरी को और भी अधिक मायूसी होने लगी।

जब मामला इस मोड़ पर था तब एक पथिक स्वेच्छा से उस नंबूदिरी के घर आया। सुना है कि वह तैक्काट्टुश्शेरी का तैक्काट्टु नंबूदिरी था। यह नंबूदिरी किसी यात्रा से लौट रहा था और भोजन आदि के लिए इस घर पर रुका था। पथिक को आया देख गृहस्थ नंबूदिरी ने उसका यथायोग्य सम्मान किया और कहा, "जल्दी से नहाकर आएं। भोजन तैयार ही है।"

गृहस्थ नंबूदिरी अत्यंत निर्धन था, पर था उदार मनोवृत्तिवाला। जब पथिक नंबूदिरी स्नान-पूजा करके लौटा तब तक भोजन तैयार हो गया था। दोनों ने भोजन किया और बरामदे में आकर पान खाने और वार्तालाप करने लगे। गृहस्थ ने अपनी सारी समस्याएं पथिक को सुना दीं। तब पथिक ने कहा, "ठीक है। इस समय आपकी घरवाली का गर्भ कितने माह का हो गया है?" गृहस्थ ने कहा, "एक महीने का हुआ है।" पथिक, "बस इतना ही? तब तो यह जरूरी नहीं कि इस बार भी पुत्री ही हो। यदि आप चालीस दिन के खर्चे का प्रबंध कर देंगे और मुझे यहां रहने देंगे, तो मैं पुत्र का प्रसव करा सकता हूं।" यह सुनकर गृहस्थ ने कहा, "जन्म तो पुत्री का ही होगा, ऐसा कणियन ने कहा है और एक पुत्री की जन्मकुंडली भी उसने लिखकर दी है। ऐसे में कन्याजन्म टालना जरा कठिन होगा। कणियन असाधारण रूप से प्रतिभा संपन्न है और उसका वचन कभी झूठा नहीं निकलता।" पथिक, "वह सब ठीक है। आप चालीस दिन के लिए मेरे यहां रहने का प्रबंध कर दें। फिर कणियन तो क्या ब्रह्मा भी बीच में आएं तो भी मैं उपाय कर लूंगा।" जब गृहस्थ ने पथिक का यह दृढ़ विश्वासपूर्ण वचन सुना तो सहमत हो गया। इसके पश्चात पथिक चालीस दिन गृहस्थ के यहां रहा और जप करके उसने गृहपति की घरवाली को घी खाने को दिया। फिर उसने कहा, "प्रसव के दिन मैं आऊंगा। कणियन को भी अवश्य बुलवाएं। देखेंगे किसकी बात सही निकलती है।" यह कहकर पथिक चला गया।

जब प्रसव का समय हुआ तो पथिक नंबूरी दुबारा गृहस्थ के यहां आ गया। गृहस्थ से उसने कहा कि मेरे आगमन और मेरे वचनों के संबंध में कणियन से कुछ न कहें, और खुद भीतर जाकर बैठ गया। इन सब बातों से बेखबर कणियन भी वहां आ गया। उसी समय वहां एक काशीवासी भी अचानक आ पहुंचा। तुरंत ही गृहस्थ की घरवाली को प्रसव-पीड़ा होने लगी। तब गृहस्थ ने कणियन से पूछा, "क्यों रे कणियन, पुत्री ही है न?"

कणियन ने कहा "इस दास की लिखी हुई जन्मकुंडली आज तक गलत नहीं निकली है। फिर आपको क्यों शंका हो रही है? इस बार भी पुत्री ही होगी।"

"हर बार सही होने पर भी इस बार तुमसे थोड़ी चूक हो गई है। घरवाली पुत्र को ही जन्म देगी, इसमें संदेह नहीं।" गृहस्थ ने कहा।

"ऐसा हो ही नहीं सकता", कणियन ने भी जवाब दिया।

जब वे इस प्रकार बहस कर रहे थे, तभी एक गाय को प्रसव-पीड़ा आरंभ हुई और यह स्पष्ट हुआ कि वह तुरंत ब्याने वाली है। यह देखकर गृहस्थ ने कहा, "ठीक है कणियन, जरा बताओ तो, यह गाय बछड़ा ब्यायेगी या बछिया?" कणियन ने तुरंत जवाब दिया, "बछड़ा होगा। उसके माथे पर तिलक भी होगा।" तब काशीवासी ने कहा, "माथे पर नहीं पूंछ पर निशान होगा।"

कणियन, "वह अभी देखेंगे।"

कुछ समय बाद गाय ब्यायी। बछड़ा ही हुआ, पर जैसा काशीवासी ने कहा था, उसकी पूंछ पर निशान था, न कि माथे पर। तब कणियन के मन में लज्जा और विस्मय हुआ तथा काशीवासी के प्रति सम्मान की भावना जगी और यह चिंता भी होने लगी कि कहीं नंबूदिरी की घरवाली को पुत्र न पैदा हो जाए। इन सब विरोधी भावनाओं के एक साथ प्रकट होने से वह अत्यंत परेशान हुआ। तुरंत ही गृहस्थ की घरवाली ने भी प्रसव किया। लड़का पैदा होने से कणियन की परेशानी दुगनी हो गई। शास्त्रानुसार कही हुई उसकी बात गलत कैसे सिद्ध हुई, यह समझ में न आने से उसने काशीवासी से पूछा, "हे महात्मा, यह कैसे हो गया? मैंने शास्त्रानुसार ही दोनों बातें कही थीं। वे दोनों ही गलत निकलीं। बछड़े के माथे पर तिलक नहीं था, और वहां पुत्र का जन्म हुआ। क्या मेरे शास्त्र की ही किसी कमी के कारण यह हुआ है?"

काशीवासी ने कहा, "शास्त्र में तो कोई कमी नहीं है। शास्त्र पढ़ लेने पर भी यदि उसे युक्तिपूर्वक विचारे बिना उपयोग किया जाए तो गलत परिणाम निकल सकते हैं। ये दोनों भविष्यवाणियां तुम्हारी विचार प्रक्रिया की न्यूनता के कारण गलत सिद्ध हुईं।"

तब कणियन ने कहा, "इसके बारे में कुछ अधिक विस्तार से समझाएं तो अच्छा।"

तब काशी वासी ने कहा, "गर्भ के तीन महीने होने से पहले उसे पुत्र या पुत्री में बदलने की शक्ति ब्राह्मणों में होती है। यह उनके वेदाभ्यास का माहात्म्य है। इसलिए गर्भ के तीन महीने के होने के पश्चात ही जन्मकुंडली बनाने की प्रथा है। नंबूदिरी की स्त्री-संतान को पुरुष-संतान में बदलनेवाला महानुभाव इस समय इस मकान के भीतर मौजूद है। तुमने इन सब संभावनाओं को ध्यान में नहीं रखा और जन्मकुंडली की गणना करते समय दिखे लक्षणों के आधार पर इस समय स्त्री-संतान की भविष्यवाणी की। तात्कालिक परिस्थितियों पर गौर न करने के ही कारण तुम्हारा यह कथन गलत सिद्ध हुआ। फिर जब वह बछड़ा गर्भ में लेटा था तो उसकी पूंछ मुड़कर उसके माथे पर आ गई थी। इसीलिए तुम्हें भ्रम हुआ कि उसके माथे पर तिलक है। यह गलती भी तुम्हारी विचार-पद्धति की न्यूनता के ही कारण हुई। कुछ और मनोयोग से बिचारते तो तुम इन गलतियों से बच सकते थे।" काशीवासी के इन सारगर्भित वचनों को सुनकर कणियन को संदेह हुआ कि ये कहीं उसके पिता तलक्कुलत्तूर भट्टतिरी तो नहीं हैं। उसने इस संबंध में काशीवासी से पूछा। काशीवासी ने स्वीकार किया कि वे ही तलक्कुलत्तूर भट्टतिरी हैं। अपने पिता के संबंध में कणियन ने अपनी माता से खूब सुना था। इसलिए उसने काशीवासी के पैरों पर पड़कर नमस्कार किया। जब काशीवासी को पता चला कि यह उनका ही पुत्र है तो उन्हें भी अतीव प्रसन्नता हुई। तत्पश्चात दोनों पिता-पुत्र कणियन के घर की ओर चल दिए।

(... अगले लेख में जारी)

2 Comments:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

मैं अभिभूत हूं। ज्ञानवर्द्धक जानकारी। आपके मार्गदर्शन के लिए नियमित रूप से आता रहूंगा।


एक बार फिर आभार।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

इस ज्ञानवर्द्धक जानकारी हेतु आभार.....लेख के आगामी भाग की प्रतीक्षा रहेगी.

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