03 मई, 2009

6. परयी से जन्मा पंदिरम कुल - 6 : उलियनूर पेरुंदच्चन

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

उलियनूर पेरुंदच्चन ने भी अनेक अद्भुत कार्य किए हैं। स्वदेश में ही एक देवालय के उपयोग के लिए वहां के अधिकारियों के कहने पर उन्होंने एक तालाब बनाया था। जब तालाब खुदने के बाद उसके चारों ओर पत्थर रखे जाने लगे तब अधिकारियों में से किसी ने कहा कि तालाब आयताकार होना चाहिए, किसी ने कहा, नहीं वृत्ताकार होना चाहिए, किसी ने कहा, नहीं, चौकोर होना चाहिए, इत्यादि।

तब पेरुंदच्चन ने कहा, "आप सब परेशान न हों। सभी के इच्छानुसार तालाब गोलाकार, आयताकार, चौकोर और अंडाकार बन जाएगा। तब तो आप सब संतुष्ट हो जाएंगे न?" और ऐसा ही एक तालाब तैयार कर दिया। इस तालाब को एक-एक कोने से देखने पर वह, जैसे पेरुंदच्चन ने कहा था, अलग-अलग आकृति का दिखाई देता है। तालाब में उतरने पर आज भी कोई यह नहीं समझ पाता कि पूर्व और पश्चिम दिशाएं कौन-सी हैं। इसलिए ब्राह्मण उस तालाब में स्नान करके नित्यकर्म नहीं करते।

पेरुंदच्चन के एक अति दिव्य पुत्र भी था। जब पेरुंदच्चन ने यह तालाब बनाया, तब उस पुत्र ने कहा, "नदी पार करके कौन इस तालाब पर आएगा?" उस समय तालाब देवालय के निकट और नदी उससे कहीं दूर थी। इसलिए पेरुंदच्चन ने नाराज होकर कहा, "तू यह कैसी पागलों जैसी बातें करता है। नदी कितनी दूर है।" तब उनके पुत्र ने कहा, "बस, आप देखते जाइए।" कुछ समय बाद दूर बहनेवाली नदी दिशा बदल कर तालाब और मंदिर के बीच में से बहने लगी। तब मंदिर उसके एक किनारे पर और तालाब दूसरे किनारे पर हो गए। लोगों ने नदी पार करके तालाब पर जाना भी बंद कर दिया। आज यही स्थिति बनी हुई है।

फिर पेरुंदच्चन ने एक नदी पर एक पुल बनाया। इस पुल की भी अनेक विशेषताएं थीं। पुल के एक सिरे पर एक मूर्ति थी। दूसरी ओर से कोई व्यक्ति पुल पार करने लगे तो यह मूर्ति नीचे उतरने लगती थी। जब व्यक्ति पुल के बीचोंबीच आ जाता तो मूर्ति पानी में डुबकी लगाती थी। जब तक व्यक्ति पुल के अंतिम भाग तक पहुंचता, तब तक वह मूर्ति अपने मुंह में पानी भरकर ऊपर आ चुकी होती थी और जब वह व्यक्ति उसके पास से गुजरता तब वह अपने मुंह का पानी उस पर थूक देती थी। यह देखकर पेरुंदच्चन के पुत्र ने एक दूसरी मूर्ति बनाकर पुल के दूसरे सिरे पर रख दी। यह मूर्ति पुल पर किसी व्यक्ति के चलने पर उसके आगे-आगे चल पड़ती थी और दूसरी मूर्ति के थूकने से पहले ही उसके मुंह पर एक तमाचा जड़ देती थी। इससे उसका मुंह फिर जाने से थूका हुआ पानी किसी पर नहीं गिर पाता था।

एक बार जब पेरुंदच्चन यात्रा पर थे तब एक जगह कुछ बढ़इयों को एक देवालय का निर्माण करते देखकर वहीं रुक गए। किसी ने भी पेरुंदच्चन का आदर नहीं किया, यहां तक कि किसी ने उनकी ओर देखा तक नहीं। जब भोजन का समय हुआ, तो पेरुंदच्चन को उनके साथ भोजन करने का निमंत्रण दिए बगैर ही वे चल दिए। तब पेरुंदच्चन ने गर्भगृह में रखे हुए लट्टों के दोनों सिरों पर एक-एक लकीर खींची और वहां से चले गए। खाना खाकर आकर बढ़इयों ने पुनः काम आरंभ कर दिया। पेरुंदच्चन ने जो लकीरें खींची थीं उन्हें प्रधान बढ़ई द्वारा बनाया गया निशान मानकर उन लट्टों को उसी निशान पर से काटकर रख दिया। बाद में जब गुंबद जोड़ा जाने लगा तो लकड़ी की लंबाई कम होने से उनके तमाम प्रयासों के बावजूद वह नहीं जुड़ पाया। प्रधान बढ़ई ने अपनी सारी विद्या खर्च डाली पर वे इसका समाधान नहीं कर पाए। अंत में हारकर उन्हें यही निश्चय करना पड़ा कि सारी लकड़ियों को बदलना पड़ेगा, और गुंबद के काम को फिलहाल रोकर कारीगरों को दूसरे कामों में लगा दिया गया।

यात्रा से लौटकर पेरुंदच्चन ने किसी से कहे बगैर लकड़ी के कुछ टुकड़े मापकर काट लिए और उन्हें लेकर वे निर्माणाधीन मंदिर की ओर चल पड़े। उन्हें जाते देखकर उनके पुत्र ने पूछा, "कहां चल दिए?" लेकिन पेरुंदच्चन ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। तब उनका पुत्र भी उनके पीछे-पीछे हो लिया। दुपहर होने पर पेरुंदच्चन मंदिर पहुंच गए।

तब तक सब बढ़ई खाना खाने के लिए जा चुके थे। पेरुंदच्चन ने समझ लिया कि वहां कोई नहीं है और सीधे गर्भगृह की ओर बढ़े। अपने साथ लाई गई लकड़ी के टुकड़ों को वहां पड़े लट्टों के साथ जोड़कर उनसे मंदिर का गुंबद जोड़ने लगे। इस बार सभी लकड़ियां सही प्रकार से बैठ गईं और गुंबद आसानी से बन गया। उसी समय उनका पुत्र भी वहां आ पहुंचा। उसे देखकर पेरुंदच्चन ने कहा, "देखा बेटे, गुंबद कैसे बन गया?" पुत्र को सारा माजरा समझ में आ गया था और उसने कहा, "हां, हां, देख रहा हूं, और कुछ सीख भी रहा हूं।"

अपने पुत्र के इन व्यंग्योक्तियों से और पहले वर्णित अनेक प्रसंगों से पेरुंदच्चन को समझ में आया कि उनका बेटा असाधारण रूप से प्रतिभासंपन्न है। यद्यपि वह उनका प्रथम पुत्र था तो भी उन्हें उससे असह्य ईर्ष्या एवं वैर हो चला। उन्होंने निश्चय किया, यदि यह जीवित रहा तो मेरे यश को हानि होगी, इसलिए इसका काम जल्दी-से-जल्दी तमाम करना होगा।

गुंबद के जोड़े जाने की आवाजें सुनकर जब मंदिर बनानेवाले कारीगर दौड़कर आए तो उन्होंने गुंबद को ठीक प्रकार से जुड़ा पाया। उन्होंने यह भी देखा कि यह पेरुंदच्चन के कौशल से संभव हुआ है। तब उन्होंने पेरुंदच्चन का खूब सम्मान किया और उस दिन से उन्हें तथा उनके बेटे को भी प्रधान कारीगर के रूप में मंदिर-निर्माण के कार्यदल में शामिल कर लिया। उस समय से बढ़इयों ने यह भी नियम बना लिया कि काम करते समय यदि कोई दूसरा कारीगर उस स्थल पर आए तो उसे खिलाए बगैर हम खाना नहीं खाएंगे।

एक दिन पेरुंदच्चन उस मंदिर के ऊपरी भागों पर काम कर रहे थे। वहां से उन्होंने सिर झुकाए उनके नीचे काम कर रहे अपने बेटे की गरदन पर एक बड़ी छेनी इस तरह से गिरा दी कि जैसे वह उनके हाथ से फिसलकर गिरी हो। छेनी के आघात से उस लड़के की गरदन दो टुकड़ों में कट गई और वह वहीं मर गया। सुना है कि ये घटनाएं तिरुवेल्लायी नामक स्थल पर घटी थीं।

पेरुंदच्चन ने अपने प्रदेश के नंबूरियों की आवश्यकतानुसार एक मंदिर भी बनाया था। उसकी सीढ़ियां चढ़कर गर्भगृह की ओर जाने पर जगह-जगह पर आपको ऐसा लगेगा कि छत से सिर अभी टकराएगा, अभी टकराएगा। निस्संकोच भाव से चलते रहे तो सिर नहीं टकराएगा, लेकिन सिर बचाने की चेष्टा करेंगे तो सिर अवश्य टकराएगा। यह भी एक कौशल है। इस मंदिर में जो मूर्ति प्रतिष्ठित की गई है, उसे भी पेरुंदच्चन ने ही बनाया है। नंबूदिरियों ने पेरुंदच्चन से कहा था कि प्रतिष्ठित करने के लिए एक मूर्ति बनाकर दें। पेरुंदच्चन इसके लिए राजी हो गए। लेकिन नंबूरियों ने उन्हें यह नहीं बताया कि मूर्ति किसकी हो, पेरुंदच्चन ने भी उनसे नहीं पूछा। जब सब चले गए तब जाकर पेरुंदच्चन ने इस पर विचार किया। उन्होंने सोचा कि लेटते समय नंबूदिरी लोग अवश्य अपने इष्टदेव का स्मरण करेंगे, उन्हें ऐसा करते सुनकर जाना जा सकता है कि मूर्ति किसकी बनानी चाहिए। वे उनके शयनकक्ष के आस-पास कई दिनों तक मंडराते रहे। ये सब नंबूदिरी लेटने से पहले "इविडेकिडन्नो" (यहां लेटिए) यह कहकर ही सोते थे और किसी देवता का नाम नहीं लेते थे। अंत में पेरुंदच्च्न ने "एन्नालिविडेक्किडा" (तब यहीं लेट जाओ ही सही) नाम की एक मूर्ति बनाकर रख दी। इस प्रकार की एक आकृति आज भी इस मंदिर में मौजूद है। यह मूर्ति किस देवी या देवता की है, यह कोई नहीं जानता।

एक दिन सुबह-सुबह पेरुंदच्चन अपने भाई अग्निहोत्री से मिलने उनके घर गए। पेरुंदच्चन व अन्य भाई-बहन जब अग्निहोत्री के घर जाते तो अपने पिता के श्राद्ध का अवसर न होने पर द्वार पर ही खड़े रहते थे, भीतर प्रवेश नहीं करते थे। इसलिए उस दिन भी पेरुंदच्च्न ने बाहर ही खड़े होकर पूछा कि अग्नहोत्री क्या कर रहे हैं। तब सेवकों ने बताया कि वे सहस्रावृत्ति पूजा कर रहे हैं। तुरंत पेरुंदच्चन ने वहीं एक छोटा गड्ढा खोदा। इसके बाद सेवकों से उन्होंने फिर पूछा कि अब उनके मालिक क्या कर रहे हैं? उन्होंने बताया कि वे सूर्यनमस्कार कर रहे हैं। पेरुंदच्च्न ने एक और गड्ढा खोदा। एक बार फिर पूछने पर पता चला कि अग्निहोत्री गणपति होम कर रहे हैं। पेरुंदच्चन ने एक और गड्ढा खोदा। इस प्रकार जब-जब पेरुंदच्चन ने पूछा अग्नहोत्री विष्णु, शिव, शालिग्राम, वैश्वम आदि में से किसी की पूजा कर रहे होते थे। हर एक के लिए पुरुंदच्चन ने एक गड्ढा खोदा। लगभग दोपहर होने पर अग्निहोत्री बाहर आए। पेरुंदच्चन ने उनसे पूछा, "देवाराधना सब समाप्त हो गई?"

अग्निहोत्रीः- हां, लगभग समाप्त हो गई। पेरुंदच्चन के आए काफी समय हो गया लगता है, बैठे-बैठे ऊब गए होंगे।

पेरुंदच्चनः- बिलकुल नहीं। यहां मैं भी बहुत व्यस्त था। यहां मैंने बहुत से गड्ढे खोदे, लेकिन एक में भी पानी नहीं आया। इतने सारे गड्ढे खोदने के बजाए एक ही गड्ढे को बहुत गहराई तक खोदता तो शायद अब तक पानी मिल जाता।

यह सुनकर अग्निहोत्री समझ गए कि पेरुंदच्चन उन पर आक्षेप कर रहे हैं और उनके कहने का सार यह है कि अनेक देवताओं की थोड़ी-थोड़ी आराधना से केवल एक देवता की गहनता से आराधना करना बेहतर है और इससे फलप्राप्ति हो सकती है। यह आक्षेप उनके विभिन्न देवों की आराधना करने से संबंधित है, यह भी अग्निहोत्री को स्पष्ट हो गया। तब उन्होंने कहा, "अनेक गड्ढों को भी रोज थोड़ा-थोड़ा खोदें, तो उन सबमें पानी आ सकता है। उन सबका स्रोता तो एक ही होता है।

पेरुंदच्चनः- स्रोता उन सबका एक ही है, यह न भूला जाए तो सब ठीक है। फिर चाहे जितने गड्ढे खोदे जाएं, सब में पानी आएगा।

इस प्रकार अंत में पेरुंदच्चन ने स्वीकार किया कि अग्निहोत्री की युक्ति ठीक है और फिर जिस काम से आए थे उसकी चर्चा करने लगे।

2 Comments:

P.N. Subramanian said...

पेरुंदच्चन की कथा रोचक रही

Mired Mirage said...

बहुत ही रोचक कथा है। अपने ही देश की इन कथाओं से हम वंचित थे। आपके प्रयास से हमें भी पता चल रही हैं। धन्यवाद।
घुघूती बासूती

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