24 मई, 2009

12. कोल्लेत्ताट्टिल गुरुक्कल -3

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

जब तिरुवितांकूर के महाराजा तिरुवनंतपुरम को अपनी स्थायी राजधानी बनाकर वहां रहने लगे, तब गुरुक्कल को भी उन्होंने वहीं बुला लिया। वहां उसे जमीन-जायदाद तो दी ही, एक स्थायी मठ भी बनवाकर दिया।

इस प्रकार अनेक प्रकार की संपत्तियां जुटाने तथा राजसान्निध्य में रहने से अनेकानेक सुविधाएं प्राप्त करने के बाद गुरुक्कल ने अपना परिवार कोलत्तु देश से तिरुवनंतपुरम बुला लिया। तिरुवल्लय में, जहां उसके बहुत से स्वजन रहते थे, उसने एक बड़ा भवन बनवाया और कुटुंब सहित वहीं स्थायी रूप से रहने लगा। आज तक कोल्लंताट्टिल गुरुक्कल के घराने की आर्थिक स्थिति में जरा भी कमी नहीं आई है। इस घराने के सदस्य सब अच्छे-खासे धनवान हैं। उन्हें तिरुवनंतपुरम के दरबार में जो स्थान-मान पहले प्राप्त थे, वह आज भी यथावत कायम है। आज भी महाराजा विद्यारंभ के लिए पूजा के मंडप में प्रवेश करते समय गुरुक्कल को गुरुदक्षिणा देते हैं। तिरुवितांकूर के महाराजाओं को अब शस्त्राभ्यास की आवश्यकता नहीं रह गई है और वे शस्त्राभ्यास करते भी नहीं हैं। गुरुक्कल के परिवार में जो लोग अब रह गए हैं, उन्हें भी यह विद्या नहीं आती। फिर भी कलरी (आयुधविद्या सीखने का अखाड़ा) में कोल्लंताट्टिल गुरुक्कल परिवार के ही किसी पुरुष को आचार्य का स्थान प्राप्त होता है।

आद्य गुरुक्कल के शिष्यों की सामर्थ्य को दर्शाने वाली अनेक कथाएं हैं। लेकिन इन सबको यहां देने से विस्तार बहुत बढ़ जाएगा। इसलिए बानगी के तौर पर केवल एक कथा सुनाता हूं।

कोल्लम वर्ष ९६७ की बात है जब महाराजा रामवर्मा, जिनका कोल्लम वर्ष ९७३ में स्वर्गवास हुआ, वृद्धावस्था में पहुंच चुके थे। इस वर्ष आयोजित मुरजपम में (एक व्ययसाध्य यज्ञकर्म जो तिरुविदांकूर में हर छह साल बाद आयोजित किया जाता था और जिसमें ४१ अथवा ५६ दिनों तक व्रत रखकर पानी में खड़े होकर वेदमंत्रों का जप किया जाता था) भाग लेने के लिए आए असंख्य ब्राह्मणों में से कुछ शस्त्रविद्या के विशारद भी थे। चूंकि महाराजा स्वयं इस विद्या के जानेमाने विशेषज्ञ थे, इसलिए वे योद्धा-ब्राह्मणों को अपने पास बुलाकर उन्हें कुछ न कुछ उपहार दिया करते थे। आद्य गुरुक्कल का समय इससे काफी पहले था, यह तो स्पष्ट ही है।

पूजा के दौरान एक दिन मुंड्यूर नामक एक योद्धा-ब्राह्मण केवल लंगोटी पहने शरीर पर तेल मलकर स्नान करने के इरादे से पद्मतीर्थ के किनारे खड़ा था। तब एक वृद्ध असामी नायर सिर पर घी का घड़ा लिए पास से गुजरा। उस नायर की बगल में एक सुंदर छड़ी दबी हुई देखकर ब्राह्मण ने कहा, 'ऐ, वह छड़ी मुझे देगा?" नायर ने कहा, "मालिक तो जवान हैं, छड़ी मुझ जैसे बूढ़ों के ही काम की है।" "तू अपने लिए दूसरी बना ले" ब्राह्मण ने कहा। नायर ने जवाब दिया, "यह तो मालिक भी कर सकते हैं।" तब ब्राह्मण ने कहा, "नहीं देगा तो छीन लूंगा।" तुरंत नायर ने जवाब दिया, "तो वैसा ही करें," और चल पड़ा। ब्राह्मण ने नायर के पीछे जाकर उसकी बगल में दबी छड़ी के सिरे को एक हाथ से पकड़ कर खींचा। जब एक हाथ से खींचने से काम नहीं बना तो ब्राह्मण ने दोनों हाथों से खींचा। लेकिन छड़ी तब भी हाथ नहीं आई। इतना ही नहीं छड़ी अपनी जगह से तिल भर भी नहीं हिली, न ही नायर की चाल जरा सी भी धीमी हुई। जब नायर ने देखा कि अब भी ब्राह्मण छड़ी नहीं छोड़ रहा है, तो उसने शरीर को दाईं ओर थोड़ा घुमाकर पूजा के मंडप की ओर कदम बढाए। तब न जाने किस कारण से ब्राह्मण को छड़ी पर से अपनी पकड़ छोड़ना असंभव प्रतीत होने लगा और तेल लगे नंगे बदन सहित, चिलचिलाती धूप सहते हुए वह भी छड़ी का सिरा पकड़े-पकड़े नायर के पीछे-पीछे घिसटने लगा। मंडप पर पहुंचकर नायर ने घी का घड़ा उतारकर रखा और खड़ा हो गया। ब्राह्मण भी छड़ी को पकड़े हुए वहीं रुक गया। जब तक नायर घी को मापकर अधिकारियों के हवाले करके उसकी रसीद बनवाकर अपने काम से निवृत्त हुआ, तब तक यह सब समाचार किसी प्रकार से महाराजा रामवर्मा तक पहुंच गया और उन्होंने नायर को अपने पास बुलवाया। छड़ी को छोड़ न सकने के कारण ब्राह्मण भी नायर के साथ गया। जब वे दोनों महाराजा के सामने पहुंचे तो महाराजा ने जरा हंसकर कहा, "अरे मुंड्यूर, यह तुम्हें क्या हो गया है?" यह सुनकर उस ब्राह्मण को बहुत अधिक लज्जा हुई। शस्त्राअभ्यासी नवयुवक होते हुए भी उसे एक वृद्ध नायर के पीछे इस प्रकार दीनतापूर्वक नंगधडंग अवस्था में महाराजा के सामने आना पड़ा, यह सोचकर वह अत्यंत व्यथित हुआ और असह्य लज्जा के कारण सिसक-सिसकर रोने लगा। तब महाराजा ने कहा, "इस साधु ब्राह्मण को मुक्त कर दो।" तुरंत नायर ने कहा, "आपका गुलाम हूं।" और अपने शरीर को बाईं ओर थोड़ा मोड़ा। इससे छड़ी पर ब्राह्मण की पकड़ स्वयं ही ढीली हो गई। नायर ने कहा, "अब मालिक जाकर जल्दी खाना खा आएं!" ब्राह्मण चला भी गया।

नायर ने ब्राह्मण पर कुश्ती का जो दांव चला था, उसके बारे में महाराजा जानते थे। लेकिन वह दांव साधारण मल्लों को ज्ञात न होने से वे समझ गए कि यह नायर कोई असामान्य व्यक्ति है। असल में उसे देखते ही उन्हें यह शंका हुई भी कि मैंने इसे कहीं पहले देखा है। इसलिए उन्होंने नायर से पूछा, "तुम कहां के रहनेवाले हो? कौन हो?" तब नायर ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक कहाः-"यह गुलाम कायमकुलम का रहनेवाला एक शूद्र है और महाराजा के असामियों में से एक है। मुरजपम के लिए घी अर्पित करने के लिए यह यहां आया है। यदि महाराजा थोड़ा श्रम करेंगे तो उन्हें याद आएगा कि इस गुलाम से उनकी पहले भी एक बार भेंट हुई है।" यह सुनकर महाराजा की स्मृति साफ हो गई और उन्हें स्पष्ट-स्पष्ट याद आया कि उसे पहले कहां देखा था। लेकिन नायर के मुंह से ही सारी बात कहलवाने के इरादे से उन्होंने कहा, "याद आने योग्य प्रसंग क्या है?" तब नायर ने कहा, "जब महाराजा कायमकुलम को जीतने के लिए सेना सहित आए थे तब राजमहल की दीवार के ऊपर से महाराजा ने अपना घोड़ा कुदाया था। तब घोड़े को तलवार की चोट लगने से वह महल के बाहर ही गिरा और महाराजा महल के अंदर कूद पड़े। यह महाराजा को याद होगा। उस दिन घोड़े का पैर छिपकर काटनेवाला आदमी यह गुलाम ही था। इस गुलाम को महाराजा ने उस समय अवश्य देखा होगा।" महाराजा ने कहा, "ठीक कहा, मुझे याद है। तुम्हें पहली बार देखकर ही मैं यह सब समझ गया था। फिर भी यों ही पूछा। तुम कायमकुलम के राजा के सैनिक थे, क्यों?" नायर, "आपका गुलाम हूं।" तब महाराजा ने पूछा, "तब तुम घी का घड़ा यहां किसलिए लाए?" "उन दिनों इस गुलाम के पालनकर्ता वे थे, आज ये हैं।" यों कहकर नायर ने विनयपूर्वक महाराजा की ओर हाथ बढ़ाकर इशारा किया। प्रसन्न होकर महाराजा ने कहा, "यह तुमने ठीक कहा। जिस समय जिसका नमक खा रहे हों, उसी की सेवा करना पुरषों का धर्म है। ऐसा ही होना भी चाहिए।" फिर महाराजा ने शस्त्रविद्या आदि के संबंध में उस नायर के साथ काफी देर तक बातें कीं। तब उन्हें मालूम हुआ कि यह नायर भी आद्य गुरुक्कल का ही शिष्य है और उन्हें उसके प्रति विशेष ममता हुई। अपने गुरु के अन्य शिष्यों के प्रति सभी को विशेष लगाव होता ही है। दुपहर के बाद दुबारा आने को कहकर महाराजा ने नायर को जाने की अनुमति दे दी।

दुपहर के बाद सभी शस्त्राअभ्यासी ब्राह्मण महाराजा के सामने एकत्र हुए। इनमें वह मुंड्यूर नामक ब्राह्मण भी था। कायमकुलम का वह नायर भी आ पहुंचा। तब वहां पड़े हुए एक अंडाकार लौह पिंड को दिखाकर महाराजा ने कहा, "आपमें से कोई इसे उठा सकता है?" यह सुनकर सभी अभ्यासी एक-एक करके आए और उसे उठाने की कोशिश करने लगे। लेकिन उनमें से कोई भी उसे हिला तक नहीं सका। अंत में मुंड्यूर ने बड़ी मुश्किल से उसे घुटने तक उठाया। इसके बाद नायर ने उसे कमर की ऊंचाई तक उठाया। इसके बाद उसे उठानेवाला कोई नहीं था। अंत में महाराजा ने कहा, "बुढ़ापे के कारण अब मैं क्षीण हो गया हूं, फिर भी कोशिश करके देखता हूं।" और उन्होंने उस पिंड को गले तक उठाकर दिखाया। उसे नीचे रखकर वे बोले, "जवानी में जब मैं रोज अभ्यास करता था तब इसे एक हजार बार सिर के ऊपर तक उठाकर फेंकता था। अब मैं अशक्त हो चला हूं।" वहां एकत्र हुए सभी नौजवान यह देखकर अत्यंत लज्जित हुए कि जिस लौह पिंड को वे हिला तक नहीं सके, उसे वृद्ध एवं कमजोर महाराजा ने अनायास ही उठा लिया।

कायमकुलम के नायर को महाराजा ने अनेक पुरस्कार तो दिए ही, उन्होंने यह घोषणा भी की कि सरकार से जो जमीन उसे मिली है, उसके बदले में उसे नकद या जिंस के रूप में सरकार को कुछ भी चुकाना नहीं होगा। नायर के लिए उन्होंने एक छोटी मासिक पेंशन भी बांध दी।

(... जारी)

1 Comment:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

कभी कभी अतिरंजना लगती है।

लेकिन शायद कभी ऐसा हुआ हो। अब तो शारीरिक शक्तियों की इतनी आवश्‍यकता नहीं है सो इतना अभ्‍यास नहीं होता होगा।

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