26 मई, 2009

13. कोलत्तिरी और सामूतिरी

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

बहुत समय पहले एक बार कोलस्वरूपत्तिंगल राजा कोषिक्कोड़ के सामूतिरी राजा से मिलने आए। उन दिनों दोनों राजा अपने-अपने राज्यों के अधिपति थे। मुलाकात होने पर वे परस्पर अत्यंत स्नेह का प्रदर्शन करते थे और एक-दूसरे के यहां आते-जाते भी रहते थे, लेकिन दोनों के दिलों में एक-दूसरे के प्रति गहरी द्वेष-भावना भरी हुई थी। कोलस्वरूपत्तिंगल राजा के आने पर उनका ठीक प्रकार स्वागत-सत्कार नहीं किया तो लोकाचार की दृष्टि से यह निंदनीय समझा जाएगा, यह सोचकर सामूतिरी राजा ने अपने प्रतिद्वंद्वी का यथायोग्य स्वागत किया। भोजन आदि के बाद दोनों इधर-उधर की बातें करने लगे। तब कोलस्वरूपत्तिंगल राजा ने मजाक के लहजे में पूछा, "सामूरी सींग मारेगा?" सामूतिरी शब्द को संक्षिप्त करके सामूरी भी कहते हैं। सामूरी यानी एक प्रकार का सांड़। (मलयालम का "मूरी" शब्द का अर्थ होता है सांड़)। इसी दुहरे अर्थ को मन में रखकर कोलस्वरूपत्तिंगल राजा ने पूछा था। यह सुनकर सामूतिरी ने सवाल किया, "क्या कोलत्तिरी जलाएगी?" कोलस्वरूपत्तिंगल राजा को "कोलत्तिरी" भी कहा जाता था। (मलयालम के "तिरी" शब्द का अर्थ होता है बत्ती)। कोलस्वरूपत्तिंगल राजा ने उत्तर दिया, "कोलत्तिरी कभी-कभी जलाती भी है। इसलिए जरा संभलकर रहें।" तब सामूतिरी ने कहा, "कोलत्तिरी जलाएगी तो सामूरी भी सींग मारेगा।" इस प्रकार बातें करते हुए वे एक-दूसरे का मन बहलाते रहे। बाद में कोलस्वरूपत्तिंगल राजा प्रसन्नतापूर्वक अपने देश लौट गए।

इसके बाद बहुत समय पीछे कोलस्वरूपत्तिंगल राजा ने एक विशेष प्रकार की पेटी बनवाई और उसे बंद करके चाबी सहित नौकरों के साथ ससम्मान सामूतिरी राजा के पास भिजवाया। उस पेटी में बारूद भरी हुई थी और उसमें यह व्यवस्था थी कि जैसे ही कोई उसे चाबी लगाकर खोले, तुरंत बारूद उसके मुंह पर फटकर उसे पूरा जला डाले। आखिर सामूतिरी ने पूछा था न, "क्या कोलत्तिरी जलाएगी?" इसलिए एक बार जलाकर दिखाना चाहिए, यह सोचकर ही उन्होंने यह छल किया था। नौकरों ने चाबी सहित पेटी सामूतिरी राजा के पास पहुंचा दी और कहा कि यह कोलस्वरूपत्तिंगल राजा की तरफ से भेंट है। यह सुनकर सामूतिरी राजा ने सोचा कि इस समय कोलत्तिरी राजा की तरफ से भेंट आने का कोई खास कारण नहीं है। इसलिए जरूर यह कोई छल है। मैंने जब पूछा था कि "क्या कोलत्तिरी जलाएगी?" तो उन्होंने जवाब दिया था, "कभी-कभी जलाती भी है, इसलिए जरा संभलकर रहें।" इसलिए इस पेटी के अंदर कोई जलनेवाली चीज ही हो सकती है। अतः इसे पानी में रखकर खोलना ही उचित होगा, नहीं तो दुर्घटना की संभावना है। और उन्होंने एक भृत्य को बुलाकर पेटी को पानी में डुबोकर लाने को कहा। भृत्य उस पेटी को पानी में अच्छी तरह डुबो लाया। तब सामूतिरी ने सावधानीपूर्वक उसे खोला। पेटी के अंदर पानी घुस जाने के कारण बारूद सब गीली हो गई थी और वह जली नहीं और किसी प्रकार का हादसा नहीं हुआ। यह सब समाचार पेटी लानेवाले नौकरों ने लौटकर कोलत्तिरी राजा को सुनाया। अपनी चाल निष्फल गई जानकर कोलत्तिरी राजा को बहुत कुंठा हुई।

फिर कुछ समय बाद सामूतिरी राजा ने भी एक पेटी बनवाई और कुछ नौकरों के हाथ सम्मानपूर्वक कोलत्तिरी राजा के पास भिजवाई। जब यह पेटी कोलत्तिरी राजा के पास पहुंची तो वे सोचने लगे, मैंने जो छल किया था, उसके जवाब में यह भी छल ही होगा। मेरी भेजी हुई पेटी को सामूतिरी ने पानी में रखवाकर खोला था। उसी तरह मैं भी इस पेटी को पानी में रखवाकर खोलूंगा। तब कोई विपत्ति नहीं आएगी। यह सोचकर उन्होंने पेटी को पानी में रखवाकर खोला। उसमें पूरा मधुमक्खियों का छत्ता भरा हुआ था। पेटी खुलने पर पानी में भींगने से क्रुद्ध हुई मधुमक्खियां सब एक साथ उड़ीं और कोलत्तिरी राजा को चोरों तरफ से घेरकर डंक मारने लगीं। कोलत्तिरी राजा द्वारा पूछने पर सामूतिरी ने यही कहा था न कि यदि कोलत्तिरी जलाएगी, तो सामूरी भी सींग मारेगा। इन मधुमक्खियों के काटने से कोलत्तिरी राजा की ऐसी दुर्गति हुई जैसी पहले कभी नहीं हुई थी। बहुत सारे लोगों ने मिलकर किसी प्रकार मधुमक्खियों को भगाया, तब कहीं जाकर राजा के प्राण बच सके।

(समाप्त।)

3 Comments:

P.N. Subramanian said...

सुन्दर वृत्तान्त. क्या कोलाथिरी और सामुदिरी ब्राह्मण थे

बालसुब्रमण्यम said...

सुब्रमण्यन जी: कोलत्तिरि और सामूतिरी क्रमशः चिरक्कल-कासरगोड और कोषिक्कोड के राजा थे। ये ब्राह्मण नहीं थे।

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

रोचक । जारी रखिएगा।

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