11 मई, 2009

7. तलक्कुलत्तूर भट्टतिरी और पाषूर की कुटियां - 6

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

ये सारी घटनाएं मूवाट्टुप्पुषा तालुके के पिरवत्तु पुलिमट्टम के नंबूरी के घराने में हुईं, ऐसा मैंने सुना है।

गृहस्थ नंबूरी के घर से निकलकर जब दोनों चले तो रास्ते में कणियन ने कहा, "आज हमें खीर खाने को मिलेगी।" तुरंत ही भट्टतिरी ने कहा, "हां, लेकिन वह जली हुई होगी।" भट्टतिरी के कहे अनुसार ही एक नंबूदिरी ने उन्हें खीर खाने को दी लेकिन वह जली हुई थी। तब कणियन ने कहा, "यह आज मुझे क्या हो गया है। आज मेरे सभी वचन गलत सिद्ध हो रहे हैं। शास्त्रानुसार लक्षण देखकर ही मैं कह रहा हूं, फिर भी मेरा कथन झूठा निकल रहा है।" तब भट्टतिरी ने कहा, "लक्षण बताने के लिए शास्त्रों का पारायण ही काफी नहीं है। एक-एक लक्षण के बारे में सूक्ष्मता से तथा सर्वांगीण रूप से विचारकर उसके सार को आत्मसात करके बुद्धिपूर्वक बोले गए वचन ही सही निकलते हैं।" तत्पश्चात उन्होंने प्रत्येक घटना का विस्तारपूर्वक विश्लेषण करके कणियन को समझाया। "जब नंबूदिरी ने तुमसे आकर कहा कि उसकी घरवाली गर्भवती है, तो उस समय के लक्षणों को देखकर तुम्हारा यह कहना सही था कि गर्भस्थ शिशु स्त्री है। लेकिन केवल इस लक्षण के आधार पर और बाद की घटनाओं को नजरंदाज करके जो दुबारा तुमने यह कहा कि नंबूदिरी की घरवाली स्त्री शिशु को जन्म देगी, वह गलत था। गाय के गर्भ में बछड़े की पूंछ मुड़कर उसके माथे पर आ जाने से ही तुम्हें लगा कि उसके माथे पर तिलक है। सोचने की क्षमता एवं युक्ति की कमजोरी से ही तुमसे ये गलतियां हो गईं।" यह सुनकर कणियन ने पूछा, "आपको यह कैसे विदित हुआ कि खीर जली हुई होगी?" तब भट्टतिरी ने उससे पूछा, "तुम्हें यह कैसे मालूम हुआ कि आज हमें खीर मिलने वाली है?" कणियन ने उत्तर दिया, "जब हम जा रहे थे, तब दाईं ओर मुझे कपोतों का एक मैथुनरत जोड़ा वृक्ष की एक दूध चुआती डाली पर बैठता हुआ दिखाई दिया था। इसी लक्षण से मैंने समझ लिया कि हमें खीर मिलने वाली है।" तब भट्टतिरी ने कहा, "वह डाली सूखी हुई थी, इसीसे मैंने अनुमान लगाया कि खीर जली हुई होगी। इस प्रकार हर लक्षण की बारीकियों को परखकर ही भविष्यवाणी करनी चाहिए।" कणियन इन सब बातों से संपूर्ण रूप से सहमत हो गया और उसके बाद बड़ी सूक्ष्मता के साथ देख-परखकर ही भविष्य भाखने लगा और उसके सभी वचन सच निकलने लगे।

इसके बाद मृत्युपर्यंत भट्टतिरी उसी कणियन की कुटिया में रहे और अपने पुत्र को ज्योतिष-शास्त्र के संबंध में अनेक गूढ़ बातें समझाते रहे। अपने जीवनकाल में ही भट्टतिरी ने कह दिया था कि उनके मरने पर शव को इसी कुटिया में स्थापित किया जाए, इससे इस कुटिया में बैठकर प्रश्न विचारने से अत्यंत सूक्ष्म परिणाम निकलेंगे। इसलिए भट्टतिरी के मरने पर उनके शव को इसी कुटिया में स्थापित किया गया। कणियन ने यह भी नियम बना लिया कि इस कुटिया के सिवा और कहीं बैठकर प्रश्न नहीं विचारूंगा। इसी कारण से पाषूर की यह कुटिया प्रश्न विचारने के लिए इतनी विशिष्ट और प्रसिद्ध है। इस कुटिया के अलावा भी वहां कुछ अन्य कुटियां हैं। उनके माहात्म्य का कारण अलग है। उनके संबंध में भी बता देता हूं।

पाषूर कणियन के यहां तीन कुटियां हैं। इनमें से एक कणियान के निवास-गृह के उत्तर में नदी किनारे है। इसी कुटिया में भट्टतिरी और कणियन-स्त्री ने सहवास किया था। इस अद्भुत घटना के स्मरण में इसे अभी भी सुरक्षित रखा गया है। अन्यथा इसका कोई महत्व नहीं है और इसका किसी भी कार्य के लिए उपयोग नहीं होता है। बाकी दो कुटियां निवास-गृह के पूर्व एवं पश्चिम दिशा में स्थित हैं। इनमें पश्चिम वाली कुटिया में भट्टतिरी की मृतदेह को स्थापित किया गया है। इसी कुटिया में बैठकर कणियन जाति के लोग आज भी प्रश्न विचारते हैं और राशिफल की गणना करते हैं। पूर्वी दिशा वाली कुटिया भी कुछ कम महत्व की नहीं है। इसमें बैठकर भी ज्योतिषशास्त्र संबंधी कार्य किया जाता है। अब इसी कुटिया के माहात्म्य के संबंध में मैं यहां बताने जा रहा हूं।

भट्टतिरी के अनुग्रह और माहात्म्य के कारण और शास्त्रज्ञान के कारण पाषूर का यह कणियन कुछ ही समय में अत्यधिक प्रसिद्ध हो गया। तब उसे छकाने के इरादे से बुध और शुक्र ग्रह ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके पास आए। ये जिस कुटिया में जाकर बैठे, वह पूर्वी छोर वाली कुटिया ही थी। जब कणियन ने सुना कि उससे मिलने दो ब्राह्मण पधारे हैं, तो उस कुटिया में जाकर उसने उन्हें आदरपूर्वक नमस्कार किया और उनसे पूछा कि आपके आगमन का कारण क्या है। तब उन दोनों ब्राह्मणों ने कहा, "इस समय बुध और शुक्र की स्थिति किस राशि में है, यह जानने के लिए ही हम यहां आए हैं।" यह सुनकर कणियन ने तुरंत पंचांग निकाला और उसमें देखकर कह दिया कि बुध और शुक्र इस-इस राशि में हैं।

ब्राह्मणः- यह पर्याप्त नहीं है। ग्रहफल देखने का हमें भी कुछ अनुभव है। हमारी गणना से हमें लगता है कि आपका कथन ठीक नहीं है। इसलिए जरा गणना करके बताएं।

कणियनः- गणना करने की आवश्यकता नहीं है। इस पंचांग को इस दास ने बहुत सूक्ष्मता से गणना करके तैयार किया है।

ब्राह्मणः- हमें नहीं लगता कि यह पंचांग उतना सूक्ष्म है। कणियन जी जरा नए सिरे से विचारकर बताएं।

इस तरह जोर दिए जाने पर कणियन ने बुध और शुक्र की स्थिति की गणना करके देखी। तब उसे विदित हुआ कि पंचांग में दी गई स्थिति से वह भिन्न है। तुरंत ब्राह्मणों ने कहा, "पंचांग गलत है यह हमने पहले ही कहा था। अब विश्वास हुआ न? खैर, इन दोनों ग्रहों की जो स्थिति आपने अभी बताई, वह भी सही नहीं है। जरा फिर से गणना करें।"

कणियन फिर से गणना करने लगा। तब दोनों ब्राह्मण अपनी पहली वाली जगह से उठकर दूसरी जगह जाकर बैठ गए। दुबारा गणना करने पर कणियन ने पाया कि बुध-शुक्र की स्थिति पहले से अब भिन्न है। इतना ही नहीं, पंचांग में दी गई स्थिति से भी वह मेल नहीं खाती। तब ब्राह्मणों ने कहा, "यह भी ठीक नहीं है। एक बार फिर गणना करें।"

इस प्रकार कणियन ने अनेक बार गणना करके देखा और चूंकि हर बार ब्राह्मण नए स्थान पर जाकर बैठते थे, इसलिए बुध-शुक्र की स्थिति भी अलग-अलग निकलती थी। जब अनेक बार ऐसा हुआ तो कणियन को समझ में आया कि ये दोनों कोई साधारण ब्राह्मण नहीं वरन स्वयं बुध-शुक्र हैं जो मेरी परीक्षा लेने यहां आए हैं। तब उसने कहा, "इस दास के पास एक प्राचीन ग्रंथ है। उसमें देखकर गणना करने पर गलती की संभावना ही नहीं रहेगी। यह ग्रंथ ज्योतिषशास्त्र का एक विशेष ग्रंथ है। मुझे अंदर जाकर उसे ले आकर उसकी सहायता से ग्रह-स्थिति निश्चित करनी होगी। मेरे आने तक आप कृपा करके यहीं बैठे रहें।" जब ब्राह्मण इसके लिए राजी हुए तो कणियन ने कहा, "आपका यों सहमत होना पर्याप्त नहीं है। बुध-शुक्र की स्थिति तय होने से पहले ही आप चले जाएं तो मेरी बड़ी बदनामी होगी। इसलिए कृपा करके प्रतिज्ञा करें कि मेरे लौटने तक आप इस कुटिया को छोड़कर नहीं जाएंगे।" दोनों ब्राह्मणों ने वैसी प्रतिज्ञा की। तब कणियन ने अंदर जाकर आत्महत्या कर ली। कणियन के लौटने से पहले कुटिया न छोड़ने की प्रतिज्ञा के कारण बुध-शुक्र उसी कुटिया में विलीन हो गए। इसीलिए लोगों में विश्वास है कि इस कुटिया में आज भी बुध-शुक्र का सान्निध्य है और इसी विश्वास पर इस कुटिया का माहात्म्य टिका हुआ है।

(समाप्त)

5 Comments:

Udan Tashtari said...

सब कुछ आस्था का प्रश्न है.

योगेन्द्र मौदगिल said...

सटीक एवं सार्थक पोस्ट

गिरिजेश राव said...

भइ आप तो पूरे किस्सागो निकले. आनन्द आ गया पूरी श्रृंखला को पढ़ कर.

मेरे नाना ऐसी कहानियाँ सुनाया करते थे. आप ने उन की स्मृति ताजी कर दी. धन्यवाद्

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

दक्षिण भारतीय सोच उत्‍तर से कई मायनों में अलग है। वहां बहुत देर तक विषय के लिए व्‍यक्ति की आहुति का क्रम बना रहा।

बहुत अच्‍छी कथा। मैंने सभी टुकड़ एक साथ पढ़े। अलग अलग पढ़ता तो शायद इतना धैर्य नहीं रख पाता कि एक के बाद दूसरे के प्रकाशित होने का इंतजार करूं।


अच्‍छी कथा के लिए आभार। यह सिलसिला बनाए रखें तो कृपा होगी।

बालसुब्रमण्यम said...

सिद्धार्थ जी: मैं सहमत हूं कि इन कथाओं को एक ही सांस में पढ़ने पर ही असली मजा आता है। पर क्या करूं, ब्लोग फोर्मैट की अपनी सीमाएं हैं। बहुत लंबे-लंबे पोस्ट होने पर पाठकों का धीरज टूट जाता है। कई पाठकों ने शिकायत भी की है कि पोस्ट बहुत लंबे होते जा रहे हैं। इसीलिए इन कथाओं को टुकड़ों में देना पड़ रहा है।

कुछ कथाएं तो इतनी लंबी हैं और उनमें इतनी अंतरकर्थाएं हैं कि और कोई चारा भी नहीं है। उदाहरण के लिए परयी से जन्मा पंदिरम कुल को ही लीजिए, इसमें सात अंतर्कथाएं गुंथी हुई हैं।

केरल पुराण में आने के लिए आभार।

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