21 मई, 2009

11. पुलियांपिल्ली नंबूरी - 2

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

पुलियांपिल्ली नंबूरी अच्छे ओझा भी थे। झाड़-फूंक करने और भूत-प्रेत-पिशाच उतारने के लिए लोग उन्हें बहुत बार ले जाते थे। ऐसी कोई बाधा नहीं थी जिसे वे दूर न कर सकते हों। जब वे झाड़-फूंक करने या भूतादि उतारने चल पड़ते थे, तब देवी भी प्रत्यक्ष मूर्ति बनकर उनके पीछे-पीछे जाती थी। लेकिन इसे पुलियांपिल्ली नंबूरी के सिवा दूसरा कोई देख नहीं पाता था।

एक दिन पुलियांपिल्ली नंबूरी कहीं से झाड़-फूंक करके लौट रहे थे। आगे-आगे वे चल रहे थे और पीछे-पीछे देवी। काफी दूर जाने पर नंबूरी ने पीछे मुड़कर एक बार देखा तो देवी को कहीं न पाकर वे वहीं रुक गए और विचारने लगे कि वह कहां गई होगी। काफी देर रुकने पर भी देवी के न आने से नंबूरी को चिंता हुई। पता लगाने का निश्चय करके वे पीछे लौटे। कुछ दूर जाने पर उन्होंने देखा कि रास्ते में ही एक परयन अपनी कुटिया में जमीन पर तलवार गाढ़कर और एक ऊंचा आसन बनाकर देवी की पूजा कर रहा है और ढोल बजा-बजाकर कर्कश ध्वनी में देवी की स्तुति में कुछ स्त्रोत गा रहा है। देवी उसकी पूजा को स्वीकारते हुए उसी कुटिया में उस ऊंचे आसन पर बैठी थी। (परयन को देवी दिखाई नहीं दे रही थी।)। उस परयन की पूजा समाप्त होने तक नंबूरी सब कुछ देखते हुए रास्ते पर ही खड़े रहे। पूजा समाप्त होने पर देवी उठी और वहां से चलकर नंबूरी के पास पहुंची। तब नंबूरी ने उससे कहा, "देवी, आपका इस प्रकार परयन आदि नीच लोगों के यहां जाना अनुचित है। आपको उस नीच परयन की मंत्रहीन पूजा स्वीकारते हुए और उसके नैवेद्य खाते हुए देखकर मुझे तो बहुत बुरा लगा। अब आप कृपा करके ऐसी हरकतों से बाज आएं तो अच्छा।" यह सुनकर देवी हंसते हुए बोली, "तो तुमने मेरे स्वभाव को अब तक अच्छी तरह से नहीं समझा है, क्यों? तुममें मनःशुद्धि और भक्ति की अब भी कमी है। मुझमें भक्ति रखनेवाले सभी मेरे लिए समान हैं। चंडाल और ब्राह्मण का भेद मैं नहीं करती। भक्तिभाव से कोई भी पुकारे तो उसके पास गए बिना मैं नहीं रह सकती। मैं मंत्रतंत्रादि से भी अधिक भक्ति को महत्व देती हूं। इस तत्व को न समझनेवाले तुम्हारे साथ मैं नहीं आऊंगी। आज से तुम मुझे देख भी नहीं पाओगे। लेकिन पहले के ही समान तुम भक्तिभाव से मेरी उपासना करते रहोगे, तो मैं पूर्ववत तुम्हारी सहायता करूंगी।" यह कहकर वह ओझल हो गई। इसके बाद नंबूरी ने देवी को चर्मचक्षुओं से कभी नहीं देखा। देवी के अप्रत्यक्ष होने के बाद नंबूरी अधिक समय जीवित भी नहीं रहे।

केरल के अनेक भागों में अनेक जन आज भी कुलदेव के रूप में पुलियांपिल्ली नंबूरी की आराधना करते हैं। चौमासे में पुलियांपिल्ली नंबूरी को पानी पिलाने की मनौती मानने से सब कार्यों की सिद्धि हो सकती है, ऐसा कुछ लोगों का विश्वास है। संतानप्राप्ति, संपत्तिलाभ, रोग-बाधा से मुक्ति आदि के लिए कई स्थानों में लोग पुलियांपिल्ली नंबूरी को जल पिलाने की मनौती मानते हैं। चोरी में गई वस्तुओं का पता लगाने के लिए विशेषरूप से उनकी मनौती की जाती है। बहुतों का यह विश्वास है कि पुलियांपिल्ली नंबूरी को पानी पिलाने की मनौती करने से जिसका पता न चले ऐसी कोई वस्तु इस दुनिया में नहीं है। मनौती मानने के चालीस दिनों के अंदर चोर पैरों पर पड़कर माफी मांगेगा और चुराई हुई वस्तु लौटाकर नमस्कार करेगा। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो कुटुंब सहित वह खून की कै करते हुए मर जाएगा। कार्यसिद्धि के बाद यदि मनौती करनेवाला पुलियांपिल्ली नंबूरी को पानी पिलाने से चूक जाए, तो उसकी भी यही दशा होगी। पुलियांपिल्ली नंबूरी का स्वभाव कायंकुलम की दुधारी तलवार के समान है, जो दोनों तरफ से काटती है। बहुत दिनों पहले हो गुजरे इस व्यक्ति के प्रति लोगों में इतने व्यापक स्तर पर भय और भक्ति का होना यही सिद्ध करता है कि अपने समय में उन्होंने जरूर ही अनेक दिव्यतापूर्ण और अद्भुत चमत्कार किए होंगे।

मैंने सुना है कि इनका घराना कोषिक्कोड में था और आज से चार-पांच सौ वर्ष पूर्व इनका निधन हुआ था।

(समाप्त। कल ऐदीह्यमाला की एक और कहानी।)

1 Comment:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

सुंदर कथा के लिए धन्‍यवाद।


अगली कथा का इंतजार रहेगा। जारी रखिएगा।

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