28 मई, 2009

14. पांडंपरंपु की कोडनभरणी का अचार - 2

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

तब तक वह चीनी व्यापारी दूसरे एक जहाज में सामान चढ़ाकर भारत की ओर फिर चल पड़ा और केरल के तट पर पहुंचा। उसका दुबारा आगमन पहले के जहाज के दुर्घटनाग्रस्त होने के बारह वर्ष बाद हुआ था। तट पर उतरकर वह उस मकान को तलाशने लगा जहां उसने वे दस मर्तबान रखवाए थे। जब वह उस स्थल पर पहुंचा तो पहले के टूटे-फूटे मकान के स्थान पर एक विशाल प्रासाद देखकर दंग रह गया। उसके मन में तरह-तरह के संदेह उठने लगे। आस-पास के लोगों से पूछने पर उसे ज्ञात हुआ कि भट्टतिरी का घर यही है और यह प्रासाद उसने हाल ही में बनवाया है। खजाना उसके हाथ लगा था, जिससे उसकी गरीबी दूर हो गई और अब उसके पास अकूत संपत्ति है। यह सब सुनकर चीनी व्यापारी सोचने लगा, "खजाने-वजाने की बात सब कोरी कल्पना है, यह सब मेरे मर्तबानों में रखी अशरफियों से ही संभव हुआ है। ऐसी हालत में मेरी पूंजी वापस मिलने की संभावना शून्य लगती है। फिर भी भट्टतिरी से एक बार मिलकर पूछना चाहिए। उसे देना है तो दे, नहीं तो जाने दो।" यह सोचकर भट्टतिरी के महल के सामने खड़े होकर उसने ऊंचे स्वर में आवाज लगाई, "यहां का मालिक घर पर है?" उस समय भट्टतिरी महल के भीतर बैठा था। व्यापारी की आवाज तुरंत पहचानकर वह नीचे उतर आया। व्यापारी को सम्मानपूर्वक भीतर ले जाकर कुर्सी पर बैठाया और उससे कुशलक्षेम पूछी। फिर उसे तथा उसके साथ आए लोगों को उम्दा किस्म का भोजन कराके भट्टतिरी ने व्यापारी से कहा, "मैंने आपकी अनुमति के बिना आपके द्वारा मेरे यहां रखी गई पूंजी में से थोड़ी पूंजी निकालकर खर्च की थी। वैसा मुझे दारिद्र्य के क्लेशों के वशीभूत होकर ही करना पड़ा। फिर भी मैं स्वीकार करता हूं कि मेरा यह काम बिलकुल न्यायविरुद्ध है। मेरे इस अपराध को आप कृपा करके क्षमा करें। इस समय आपकी सारी पूंजी सूद समेत यहां तैयार रखी है।" इतना कहकर भट्टतिरी ने व्यापारी के दसों मर्तबान और उनके साथ दसों छोटे मर्तबान तहखाने से निकलवाकर व्यापारी के सामने रखवा दिए। तब व्यापारी ने कहा, "मैंने यहां केवल दस मर्तबान रखे थे। छोटे मर्तबान मेरे नहीं हैं। इन्हें भी आपने यहां क्यों रखवाया है?

भट्टतिरी- आपके यह पूंजी मेरे हवाले किए बारह बरस हो गए हैं। इसलिए मूल पूंजी का आधा सूद के रूप में बनता है।

व्यापारी- सुरक्षित रखने के लिए मैंने जो वस्तु आपको दी थी, उसकी रक्षा करने के एवज में मुझे ही आपको कुछ देना चाहिए। उसके बदले आपसे कुछ लेना बिलकुल अनुचित होगा। इसलिए सूद की रकम मैं नहीं ले सकता।

भट्टतिरी- आज मुझे हर साल सब खर्चे के बाद दस हजार रुपयों से ज्यादा की बचत होती है। यह सब तथा यह आलीशान भवन और मेरा सर्वस्व ही आपकी पूंजी से ही मुझे मिला है। आपकी अनुमति के बिना आपकी चीज पर हाथ डालने के अपराध के प्रायश्चित्त के रूप में ही सही, आपको ये छोटे मर्तबान अर्पित करना मेरा फर्ज बनता है। इन्हें कृपा करके स्वीकार कर लें। नहीं तो मुझे बहुत बुरा लगेगा।

व्यापारी- मैंने जो दस मर्तबान यहां रखे थे, वे सब सही-सलामत यहां मौजूद हैं। इसलिए मुझे किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं हुआ है। आपने जो संपत्ति कमाई है, वह सब आपके उत्साह, सामर्थ्य और देवानुग्रह का फल है। इसलिए उस पर मेरा कोई हक नहीं बनता। यदि मैं उसमें से एक पैसा भर भी लूं तो दैवकोप से मेरा सर्वनाश हो जाएगा।

इस प्रकार उन दोनों में बहस होती रही। अंत में भट्टतिरी को छोटे मर्तबान वापस लेने पड़े और उसने उन्हें अंदर तहखाने में रखवा दिया। इसके बाद दोनों बैठकर पान खाया फिर चीनी व्यापारी ने अपने दस मर्तबानों में से एक मर्तबान भट्टतिरी को दे दिया। इसे लेने में भी भट्टतिरी ने बहुत आनाकानी की, लेकिन जब व्यापारी ने प्रेमपूर्वक उसे बाध्य किया तो उसे वह भेंट स्वीकार करनी पड़ी। यही वह 'कोडन भरणी' है। उसका मुंह थोड़ा टेढ़ा होने के ही कारण उसे कोडन भरणी कहते हैं। (मलयालम में 'कोडन' का अर्थ होता है खोट वाला)।

जब भट्टतिरी ने वह मर्तबान स्वीकार कर लिया, तब व्यापारी ने कहा, "हे महाब्राह्मण! इस मर्तबान में थोड़ा खोट होते हुए भी यह अत्यंत ऐश्वर्यपूर्ण और विशेष गुणों से संपन्न है। यह जहां रहता है, वहां गरीबी का नामोनिशान भी नहीं रह पाता। इसमें आम का अचार डालने पर उसका स्वाद अमृत तुल्य हो जाता है।" इन शब्दों के साथ चीनी व्यापारी ने भट्टतिरी को सादर प्रणाम किया और बाकी नौ मर्तबान अपने सेवकों से उठवाकर चला गया।

भट्टतिरी ने उस खोटयुक्त मर्तबान 'कोडन भरणी' में रखा धन दूसरे मर्तबान में रखकर उसे तथा दसों छोटे मर्तबान तहखाने में बंद कर दिया। सुना है कि ये मर्तबान आज भी उसी हालत में वहां मौजूद हैं।

इसके बाद वह खोटयुक्त मर्तबान 'कोडन भरणी' में आम का अचार डलवाने लगा। इस मर्तबान में डाला गया अचार चाहे कितने दिन बीत जाएं, हरा का हरा ही बना रहता है और उसका स्वाद इतना गजब का होता है कि बस उसे चखकर ही अनुभव किया जा सकता है, शब्दों में उसका वर्णन संभव नहीं है। उसे अमृततुल्य कहने से भी उसकी पूर्ण व्याख्या नहीं होती। जिसकी पाचन शक्ति पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हो और जो पानी तक को पचा नहीं सकता हो, उसे इस मर्तबान के अचार का एक टुकड़ा खिला दिया जाए तो तीन सेर चावल तो उसी समय खा जाएगा। इस अचार के बारे में मैंने एक कथा सुनी है, जो मैं यहां देता हूं।

कोल्लम संवत के ९७३ वें वर्ष में स्वर्गस्थ हुए महाराजा का जब राज था, तब उन्होंने एक मुरजपम (एक वैदिक यज्ञ) कराया था। इस पूजा में सम्मिलित हुए नंबूरी एक रात को भोजन करते समय परोसे गए व्यंजनों के स्वाद, उनकी संख्या आदि पर चर्चा कर रहे थे। एक नंबूरी ने दूसरे से कहा, "भैया, मजा आ रहा है न? ऐसा देवतुल्य भोजन पहले नहीं किया होगा।" तब दूसरे ने कहा, "सही कहा, बिलकुल सही कहा। लेकिन यदि उस कोडन भरणी का अचार भी होता तो बात ही कुछ और होती। बस यही एक कमी रह गई।" उस समय महाराजा मंदिर में आकर देवदर्शन करके गर्भगृह की प्रदक्षिणा कर रहे थे। नंबूरियों ने उन्हें नहीं देखा लेकिन महाराजा ने उनकी सब बातें सुन लीं।

उसी रात महाराजा ने एक गुप्तचर को भेजकर कोडन भरणी का अचार मंगवाया और अगले दिन रात के भोजन में ही उसे परोसवाया। उस दिन पूजा में नैवेद्य में बहुत प्रकार के आम के अचार बने थे, सो वे सब भी नंबूरियों को परोसे गए। जिस नंबूरी ने पिछली रात कोडन भरणी के अचार के न होने की शिकायत की थी, उसने उसका एक टुकड़ा चखा और तुरंत आह्लादपूर्वक बोल पड़ा, "यह लो! वह कमी भी दूर हो गई। अरे चिरंजीव, तू भी इस पत्तल में शामिल हो गया? वाह! क्या कहने!" तब पास बैठे एक नंबूरी ने कुतूहलवश पूछा, "आप किस चीज की तारीफ कर रहे हैं?" तब पहले वाले नंबूरी ने कहा, "यही इस अचार की। यह साक्षात कोडन भरणी का अचार है।" उस समय भी महाराजा मंदिर में देवदर्शन के लिए आए हुए थे, और उन्होंने यह सब वार्तालाप सुना। महल में लौटने के बाद उन्होंने उस नंबूरी को अपने समक्ष बुलवाया और प्रसन्नतापूर्वक कहा, "वाह! आपके जैसे स्वादपारखी व्यक्ति अति दुर्लभ होते हैं!" और उसे पुरस्कार से सम्मानित करके वहां से भिजवाया।

यही सब है कोडन भरणी और उसके अचार की महिमाएं। उस अचार को एक बार चख लेने पर कोई उसके स्वाद को भूल नहीं सकता। वह मर्तबान आज भी इस भट्टतिरी के घर में मौजूद है। उसमें डाले गए अचार के सभी गुण आज भी देखने में आते हैं।

(समाप्त। अब नई कहानी)

5 Comments:

गिरिजेश राव said...

विवेकाननद ने एक बार अपने यूरोपियन शिष्यों से कहा था कि भारतीयों को कथा सुनाने की भूल न करना। तुम लोग एक सुनाओगे तो वे उससे श्रेष्ठतर दस सुना देंगें।
इन कहानियों को पढ़ कर लग रहा है कि वह कितने सही थे !

अचार जैसा विषय भी इतना रोचक हो सकता है ! वाह !!

महामंत्री - तस्लीम said...

इस प्रेरक रचना को हमारे साथ साझा करने के लिए आभार।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

एक और सुंदर कथा के लिए आभार। आम के अचार का नाम सुनकर मुंह में पानी आ गया।


एक मशवरा देना चाहता था। आप कथा के दूसरे या तीसरे भाग में पहले वाले भाग के लिंक रखकर फिर आगे कथा शुरू करें तो पढ़ने वाले को भान रहेगा कि पीछे कथा चल रही है। मैं तो नियमित पढ़ रहा हूं लेकिन अगर कोई नया पाठक आएगा तो उसके लिए यह पुरानी पोस्‍ट का लिंक अच्‍छा रहेगा।

बालसुब्रमण्यम said...

सिद्धार्थ जी: यह सुझाव अच्छा है। अबसे मैं पिछले अंशों का लिंक दे दिया कररूंगा।

अविनाश वाचस्पति said...

अरे वाह कथाओं का खजाना। अब तो इन्‍हें पढ़ना ही होगा।

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