13 मई, 2009

9. काक्कश्शेरी भट्टतिरी - 1

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

कोषिक्कोड के शक्तन (मानविक्रमन) तंबुरान के समय वेदशास्त्रपुराणों के मर्मज्ञ महाब्राह्मणों की एक सभा हर साल कोषिक्कोड के तलियिल देवालय में राज-संरक्षण में जुड़ती थी। इस सभा में वेद, शास्त्र, पुराण आदि के संबंध में ब्राह्मण शास्त्रार्थ करते थे और विजयी ब्राह्मणों को पुरस्कार-स्वरूप स्वर्णमुद्राओं की थैलियां मिलती थीं। वेदशास्त्रपुराणों की विभिन्न शाखा-प्रशाखाओं को राजा ने १०८ विभागों में बांटकर प्रत्येक के लिए अलग स्पर्धा और पुरस्कार की राशि निश्चित की थी। इनके अलावा सभा के सबसे वयोवृद्ध ब्राह्मण के लिए १०९वीं थैली रखी जाती थी।

इस परंपरा के आरंभ हुए कुछ ही समय में केरल के ब्राह्मणों में सभी वेदों और सभी शास्त्रों को जानने वाले योग्य पुरुषों की संख्या निरंतर कम होने लगी और तंबुरान की यह प्रतिस्पर्धा परदेशों में भी विख्यात हो जाने से परदेशों से भी योग्य ब्राह्मण इसमें भाग लेने आने लगे। इससे पुरस्कार की थैलियां केरल के और परदेशों के ब्राह्मणों में बंटने लगीं। कुछ और समय बीतने पर वाद-विवादों में विजयी होने की क्षमता रखनेवाले ब्राह्मण केरल में दुर्लभ हो गए और पुरस्कार जीतने वालों में केरल के ब्राह्मणों की गिनती होनी बंद हो गई।

जब स्थिति इस प्रकार थी तब सर्वज्ञ, वागीश और कविशिरोमणि उद्दंड नामक एक शास्त्री ब्राह्मण इस सभा में हिस्सा लेने और शास्त्रार्थ करने परदेश से केरल आए। वे बहुत ही विज्ञ पुरुष होते हुए भी महा अभिमानी थे। उन्होंने निम्नलिखित श्लोक का उच्चारण करते हुए ही केरल में पदार्पण कियाः-

पलायध्वं पलायध्वं रे रे दुष्कविकुंजराः!
वेदांतवनसंचारी ह्यायात्युद्दंडकेसरी॥

यानी, "हे दुष्कविरूपी कुंजरो (हाथियो)! तुम लोग भाग जाओ, भाग जाओ, वेदांतरूपी इस वन में विहार करने उद्दंड नामक सिंह पधार रहे हैं।"

उन्होंने सभा में आकर सभी विभागों में शास्त्रार्थ किया और केरल के और परदेशों के सभी योग्य ब्राह्मणों को हराकर सबके सब पुरस्कार जीत लिए। उनके इस पराक्रम को देखकर शक्तन तंबुरान ने उनका बहुत आदर किया और उन्हें स्थायी रूप से राजप्रासाद में निवास करने का निमंत्रण दिया। साल दर साल ये ही शास्त्री सभा में आकर सभी को हराकर सभी थैलियां जीतकर ले जाने लगे।

ऐसी परिस्थिति में केरल के ब्राह्मणों को बहुत अधिक लज्जा और निराशा होने लगी। "हमारे बीच योग्य पुरुषों का अकाल पड़ गया है और परदेश से आया एक व्यक्ति राजसान्निध्य में आदर पा रहा है," यह सोचकर वे दुखी रहने लगे। इस दुखद परिस्थिति से छूटने का कोई उपाय करने के उद्देश्य से केरल के सभी प्रधान ब्राह्मण गुरुवायूर के मंदिर में इकट्ठे हुए। फिर उन सबने मिलकर विचार किया कि उद्दंडशास्त्री को हराने की क्षमता रखने वाले प्रतिभासंपन्न विद्वान हमारे मध्य कैसे पैदा हो। उन दिनों काक्कश्शेरी भट्टतिरी के घराने की एक स्त्री गर्भवती थी। यह समाचार जानकर वे सब ब्राह्मण मिलकर प्रसव होने तक प्रतिदिन उस स्त्री को एक दिव्य मंत्र जप कर मक्खन खिलाने और साथ-साथ गुरुवायूरप्पन से भी संकट-मोचन की निरंतर प्रार्थना करने लगे। इस प्रकार मंत्रबल और ईश्वरानुग्रह से उस स्त्री ने एक बालक को जन्म दिया, जो काक्कश्शेरी के भट्टतिरी के रूप में विश्वविख्यात हुआ।

काक्कश्शेरी भट्टतिरी बाल्यावस्था से ही प्रखर बुद्धि वाले थे। जब वे तीन साल के हुए तो उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। तब साल भर के लिए शोक मनाना आवश्यक हुआ। शोकावधि के दौरान कौओं के लिए बलि का अन्न रखकर ताली बजाते समय जो कौए आते थे, उनमें से किसी-किसी पक्षी की ओर इशारा करके यह ब्राह्मण शिशु अपनी माता से कहता था, "यह कौआ कल भी आया था।" उन्हें "काक्कश्शेरी" उपनाम इसी अद्भुत क्षमता के कारण प्राप्त हुआ। उनका असली नाम कुछ और था। कौए तक को एक बार देख लेने पर दोबारा पहचान सकने की विलक्षण क्षमता हर किसी में तो नहीं होती। चूंकि इस बालक के लिए यह मामूली बात थी, इससे उसकी बुद्धि की अति सूक्ष्मता का सहज ही अंदाजा हो जाता है।

ब्राह्मणों में जनेऊ धारण का समय आठवां वर्ष माना गया है। कहा भी गया है, "आठवें वर्ष में उपनयन विप्रों के लिए उत्तम है।" उपनयन के बाद नित्यकर्मानुष्ठान तथा वेद मंत्र आदि का अध्ययन करना पड़ता है। इसलिए बालक के इन सबके योग्य हो जाने के बाद ही उसके उपनयन करने की परंपरा है। लेकिन कुशाग्रबुद्धि वाले काक्कश्शेरी भट्टतिरी को तीसरे साल ही अक्षरज्ञान करा दिया गया और साढ़े पांच की आयु में उसका उपनयन संस्कार हुआ। इससे उसे उपनयन के बाद सीखने के लिए निर्धारित विषयों को पढ़ने में या नित्यकर्मानुष्ठानों को विधिवत करने में किसी प्रकार की भी कठिनाई नहीं हुई। उनके बाल्यकाल की एक घटना का उदाहरण मैं यहां देता हूं जिससे उनकी बुद्धि के माहात्म्य का परिचय मिलता है।

काक्कश्शेरी भट्टतिरी को बचपन से ही प्रतिदिन निकटस्थ मूक्कट्टथु (इस मलयालम शब्द का अर्थ है "नाक के सिरे पर") भगवती के मंदिर में भगवती-दर्शन के लिए ले जाया जाता था। एक दिन जब वे एक नौकर के साथ मंदिर जाकर लौट रहे थे, तब रास्ते में किसी ने पूछा, "कहां से आ रहे हैं महाशय?" तब पांच साल के उस बालक ने कहा, "मैं भगवती के दर्शन के लिए मंदिर गया था।" तब उस व्यक्ति ने कहा, "भगवती ने आप से क्या कहा?" इसके उत्तर में उस बालक ने निम्नलिखित श्लोक कहाः-

योगिमार सततं पोत्तुं तुंबत्तेत्तल्लयारहो ।
नाषियिलप्पादियाडील्ला पलाकाशेन वा न वा ॥

श्लोक का अर्थ न समझ आने से वह व्यक्ति थोड़ा लज्जित हुआ फिर उसने उस बालक से ही उसका अर्थ पूछा। तब बालक ने श्लोक का अर्थ इस प्रकार से समझायाः-

योगिमार सततं पोत्तुं- योगी लोग जिसे हर समय पकड़े रहते हैं (यानी नाक)

तुंबत्ते- पास वाली

तल्लयार- माता (यानी भगवती)

(इन तीनों पदों का सम्मिलित अर्थ बनता है- मूक्कट्टथु भगवती)

नाषी- समय की एक माप

पादी- आधा

नाषियिलपादी- नाषी का आधा (जिसे मलयालम में "उरी" कहते है।)

नाषियिलपादियाडिल्ला=उरियाडिल्ला=उरियाडियिल्ला (मलयालम में "उरियाडियिल्ला" का मतलब है "चुप रहीं")
(यानी कि भगवती बोलीं नहीं)।

पला- बहु

आकाशेन- मानेन (मलयालम में आकाश को "मानम" भी कहते हैं।)

पलाकाशेन- बहुमानेन (यानी अभिमान के कारण)

न वा- अन्यथा

कुल मिलाकर, "अभिमान के कारण या अन्य किसी कारण से भगवती नहीं बोलीं!"

बालक की यह व्याख्या सुनकर पूछनेवाले व्यक्ति ने आश्चर्य से सिर हिलाकर कहा, "निश्चय ही यह बालक सामान्य नहीं है" और अपनी राह पकड़ी।

(..अगले लेख में जारी)

3 Comments:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

आपके लेख पढ़कर खुद को बहुत तुच्‍छ महसूस कर रहा हूं। अच्‍छी बात यह है कि यह भूतकाल की बाते हैं।

हम हमारे जैसे मेंढक खुद को ज्‍योतिषी कहते हैं और टर्राते फिरते हैं।


आज के दौर में ऐेसे प्रतिभावान बच्‍चे हों तो हम तो डूब ही मरें।


अच्‍छी कथाओं का सिलसिला। आभार, जारी रखिएगा। मैं नियमित पढ़ रहा हूं।

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

नियमित पढ़ती हूँ आपको ..जारी रखें

P.N. Subramanian said...

काकस्सेरी की कहानी पढ़ी तो है लेकिन यहाँ ज्यादा मजा आ रहा है. आभार

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