23 मई, 2009

12. कोल्लेत्ताट्टिल गुरुक्कल -2

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

इसके अनंतर शिष्य कुछ समय और गुरु के सान्निध्य में रहकर अपनी शंकाएं दूर करता रहा और तत्पश्चात यथाशक्ति गुरुदक्षिणा अर्पित करके और गुरु का आशीर्वाद लेकर वहां से चल पड़ा। बहुत प्रदेशों में से होते हुए वह अंत में कायमकुलम पहुंचा। तब तक यह राज्य तिरुवनंतपुरम में सम्मिलित नहीं हुआ था और एक स्वतंत्र राज्य था। यहां के राजा से मिलकर वह ब्राह्मण उसके सैनिकों को हथियारों के उपयोग में प्रशिक्षण देने लगा। लेकिन राजा के क्रियाकलाप पसंद न आने से कुछ ही समय में नौकरी छोड़कर वहां से चला गया।

एक बार फिर वह ब्राह्मण कई स्थानों में घूमता रहा और अंत में तिरुवितांकूर के उस समय के महाराजा का निवासस्थल पद्मनाभपुरम के राजमहल में पहुंचा। वह सुप्रसिद्ध मार्त्तांडवर्मा का जमाना था, जिनका स्वर्गवास ९३३ कोल्लम वर्ष में हुआ। महाराजा अपने भानजे महाराजा रामवर्मा को जिनका तिरोधान कोल्लम वर्ष ९७३ में हुआ, शस्त्रविद्या का प्रशिक्षण दिलाने के लिए योग्य गुरु की तलाश में थे। अनेक व्यक्तियों को बुलाकर उन्होंने परखकर देखा पर किसी से भी संतुष्ट नहीं हुए और उन सबको लौटा दिया। वे इसी चिंता में थे कि अब क्या किया जाए। इसी समय वह ब्राह्मण वहां आ पहुंचा।

वहां पहुंचकर ब्राह्मण ने महाराजा से मिलने की इच्छा राजसेवकों के जरिए उन तक पहुंचाई और उन सेवकों से यह भी कहा कि महाराजा को विशेष रूप से यह बताएं कि मैं एक पहुंचा हुआ शस्त्रविद्या-विशेषज्ञ हूं। सेवकों ने महाराजा से जाकर यह सब कहा। तब महाराजा ने उसे अगले दिन सुबह बारह बजे उनसे मिलने का समय दिया। इसके अनुसार अगले दिन ब्राह्मण बारह बजे राजमहल के समीप गया। तब तक महाराजा के आदेशानुसार महल के सभी द्वार बंद कर दिए गए थे और अंदर दीवार से लेकर काफी दूर तक महल के चारों ओर जमीन पर आदमी जितनी ऊंची लोहे की नुकीली कीलें इस प्रकार पास-पास गाड़ दी गई थीं कि दो कीलों के बीच उंगली डालने तक की जगह न रहे। ब्राह्मण ने किले के चारों ओर घूमकर देखा, पर सभी द्वार बंद थे। तब वह समझ गया कि यह सब मेरी परीक्षा लेने के लिए ही किया गया है। वह तुरंत पगड़ी और धोती कसकर और ढाल तलवार संभालकर कुछ करतबों की सहायता से महल की दीवार को लांघकर महल के अंदर कूद पड़ा। पर अंदर जमीन पर कीलें ठुकी होंगी, इसकी उसने कल्पना नहीं की थी। एक छलांग में दीवार लांघकर जब वह दीवार के दूसरी तरफ नीचे आ रहा था तभी उसकी नजर उन कीलों पर पड़ी। अत्यंत बुद्धिशाली और कुशल योद्धा होने के कारण उसने दीवार के ऊपर से जमीन तक पहुंचने से पहले ही एक युक्ति सोच ली और उसका उपयोग किया। युक्ति इस प्रकार थीः- उसने तुरंत ढाल को नीचे की ओर करके उसे एक कील की नोक पर रखा और ढाल पर अपने दोनों पैर टिकाकर तनिक-सा झुककर पुनः हवा में उछाल लगाई और देखते ही देखते महल की दीवार लांघकर महल के बाहर आकर खड़ा हो गया। कोई चाहे कितना ही बड़ा योद्धा क्यों न हो, कूद जाने के बाद पीछे पलटने के लिए उसे पल भर के लिए ही सही, पैर कहीं टिकाने तो पड़ेंगे ही। इसलिए उसे ऐसा करना पड़ा था।

महल के बाहर आ जाने के बाद उसने महल के बुर्ज पर खड़े संतरी से कहा, "मेरे बारे में कोई पूछे तो कह देना कि मैं आया था और सभी द्वार बंद होने से अंदर घुस न सका और लौट गया।" यह कहकर वह जाने को हुआ। अत्यंत चकित होकर यह सब देख रहे महाराजा ने इतने में आदमी भेजकर महल का द्वार खुलवाया और ब्राह्मण को ससम्मान अपने पास बुलवाकर उसी समय यह घोषित कर दिया कि राजकुमार रामवर्मा को शस्त्राभ्यास वही ब्राह्मण कराएगा।

इस प्रकार चूंकि वह ब्राह्मण राजकुमार का गुरु बनाया गया था, इसलिए उसके घराने को "गुरुक्कल" की पुश्तैनी उपाधि प्राप्त हो गई और उसे महाराजा की तरफ से अनेक प्रकार की कीमती वस्तुएं भी मिलीं। "कोल्लंत्ताट्टिल" उसका घर का नाम था। ब्राह्मण आदि उसे गुरुक्कल कह कर और शूद्र गुरुक्कलच्चन (गुरुपिता) कहकर पुकारने लगे।

(... जारी)

2 Comments:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

संभव हो तो कुछ जानकारी शस्‍त्रों के बारे में भी देने का प्रयास कीजिएगा। फिल्‍मों में देखकर लगता है कि दक्षिण में शस्‍त्रों पर बहुत काम हुआ होगा। उत्‍तरी राजा भी शायद दक्षिण की ओर जाने से डरते थे।

बालसुब्रमण्यम said...

सिद्धार्थ जी: अच्छा सुझाव है। केरल शस्त्र-विद्या के लिए मशहूर रहा है। कलरि-प्पयट्टु नाम की युद्ध-विद्या केरल की देन है। कलरी मने अखाड़ा और पयट्टु मने युद्ध। इसमें निहत्था लड़ाई की तकनीकें और तलवार-ढाल, भाले, उरुमी (यह बेल्ट-नुमा दुधारी हथियार है जिसे कमर-कस के रूप में पहना जाता है, और जरूरत पढ़ने पर इसे खोलकर चाबुक के समान इस्तेमाल किया जाता है। बहुत ही मारक हथियार है), लाठी आदि से लड़ने के गुर सिखाए जाते हैं।

कलरि-प्पयट्टु पर एक लेख तैयार करता हूं।

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट