25 मई, 2009

12. कोल्लेत्ताट्टिल गुरुक्कल - 4

(कोट्टारत्तिल शंकुण्णि विरचित मलयालम ग्रंथ ऐदीह्यमाला का हिंदी रूपांतर)

आद्य गुरुक्कल के प्रशिक्षण से रामवर्मा महाराजा को जो शारीरिक बल, चपलता तथा शस्त्रों के प्रयोग में प्रवीणता हासिल हुई, वह सब इतिहास-प्रसिद्ध है। उसके संबंध में यहां अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती। लेकिन उनके शस्त्राभ्यास की समाप्ति के समय के एक प्रसंग का मैं यहां उल्लेख करूंगा। राजकुमार रामवर्मा के द्वारा गुरुक्कल के अधीन अभ्यास आरंभ करने के कुछ समय बाद उनके मामा महाराजा मार्त्तांडवर्मा ने अपने भानजे से उसी प्रकार सवाल किया जैसे कोषिक्कोड़ के राजा ने गुरुक्कल से उसके अभ्यासकाल में किया था। उस समय गुरुक्कल ने जिस तरह कहा था, उसी तरह रामवर्मा ने भी दस हजार सैनिकों से बच सकता हूं, पांच हजार सैनिकों से बच सकता हूं, दो हजार सैनिकों से बच सकता हूं," आदि उत्तर दिए। अंत में जब उनका शस्त्राभ्यास लगभग समाप्त हो चुका, तब एक दिन महाराजा मार्त्तांडवर्मा पद्मनाभपुरम के राजमहल में खड़े थे और उसी समय रामवर्मा सीढ़ियां चढ़कर महल में प्रवेश करने लगे। मार्त्तांडवर्मा चुपचाप सीढ़ियों के ऊपर एक दरवाजे के पीछे छिपकर खड़े हो गए। रामवर्मा को अपने मामा के वहां होने की खबर नहीं थी, न ही वे अपने मामा को देख सकते थे। जब रामवर्मा सीढ़ी के ऊपर तक पहुंच गए तब महाराजा मार्त्तांडवर्मा ने अपनी तलवार निकालकर भानजे की गर्दन पर प्रहार किया। तलवार गर्दन पर लगने के बाद ही रामवर्मा को आक्रमण का पता चला, और फौरन वे नीचे झुककर बैठ गए। तलवार महल के एक खंभे से टकराई और खंभा दो टुकड़ों में कटकर गिर गया। यह देखकर गुरुक्कल तुरंत वहां पहुंच गया और महाराजा से विनयपूर्वक पूछा, "आपने यह कठिन प्रयोग क्यों किया?" महाराजा मार्त्तांडवर्मा ने कहा, "बस यों ही। मुन्ने का विद्याभ्यास पूरा होने को आ रहा है न? इसने कुछ पढ़ा-वढ़ा है कि नहीं, यह देखना चाहता था। शत्रु इस प्रकार घात लगाकर अक्सर हमला किया करते हैं। उन हमलों से जो अपनी रक्षा न कर सकें उनका इस वंश में जीवित रहना व्यर्थ है। जो अपनी रक्षा कर सकते हैं, उन्हें इस प्रकार के प्रयोग से कोई हानि नहीं पहुंचेगी। यह सोचकर मैंने ऐसा किया।" उत्तर में गुरुक्कल ने कहा, "अपने पूज्य गुरु के अनुग्रह से मुझे नहीं लगता कि मेरे शिष्यों का इस प्रकार के हमलों से कुछ नुकसान हो सकता है।"

ऊपर वर्णित परीक्षा के जैसी अन्य अनेक परीक्षाएं लेने के बाद ही महाराजा मार्तांडवर्मा ने अपने भानजे महाराजा रामवर्मा को कायमकुलम की चढ़ाई जैसे सामरिक अवसरों पर अपने साथ ले जाना शुरू किया और कभी-कभी उनसे सेना का स्वतंत्र संचालन भी कराया। शिष्यों की योग्यता आखिर उनके गुरुओं की योग्यता का ही परिणाम होती है। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि महाराजा रामवर्मा ने जो युद्धसामर्थ्य अर्जित की, वह सब गुरुक्कल के शिक्षणकौशल से ही संभव हो सका।

(समाप्त। अब नई कहानी)

2 Comments:

गिरिजेश राव said...

यह कौशल असम्भव लगता है.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

पुराने जमाने में राजाओं और उनके परिजनों की जीवित रहने की यह शर्त सामान्‍य रही होगी। :)

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